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शिंदे को अंतर्राष्ट्रीय न्यायविद् पुरस्कार!

पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय न्यायविद् पुरस्कार 2014 के लिए चयनित किए जाने की सूचना पर बहुत से लोगों की भौंहे टेंढ़ी हो गईं तो कुछ लोगों के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, शिंदे का चयन ‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और संगठित अपराध के खिलाफ कठोर कदम उठाने के कारण हुआ है। अपने देश में अपराध के परिदृश्य पर एक दूरगामी प्रभाव डालने के लिए उनके द्वारा किए गए अनुकरणीय प्रयासों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की।’

हालिया चुनाव में उन्हें हराने वाले मतदाता निश्चित रूप से इससे हैरान होंगे। उन्होंने गृहमंत्री के रूप में विधि-व्यवस्था संभालने में नाकाम रहने के कारण उनके खिलाफ मतदान किया था।  फिर भी वे शिखर पर बैठे हैं। इंटरनेशनल काउंसिल फॉर ज्यूरिस्ट, इंटरनेशल कमीशन फॉर राईटर्स, ऑल इंडिया बार एसोसिएशन के प्रेसीडेंट और इंडिया लीगल इंफॉर्मेशन इंस्टीट्यूट तथा स्पेशल काउंसेल फॉर गर्वनमेंट ऑफ इंडिया के चेयरमैन एवं वरिष्ठ वकील डॉ. अदिश सी. अग्रवाल की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, शिंदे के साथ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के प्रेसीडेंट पीटर टोमका को ‘अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान के लिए उनके अनुकरणीय और दूरगामी योगदान’ के लिए चयनित किया गया है।

‘दुनिया भर के विभिन्न हिस्सों में कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में उनके भावुक और समर्पित योगदान, जिसने असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित किया है’ के लिए अमिटी यूनिवर्सिटी के चांसलर डॉ. अशोक चौहान का चयन भी पुरस्कार के लिए किया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायविद् पुरस्कार प्राप्त करने वाले लोगों में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, पूर्व केन्द्रीय कानून मंत्री राम जेठमलानी, कोचर ऐंड कोचर कंपनी के रोहित कोचर और लूथरा ऐंड लूथरा के राजीव के. लूथरा का नाम शामिल है।

मोदी के सामने दुस्साहस नहीं

संभ्रात ‘दिल्ली गोल्फ कोर्स’ के हरे-भरे गोल्फ कोर्स से भारत सरकार के सचिव लापता हैं। आरोप उन्हीं के बीच के जयचंदों पर है। उनमें से किसी ने यह बात फैला दी कि सरकार के सचिव स्तर के अधिकारी नियमित रूप से यहां गोल्फ खेलने के लिए आते हैं। ये अधिकारी यहां से 15 से 29 मिनट की दूरी पर स्थित अपने ऑफिस जाने से पहले क्लब में ही स्नान और नाश्ता करते हैं।

कथित तौर पर दिल्ली गोल्फ क्लब के लगभग 200 नौकरशाह सदस्य हैं। इनमें से ज्यादातर कार्यशील सप्ताह में भी सुबह-सुबह, यहां तक कि दोपहर में भी गोल्फ खेलने चले आते हैं। कहा जा रहा है कि जो अधिकारी नियमित रूप से गोल्फ खेलते थे, उनकी सूची बनाने को कहा गया था।

अब उनके गोल्फ खेलने के दिन खत्म हो गए हैं। अपने 30 से 33 साल के सेवाकाल में वे प्रतिष्ठित सचिव के पद पर पहुंचे हैं। लंबी और कठिन परिश्रम के बाद गोल्फ एक चैन की नौकरी समझी जाती है। घंटों फाईलों में सिर खपाने से बचाने का यह उपाय थोड़ा जोखिम भरा है। गोल्फ से उन्हें कुछ घंटों का आराम मिल जाता था। लेकिन, अब यह सब खत्म हो चुका है।

मोदी सरकार में सरकारी कर्मचारियों का जीवन थोड़ा कठिन हो गया है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे समय पर आएं और जरूरत के अनुसार देर तक ऑफिस में रहें। अगर जरूरत पड़ी तो उनकी छुट्टियों को स्थगित किया जा सकता है। इससे दिल्ली जिमखाना, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और दिल्ली गोल्फ क्लब में इत्मीनान से लंच कर उनके जीवन के कुछ सुखी क्षणों में कटौती हो गई है। दिल्ली के रक्षा मंत्रालय के कर्मचारियों को कहा गया है कि वे नोटिस पर साईन करें कि सुबह 9 बजे तक वे ऑफिस पहुंच जाएंगे, अन्यथा उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। 11 बजे ऑफिस पहुंचना अतीत की बात हो गई। एक अतिरिक्त सचिव का कहना है – ”मैं ऑफिस के लिए 8.45 बजे सुबह निकलता हूं। मेरी पत्नी अब नहीं पूछती कि मैं कब घर लौटूंगा। वो जानती है कि आज के लिए निर्धारित फाईलों को पूरा करने के बाद ही लौटूंगा।’’

सरकारी विभागों का घर कहे जाने वाले ‘भवनों’ के बाहर 9 बजे कर्मचारी घड़ी की सुईयों के साथ भागते नजर आते हैं। देर होने का मतलब ‘बॉस’ का कोपभाजन बनना। मंत्रालय के कर्मचारियों को 15 मिनट से ज्यादा देर होने पर अपने वरिष्ठ कर्मचारियों को सूचित करना होता है। कर्मचारियों के लिए बायोमैट्रिक्स अटेंडेस ट्रैक की व्यवस्था की गई है और छह महीने बाद नियमित रूप से देर से आने वाले कर्मचारियों का संज्ञान लिया जाएगा।

