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विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो

विश्व प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय में इन दिनों कोहराम मचा हुआ है। कहीं पर शिक्षक हड़ताल कर रहें हैं तो कहीं पर विद्यार्थी विजय जुलूस निकाल रहें हैं। इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर के इस्तीफा देने की खबर भी आई, परंतु उस खबर की पुष्टि नहीं हो पाई। दिल्ली विश्वविद्यालय में मचे इस कोहराम के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने की आकांक्षा पाले हुए नए विद्यार्थियों का भविष्य अन्धकारमय हो गया है। अपने कट-ऑफ के लिए प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कालेजों में प्रवेश को लेकर इस समय जहां चौतरफा हलचल रहती थी और वहां आने वाले नव-आगंतुक विद्यार्थियों के स्वागत की खबरों से लेकर फैशन तक की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती थीं, वहीं आज सन्नाटा पसरा हुआ है। दिल्ली विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी) इस समय आमने-सामने है। इस तनातनी को दूर करने के लिए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, परंतु सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट जाने की सलाह देकर किनारा कर लिया, साथ ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों को एक पत्र लिखकर 10+2+3 शिक्षा नीति का पालन करने को कहा, अन्यथा अनुदान बंद करने की चेतावनी दे दी। इससे दिल्ली विश्वविद्यालय के लगभग अधिकांश कालेजों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को पत्र लिखकर अपनी स्वीकृति दी कि वे 10+2+3 शिक्षा नीति का उल्लंघन नहीं करेंगे और चार साल के स्नातक कोर्स को तीन साल का ही करेंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इस पत्र को दिल्ली विश्वविद्यालय ने उसकी स्वायत्ता पर हमला करार दिया।

यदि हम इस घटना की शुरुआत से मूल्यांकन करे तो पाएंगे कि यह मामला स्वायत्तता बनाम तनाशाही का नहीं अपितु ‘संवादहीनता’ का है। 27 अप्रैल 2012 को जब दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर ने स्नातक के चार-वर्षीय पाठ्यक्रम (एफ.वाईयूपी) की जानकारी मीडिया में दी तभी से वाइस चांसलर के खिलाफ शिक्षक संघ ‘डूटा’ और छात्र संगठन ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्’ के विद्यार्थी सड़कों पर उतर आए। विरोध कर रहे शिक्षकों और विद्यार्थियों का यह तर्क था कि तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के मौखिक आदेश पर ही दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर ने स्नातक के चार वर्षीय पाठ्यक्रम को लागू करने की घोषणा की है। स्नातक के पाठ्यक्रम को चार वर्ष का इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका व अन्य देशों में पढऩे के लिए चार वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम जरूरी होता है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय का तर्क था कि चूंकि उनके यहां भारत के कोने-कोने से विद्यार्थी पढऩे के लिए आते हैं और उन सभी में एकरूपता नहीं होती है, इसलिए उन विद्यार्थियों में एकरूपता लाने के लिए पहले वर्ष में विशेष प्रकार का पाठ्यक्रम बनाया गया है। साथ ही यदि कोई विद्यार्थी दो वर्ष में अपनी स्नातक की पढ़ाई खत्म करना चाहता है तो वह डिप्लोमा की डिग्री लेकर कर सकता है। स्नातक की पढ़ाई तीन वर्ष में खत्म करने वालों विद्यार्थियों को स्नातक-प्रोग्राम की डिग्री मिलेगी और स्नातक-आनर्स की डिग्री विद्यार्थी को चार वर्ष के पाठ्यक्रम को पढऩे के बाद ही मिलेगी। इस सूचना को 26 अप्रैल 2013 को शशि थरूर ने राज्यसभा में बताया कि डीयू चार वर्ष के पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए तैयार है। वहीं 3 जुलाई 2013 को विभिन्न राजनैतिक दलों ने तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा चार वर्षीय नए सिस्टम को नहीं रोके जाने का खुलकर विरोध किया। इतना ही नहीं स्नातक को चार वर्ष के स्थान पर तीन वर्ष करने की बात को दिल्ली भाजपा ने बकायदा अपने एजेंडे में जगह दिया। इससे बड़ी हास्यापद स्थिति और क्या होगी कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव को ध्यान में रखकर एक तरफ जहां एन.एस.यू.आई पिछले कुछ दिनों से दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा तय किए गए एफ.वाईयूपी को वापस लेने की मांग कर रहा है तो ठीक इसके विपरीत कांग्रेस के प्रमुख नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मनीष तिवारी अप्रत्यक्ष रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा तय किए गए एफ.वाईयूपी को यथावत बनाए रखने की पुरजोर तरीके से वकालत कर रहे हैं। तनातनी के इस वातावरण में दिल्ली विश्वविद्यालय एक शैक्षणिक संस्थान कम, राजनैतिक अखाड़ा अधिक लग रहा है।

