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मन का दीप

आप कहते हैं क्या है गंवारपन मनुष्य के जीवन में? उसका गंवारपन है उसका अज्ञान। एक ऐसा आधा-अधूरा ज्ञान, जिसको वह जीवन भर ढ़ोता है। वह कहता है अनुभवी अपने आपको, पर क्या ये तथाकथित अनुभवी अपने जीवन में किसी आनंद को अनुभव कर पाए हैं? कहां है आनंद? अगर जानता हो जीवन को तो आनन्द का होना अनिवार्य है जीवन में। वह नहीं समझता कि मनुष्य का यह जीवन सम नहीं, स्थिर नहीं, परिवर्तनशील है। निरन्तर…। अगर हमें किसी एक कमरे में रखा जाए और हम रात की नींद में उठकर भी चले दें तो उसकी दीवारों या दरवाजे से चोट नहीं खाएंगे। यदि कमरा ऐसा हो, जिसकी दीवारें रात में बदल जाती हों तो हमारे बचने का कोई उपाय नहीं। ऐसा ही है जीवन। जब हम अपने अनुभव का डंका बजाए चले जाते हैं और जीवन की यात्रा कहीं नहीं पहुंचती, ये है हमारा गंवारपन। अगर हम दीया जला लें भीतर का, फिर कितनी भी दीवारें बदले उससे क्या फर्क पड़ता है। जब बोध हो गया, दीपक जल गया तो अब क्या! विडंबना यह है कि लोग पड़े हैं अहंकार के गड्ढ़ों में। आप कहते हैं जिसका दीया जल गया उसका क्या पाप, क्या पुण्य! लोग कहते हैं पाप से बचो, पुण्य करो। पर जब हम झांकते हंै भीतर अपने, तब पाते हंै कि चाहे पाप करने वाला हो या पुण्य करने वाला, दोनों ही अहंकार के गड्ढ़ों में हंै। जिसका दीया जल गया वह बुद्ध हो गया। किसी व्यक्ति ने पूछा बुद्ध के अप्रितम सौन्दर्य को देखकर – “आप कौन हैं?” बुद्ध मौन रहे। व्यक्ति बोला – “क्या आप स्वर्ग से उतरे कोई देवता हैं?” उन्होंने न में सिर हिलाया। फिर पूछा – “क्या आप किन्नर हैं?” बुद्ध ने फिर न में जवाब दिया। उस व्यक्ति ने फिर पूछा – “क्या आप चक्रवर्ती सम्राट हैं?” बुद्ध ने कहा – “नहीं।” असमंजस में खड़ा व्यक्ति बोला – “क्या आप मनुष्य हैं या फिर वह भी नहीं?” बुद्ध बोले – “नहीं।” व्यक्ति आश्चर्यचकित था। बुद्ध बोले – “मंै बुद्ध हूं।” बुद्ध का मतलब है जागा हुआ। जो बुद्ध है, प्रबुद्ध है, जागा हुआ सिर्फ जागा हुआ है, उसके लिए ये जगत सपना है। क्या पाप, क्या पुण्य, सब सपना है। जो बुद्ध है, वही धार्मिक है। वह एकमात्र पर्याय है धर्म का, सत्य का, सतचित्त का। वही ईश्वर है। वो हर वस्तु के मध्य में है। आज लोग रखते हैं उपवास। आप कहें उनसे न करे हिंसा अपने शरीर पर। जब वे कुछ नहीं खाते तो निरंतर मन भोजन को याद करता है। वह उस दिन को याद करता जब ये उपवास खत्म होगा। आप कहे उनसे न ज्यादा खाओ, न उपवास करो, तो कहेंगे वे ये सम्भव नहीं, क्योंकि मन अति मांगता है। वो या तो बहुत ज्यादा खाएगा या बिल्कुल नहीं। अति के दोनों छोर पर खड़ा होगा, मध्य में रहना नहीं उसे। लेकिन मन में जो दीया जला लेता है, मन को लेता है वैराग्य के मार्ग पर, तब ये मन अनुसरण करता है चेतना का, उस अंश का, जो बिछड़ा है, टूटा टुकड़ा है उस परमात्मा का, जो निरन्तर धड़कता है हममें प्राण बनकर। विडम्बना यह है कि हम जागृत नहीं हैं।

किसी ने मुल्ला नसीरुद्दीन से पूछा – “जीवन क्या है?” वे बोले – “सांसों का आना-जाना।” आज हमारी चेतना को चेताने की आवश्यकता है, नहीं तो हमारे और मुल्ला के जवाब एक होंगे। जब हम स्वस्थ नहीं होते तो पूरी जानकारी रखते हैं स्वस्थ रहने के बारे में। क्यों, जरूरत क्या है जानने की? वो इसलिए कि आप कहीं न कहीं स्वयं ही अस्वस्थ हैं, अन्यथा स्वस्थ आदमी को क्या जरूरत जानकारी की। स्वस्थ आदमी वह है जो जानकारी ही न रखता हो शरीर के सम्बन्ध में। जब तक हमारे सिर में दर्द न हो तो क्या हमें सिर की याद आती है, नहीं। स्वस्थ व्यक्ति वह है जो ‘विदेह’ है यानि शरीर से परे है, जो भूल गया है शरीर को। संस्कृत में एक शब्द है ‘वेदनाÓ। इसका अर्थ है दु:ख। लेकिन, इसका दूसरा अर्थ है वेद-ना, अर्थात वेद का ज्ञान। एक ही सिक्के के दो पहलू हंै – ज्ञान और दु:ख। जिसने दीया जलाया भीतर का, वो इन दोनों से ऊपर है, वो बुद्ध है, वो प्रबुद्ध है, जागा हुआ है। परमात्मा उसकी जिह्वा पर होता है, रोम रोम उसकी भाषा बोलता है। कहता है – “देख, मैं आ गया ‘साक्षात्Ó, साक्षी हो स्वयं का और दर्शन कर साक्षात् का।”

ललित अग्रवाल

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