यहां तक कि कार्यालयों में मोबाईल पर चैटिंग के द्वारा ‘टाईमपास’ करने के बजाय अपने-अपने कामों पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। कहा जाता है कि एक मीटिंग के दौरान एक महिला नौकरशाह को अपने मोबाईल में व्यस्त रहने के कारण मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने उन्हें मीटिंग से बाहर कर दिया था।

इस तरह का अनुशासन भारतीय नौकरशाहों की क्षमता को निश्चित रूप से बढ़ाएगा, जो कि हॅांगकांग स्थित ‘पोलिटिकल ऐंड इकोनॉमिक रिस्क कन्सलटेंसी’ की 12 एशियाई देशों की रैंकिंग में सबसे खराब प्रदर्शन वाली है।

एक दैनिक समाचार-पत्र को एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया – ”हमें कहा गया है कि कोई भी फाईल दो दिन से ज्यादा नहीं रोकी जा सकती और अगर फाईल एक सप्ताह के अंदर क्लियर नहीं होती तो इसकी वजह बतानी होगी।’’ ये नियम सख्ती से इसलिए लागू किए गए हैं, क्योंकि केन्द्र द्वारा सचिवों के साथ एक-एक करके बैठक करने की नीति से नरेन्द्र मोदी प्रभावित नहीं थे। मोदी के सामने सचिवों ने अपने दिए गए प्रेजेन्टेशन में सिर्फ अपने मंत्रालयों के अधिदेश और विजन को रखा था। सचिवों ने सिर्फ अपने विभागों की 100 दिनों के प्रस्ताव और योजनाओं की बात की थी, उनके प्रभावों के बारे में नहीं। प्रधानमंत्री की सिर्फ प्रस्तावों के नतीजों को सीखने और मंत्रालय इसे कैसे देखता है इसमें रूचि थी। सरकार के एक सचिव स्तर के अधिकारी का कहना था – ”वे सरकारी खर्च के एक-एक पैसे के हिसाब और सांख्यिकीय माप का नतीजा चाहते हैं।’’

मोदी मई 2014 को भाजपा के संसदीय दल की बैठक किए गए वादों के लिए मंत्रालयों के नतीजों में ज्यादा इच्छुक हैं। यदि कोई योजना प्रस्तावित होती है तो संबंधित सचिवों को बताना होता है कि इससे कितने लोग लाभान्वित होंगे।

यह निश्चित है कि लंबे समय बाद गोल्फ-हीन, खुशी-विहीन भारतीय नौकरशाही विश्व के किसी भी बेहतरीन नौकरशाही से बराबरी करने में सक्षम होगी।

राज्यपाल तुम जाओ….अब हमारी बारी

ओलिवर क्रॉम्वेल ने हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा था – ‘ईश्वर के लिए, तुम जाओ….।’ एनडीए सरकार ने यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त किए गए राज्यपालों से कहा – ‘मर्यादा के लिए, तुम जाओ…।’ लेकिन कांग्रेस इस आदेश पर गंभीरता से प्रतिक्रिया देते हुए कह रही है कि ‘मर्यादा यह है कि राज्यपालों को बने रहने दिया जाय।’ हालांकि यह कठिन काम है।

किसी का कहना है कि राज्यपाल की गद्दी ने मोदी और राजनाथ सिंह की जिंदगी को दुखद बना दिया है। उन्हें जो सपने दिखाए गए हैं, वे तुरंत उसे पूरा करना चाहते हैं। इसकी मिसाल 1977 है, जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनते ही, उसके पूर्ववर्ती सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने त्यागपत्र दे दिया था। 2004 में यूपीए की सरकार बनते ही हरियाणा के राज्यपाल बाबु परमानंद, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री, गोवा के राज्यपाल केदारनाथ साहनी और गुजरात के राज्यपाल कैलाशपति मिश्र से त्यागपत्र ले लिया गया था।

1980 में तर्क दिया गया था कि अनुच्छेद 156(1) के तहत राज्यपाल राष्ट्रपति की कृपा पर आश्रित हैं। लेकिन इस मतभेद को जाहिर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने 2010 में कहा कि सरकार ‘बाध्यकारी’ कारणों से नियुक्त राज्यपालों को मनमाने ढंग से स्थानांतरित नहीं कर सकती। इस आधार पर नियुक्त राज्यपालों को हटाया नहीं जा सकता कि केन्द्र में सरकार बदली है और वह अपने नजदीकी लोगों को राज्यपाल नियुक्त करना चाहती है।

लेकिन तथ्य यह है कि ये नियम, उच्चतम न्यायालय के निर्देश और मर्यादाएं सत्ता में आने के बाद हर पार्टियों में छिप जाती है और उन वरिष्ठ लोगों को ऐसे पद बैठाने की कोशिश करने लगती है जो अब लंबे समय तक पार्टी या सरकार में अपनी सेवा नहीं दे सकते। राज्यपाल का पद विशेषाधिकारों और कई लाभांशों से युक्त होकर लक्जरी लाईफ से युक्त होता है और उन पर किसी निश्चित उत्तरदायित्व का बोझ नहीं होता।

भारत में इस तरह की कुल 29 जॉब हैं। यदि राज्यपालों के जाने के लिए एनडीए सरकार उत्सुक है तो इसके पीछे प्रतिशोध कम अपने लोगों को उपकृत करना ज्यादा है। वे सब प्रतीक्षारत हैं, लेकिन कुछ वरिष्ठ अपना धैर्य खो रहे हैं। समझ गए….

यदि मोदी इन 29 पदों में से कुछ पर मेधावी लोगों को नामित करते हैं, तो यह मोदी के लिए बेहतर होगा। इससे यह पद गैर-राजनीतिक साबित होगा।

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