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चार वर्षीय पाठ्यक्रम हंगामा है यों बरपा!

दिल्ली विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चा में है और इस चर्चा से सारा देश आहत है। पिछले वर्ष उसने स्नातक स्तर पर तीन-वर्षीय पाठ्यक्रम को चार-वर्षीय पाठ्यक्रम में बदल दिया था। इससे शिक्षा जगत को आश्चर्य तथा आशंका से गुजरना पड़ा। जो दिल्ली में होता है उसका असर सारे देश में पर पड़ता है और जो दिल्ली विश्वविद्यालय में होगा, उससे देश के अन्य महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय अछूते कैसे रह सकते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय जब इस पाठ्यक्रम के गुण तथा लाभों को प्रचारित कर रहा था, अन्य विश्वविद्यालय यह चर्चा कर रहे थे कि उन्हें तो तीन साल का पाठ्यक्रम सुचारू रूप से चलाने के लाले पड़े हैं वे चार वर्ष का पाठ्यक्रम कैसे चलाएंगे? अधिक साधन, संसाधन कहां से आएंगे? अध्यापकों की कमी है, अनुदान की कमी है, फर्नीचर, कमरे, रख-रखाव सभी कुछ तो विपन्नावस्था में ही है। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय को यह सब चिन्ताएं नहीं सताती है, उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विश्वविधालय अनुदान को बजट भेजना पड़ता है। दिल्ली विश्वविद्यालय को चार वर्षीय पाठ्यक्रम चलाने का इंगित या स्पष्ट कहें तो दिशा-निर्देश भी कपिल सिब्बल से मिला था। कपिल सिब्बल को वह सब श्रेष्ठ लगता था जो ‘अमेरिका’ में प्रचालित था। वहां के जूनियर कालेजों में चार वर्षीय पाठ्यक्रम था, इसलिए उसे भारत में भी लागू किया जाना उचित लगा। अंदर की बात यह थी कि वे भाग्यवान (और धनवान) युवा जो स्नातक के स्तर शिक्षा तथा शोध और बाद में ग्रीनकार्ड के सपने संजो सकते थे उन्हें चार-वर्षीय पाठ्यक्रम के बाद हर प्रकार की समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा। बाकी को अन्य कारण बताए गए, जैसे हमारे स्नातक रोजगार के लायक नहीं तैयार होते हैं, उनक ी ज्ञान की तिजोरी खाली रह जाती है, वे स्नातक स्तर के बाद शोध मे प्रवेश नहीं पा पाते हैं, इस कार्यक्रम के बाद उन्हें यह असुविधा नहीं होगी, इत्यादि इत्यादि।

बड़े-बड़े सेमिनारों, सभाओं और परिचर्चाओं में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर शोध प्रबंध पढऩे वाले प्राध्यापक अपवाद छोड़कर, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हर इशारे को आदेश ही मानते हैं तथा सब कुछ छोड़कर उसे पूरा करने में पूरी तरह जुट जाते हैं। जब वे आपको बताते हैं कि ‘एमएचआरडी का प्रोजेक्ट मिला है उसमें व्यस्त हूं’ तब उनके चेहरे पर उपलब्धि का भाव देखने लायक होता है। चार-वर्षीय पाठ्यक्रम को कपिल सिब्बल के बाद आए शशि थरूर ने अनुकरणीय नवाचार बताया तथा उनके वरिष्ठ मंत्री पल्लम राजू ने इसकी सराहना की थी। सामान्य जन को बताया गया कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत जो भी स्वीकृतियां आवश्यक थीं, प्राप्त कर ली गई हैं। इनमें सबसे अंत में आता है विश्वविद्यालय के ‘विजिटर’ की स्वीकृति। जब इस पर प्रश्र उठा तो बताया गया कि अधिनियम में प्रावधान है कि यदि एक महिने के अंदर विजिटर यानि भारत के राष्ट्रपति से कोई उत्तर नहीं आता है तो यह माना जाएगा कि स्वीकृति मिल गई है। यही नहीं, जुलाई 2013 के बाद समय-समय पर यह खबरें लगातार आती रहीं कि पाठ्यक्रम और पाठचर्या दोनों ही ‘बन रहे हैं’ मगर कोर्स चालू है। यह जानकर लोगों को आश्चर्य हुआ कि दो हफ्ते के अंदर हर विषय के लोग अपना सिलेबस तैयार कर लें। कुल प्रक्रिया का एक अन्य पहलू भी था जो हमारी शिक्षा व्यवस्था की एक बहुत बड़ी खामीं को इंगित करता है: इस सब में विद्यार्थियों, माता -पिता तथा रोजगार देने वाली संस्थाओं तथा उद्यमियों से कोई चर्चा परिचर्चा नहीं हुई।