मानव इतिहास के आदिकाल के समय से ही अलग-अलग स्वरूपों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होता रहा है। कालांतर में प्रत्येक राष्ट्र ने अपने मूल्यों को ध्यान में रखते हुए अपनी सामजिक-सांस्कृति अस्मिता को अभिव्यक्ति देने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए एक शिक्षा-प्रणाली का ताना-बाना बुना। इसी कड़ी में भारत सरकार ने वर्ष 1964 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी) के तत्कालीन अध्यक्ष डा. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में स्कूली शिक्षा प्रणाली को नया आकार और नई दिशा देने के उद्देश्य से एक आयोग का गठन किया, जिसे कोठारी आयोग (1964-1966) के नाम से जाना जाता है। कोठारी आयोग देश का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था जिसने अपनी रिपार्ट में सामाजिक बदलावों को ध्यान में रखकर कुछ ठोस सुझाव देते हुए देश में समान स्कूली प्रणाली (कॉमन स्कूल सिस्टम) की वकालत की और कहा कि समान स्कूल प्रणाली पर ही एक ऐसी राष्ट्रीय व्यवस्था तैयार हो सकेगी जहां सभी तबके के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूल से भागकर प्राइवेट स्कूलों का रुख करेंगे तथा पूरी प्रणाली ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी।

24 जुलाई 1968 को भारत की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई, जो कि पूर्ण रूप से कोठारी आयोग के प्रतिवेदन पर ही आधारित थी। सामाजिक दक्षता, राष्ट्रीय एकता एवं समाजवादी समाज की स्थापना करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। पूरे देश में शिक्षा की समान संरचना बनी और लगभग सभी राज्यों द्वारा 10+2+3 की प्रणाली को मान लेना 1968 की शिक्षा नीति की सबसे बड़ी देन है। भारतीय विचारधारा के अनुसार मनुष्य स्वयं एक अमूल्य संपदा और संसाधन है। आवश्यकता इस बात की है कि उसकी देखभाल में गतिशीलता एवं संवेदनशीलता हो। कुल मिलाकर, यह कहना सही होगा कि शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है। इसी सिद्धांत को भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण की धुरी माना गया है। वर्तमान समय में हमारा देश आर्थिक और तकनीकि समृद्धि के पथ पर अग्रसर है। शिक्षा के माध्यम से ही हम समाज के हर वर्ग तक पहुंचकर उनका न्यायपूर्वक मूल्यांकन कर सकते हैं। इसी सन्दर्भ में इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने जनवरी 1985 में यह घोषणा की कि देश में अब एक नई शिक्षा नीति निर्मित की जाएगी। कालांतर में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत शिक्षा विभाग ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 बनाया और 1992 में इसमें कुछ संशोधन किए गए।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के तीसरे अध्याय में आयोग की शक्तियां और कृत्य को परिभाषित करते हुए स्पष्ट लिखा गया है कि विश्वविद्यालयों में शिक्षा की अभिवृद्धि और उसमें एकसूत्रता लाने के लिए विश्वविद्यालयों में अध्यापन, परीक्षण और अनुसंधान के स्तरों का निर्धारण करने के लिए जो आयोग ठीक समझे वह कार्यवाही कर सकता है। इतना ही नहीं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के तीसरे अध्याय में आयोग के चौथे अध्याय में यह भी लिखा गया है कि यदि केन्द्र सरकार और आयोग के बीच यह विवाद उठता है कि कोई प्रश्न राष्ट्रीय उद्देश्यों से संबंधित नीति का है या नहीं तो उस पर केन्द्र सरकार का निश्चय ही अंतिम होगा। कोठारी आयोग, राधाकृष्णन आयोग, मुदलियार आयोग और यशपाल समिति ने हमेशा ही शिक्षण संस्थानों को ज्ञान-सृजन पर तरह-तरह की सलाह दिया है। साथ ही हमें भी यह ध्यान रखना चाहिए कि स्वायत्तता का अर्थ निरंकुशता अथवा तानाशाही कभी नहीं होता। हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वायत्तता और स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी अवश्य ही रहती है। बहरहाल दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में पनपे इस गतिरोध से वहां पढऩे की लालसा लिए हुए बच्चों का भविष्य अन्धकार में तो है ही साथ ही उनके माता-पिता भी परेशान हैं जो कि किसी सभ्य समाज के लिए शोभनीय नहीं है।

राजीव गुप्ता

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