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दस साल बनाम एक महीना

एक महीने का वक्त कोई वक्त नहीं होता जिसमें किसी सरकार का कोई आंकलन किया जाए। लेकिन लोगों ने नरेंद्र मोदी की सरकार का अंाकलन शुरू कर दिया है। नरेंद्र मोदी को हमेशा ‘आग के दरिया में डूब के जाना’ पड़ता है। और ये मोदी की मुश्किलें ही नहीं बल्कि उनकी शख्सियत की ताकत को बयान करता है। यूं देखा जाए तो इस महीने भर में सरकार ने कई संकेत दिए हैं जो आने वाले ‘अच्छे दिनों’ की तरफ इंगित करते हैं। मसलन पड़ोसी देशों से संवाद जुडऩा, छोटा मंत्रिमंडल, रेल किराया बढऩा और कड़े आर्थिक उपायों का ऐलान।

दरअसल पिछले दस साल में सरकार ने अर्थव्यवस्था को इतना जर्जर बना दिया था कि आज वो एक तरह से आईसीयू में पड़े मरीज-सी लगती है। यूपीए सरकार देश को पुराने समाजवादी दौर के आर्थिक चलन में ले गई, जहां सब कुछ सरकार नियंत्रित-सा था। सब्सिडी और आर्थिक फैसलों पर सरकार का कंट्रोल, यही उस सरकार का मूल मंत्र था। अब उस दौर को पलटने के लिए समय चाहिए। ये किसी जादू की छड़ी से नहीं हो जाने वाला। इस संदर्भ में फेसबुक पर मेरी एक लेखिका मित्र ने लिखा कि ‘अच्छे दिनों के लिए कड़ी मेहनत की जरूरत पड़ेगी’। बात तो सही है मगर भाई लोग कह सकते हैं कि पहले दिन से ही अच्छे दिन आने चाहिए। दस बरस मुंह पर पट्टी बांधें रहे ये तथाकथित ‘एक्सपर्ट’ बस ताक में ही हैं कि कब मौका मिले और वे कब टूट पड़ें।

हां, एक बात की अपेक्षा इस सरकार से सबको है, वो ये कि संवाद नहीं टूटना चाहिए। ये सरकार बनी है नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी के एक बेहतर संवाद की वजह से। अगर एक महीने में किसी चीज की कमी खली है तो वो है एक बेहतर जनसंवाद नीति और उस पर अमल करने की रणनीति की। यहां ये कह देना जरूरी है कि एक महीना बहुत कम समय है इसे तौलने के लिए, मगर मोदी से सबको अब असंभव की उम्मीद होने लगी है। प्रधानमंत्री ने शुरुआत तो ठीक की थी। लोगों को कतई बुरा नहीं लगा था जब उन्होंने कड़े फैसले लेने की बात कही थी। परंतु जब रेल के किराए बढ़ाए गए तो उन्हें बढ़ाने की जरूरत क्यों आन पड़ी ये भी जनता के सामने ठीक तरह से रखना जरूरी था। ये बात ठीक-ठीक आई नहीं। हम मानते हैं कि देश की तरक्की के लिए रेल का स्वास्थ्य तंदुरुस्त रहना बेहद जरूरी है। मगर जनता को समझाना भी तो आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उसी तरह मंत्रियों के निजी सचिव रखने के मामले में अस्पष्ट संवाद की भूमिका साफ दिखी। प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि वे लोग ही फि र से मंत्रियों की परिक्रमा करके निजी सचिव बन जाएं जो पिछली यूपीए सरकार के दौरान मंत्रियों के साथ रहे थे। बिलकुल साफ है कि एक तो प्रधानमंत्री इस सरकार में नयापन चाहते हैं और दूसरे वे नहीं चाहते कि जिनकी वजह से पिछली सरकार के दामन पर दाग लगे, उन्हीं नौकरशाहों से इस सरकार के मंत्री भी घिर जाएं। मगर संदेश ये गया कि वे और आरएसएस मंत्रियों पर नियंत्रण रखना चाहते हैं। इस कारण कौन किसका निजी सचिव बनेगा, यह सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया। यह भी संवाद की कमी का ही नतीजा है। इसी तरह गोपाल सुब्रह्मण्यम को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के मसले पर संवाद की कमी खल रही है। मोदी और उनकी टीम बेहतर संवाद के लिए जानी जाती है। इसलिए उनसे अपेक्षा भी बहुत अधिक है। जिस तरह चुनाव के दौरान उनका संवाद हुआ, आवश्यकता उसी तरह की रणनीति की है। मीडिया, अफसरशाही और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो बाल की खाल निकालेगा ही। उसकी चिंता न करते हुए प्रधानमंत्री को सीधा संवाद जनता से करनी चाहिए ताकि अच्छे दिनों के लिए मेहनत की जिस तकलीफ देह खाई से गुजरना इस देश की मजबूरी रही है उसका फायदा वो लोग नहीं उठाएं जिन्हें देश में हो रहे दूरगामी बदलाव फूटी आंख भी पसंद नहीं।

उमेश उपाध्याय

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