हमारे बड़े विश्वविद्यालय जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तथा उनके अन्य दो बड़े खेमों में बंटे हुए हैं – लोग मानें या न मानें। यह दो खेमें हैं, दक्षिणपंथी तथा वामपंथी। चार-वर्षीय पाठ्यक्रम के बारे में पहले कहा गया कि वामपंथी गुट इसका विरोध कर रहा है और जब ऐसा हो तो वामपंथियों के विरोधियों का धर्म बनता है कि वे उसका विरोध करें। यहां गुण-दोष सब पीछे छूट जाते हैं केवल विचारधारा के आधार पर समर्थन या विरोध तय होता है। पाठ्यक्रम प्रारंभ हो जाने के बाद विद्यार्थियों में सर्वेक्षण कराया गया था, जिसमें बताया जाता है कि 90 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों ने चार-वर्षीय पाठ्यक्रम का विरोध किया था, लेकिन अधिकारियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। सन 2014 में देश में बहुत कुछ बदल गया है। आशा है आगे भी बहुत कुछ बदलेगा। वह चार-वर्षीय पाठ्यक्रम जो भारत सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और दक्षिणपंथियों के द्वारा प्रशंसा तथा समर्थन पा रहा था, एकाएक त्याज्य बन गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, जो देश की उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी नियामक संस्था है, नींद से जाग गया और उसने पाया कि चार-वर्षीय पाठ्यक्रम अवैधानिक है तथा यह भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986/92 के प्रवधानों का उल्लंघन करता है और इस कारण इसे तत्काल तीन-वर्षीय पाठ्यक्रम में ही विद्यार्थियों को प्रवेश दे वरना….! यानी बात न मानी तो अनुदान बंद। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी उठाने वाली संस्था इतनी जल्दी चांदी का चाबुक चलाने में उतर आए तो हताशा ही निर्मित होगी। वे 60 हजार विद्यार्थी जिन्होंने 2013 में चार-वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था, एक और घनी हताशा से जीवन भर जूझेंगे। वे जहां भी जाएंगे और कहेंगे कि उन्होनें 2013-2017 का पाठ्यक्रम पास किया है, हमेशा शंका की निगाह से देखे जाएंगे : ओह! वह पाठ्यक्रम जिसे (अनेक कर्मियों के कारण) साल भर में एक ही बैच के बाद बंद करना पड़ा था। हमारी व्यवस्था में बच्चों और युवाओं के साथ हुए अन्याय की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता है। यहां भी यही होगा।

इस समय जो स्थिति बनी है उसमें यह तय है कि यह चार-वर्षीय पाठ्यक्रम बंद तो होना ही था। वैसे अब बहुत से पाठ इस प्रकरण से सीखे जा सकते हैं। शिक्षा नीति नवाचारों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती, वरन उसे प्रोत्साहित करती है। 1998 में अध्यापक शिक्षा का पाठ्यक्रम राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् एनसीटीई ने बनाया था। इसमें बीएड के एक वर्षीय पाठ्यक्रम के स्थान पर गुणवत्ता बढ़ाने के लिए दो-वर्षीय पाठ्यक्रम की अनुशंषा की गई थी। ऐसा करने से पहले सारे देश में अध्यापकों तथा अध्यापक-प्रशिक्षकों की राय ली गयी थी। एक वातावरण तैयार किया गया कि गुणवत्ता बढाऩे के लिए जो कौशल तथा ज्ञान अध्यापकों को मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है। इसे 1999 में देश के चार क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालयों में प्रारम्भ किया गया। बच्चों तथा माता-पिता को लिखित रूप से बताया गया कि एक अधिक वर्ष लगेगा, लेकिन तकनीकी तौर पर दो-वर्षीय तथा एक-वर्षीय में अंतर नहीं होगा – हां आपको ज्यादा मेहनत करनी होगी, अधिक प्रशिक्षण मिलेगा, अधिक कौशल तथा अधिक क्षमता बढ़ेगी। इसे सराहा गया। कुछ राजनीतिक कारणों से आगे के वर्षों में इसे अधिक प्रचारित तथा क्रियान्वित करने के प्रयास शिथिल कर दिए गए। यह किसी ने नहीं पाया कि शिक्षा नीति का उल्लंघन हुआ है। दिल्ली विश्वविद्यालय प्रकरण में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की पहले की शिथिलता तथा एकाएक प्रहारात्मक प्रखरता उसकी साख में बट्टा लगा रही है। यह एकाएक पाला पलट क्यों? आयोग चाहता तो इस पाठ्यक्रम को 2013 में रोक सकता था। एनसीटीई ने 1997-98 में ऐसा किया था। आंध्र प्रदेश सरक ार ने शिक्षा सत्र के बीच में बीएड के 70 नए प्राईवेट कॉलेज खोलने की अनुमति दे दी। एनसीटीई ने सरकार से पत्र व्यवहार किया, उनकी राजनीतिक मजबूरी को समझा और बड़े समाचार-पत्रों में विज्ञापन दे दिए कि यह कॉलेज तथा उनके पाठ्यक्रम व डिग्रियां मान्य नहीं होंगे। विरोध हुआ, जुलूस निकले, मगर वे कॉलेज उस वर्ष नहीं खुले। देश की नियामक संस्थाओं की साख क्यों घटी उसका उदाहरण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की कार्य-प्रणाली से उजागर हो जाता है। इसे सुधारना अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेवारी है। दिल्ली विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग व मानव संसाधन विकास मंत्रालय तीनों को एक साथ बैठकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986-92 का यह प्रावधान पढऩा चाहिए, जिसमें कहा गया है कि ‘व्यवस्था को स्तर हीनता की ओर जाने से रोकने के लिए त्वरित कदम उठाए जाएगें’। लोग जानना चाहेंगे कि इसका क्या हुआ?

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