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जाने कहां गये वो दिन?

जाने कहां गये वो दिन?

By संजय कुमार स्वामी

पूरे गली-मुहल्ले के बच्चे शाम ढलते ही इकट्ठा हो जाते थे। स्कूल से लौटकर बस्ता फेंकते ही गली में मां, दादी आवाज देती – अरे! पानी तो पी जा, कुछ खा ले। लेकिन, दोस्तों की पलटन में भूख, प्यास की परवाह किसे? ऊंच-नीच का लफड़ा, पीट्ठू-गरम से शुरू होकर आईस-पाइस तक पूरे गली मुहल्ले की नाक में दम करने तक चलता रहता। उधम मचाते छोटे-छोटे बच्चों की पलटन से, युवाओं की टोली तक सभी धमा-चौकड़ी करते जब तक दो-चार शिकायतें घरों में न पहुंच जायें तब तक क्या मजाल घर में कदम रखने की।

रात के खाने में दिन भर की शिकायतों का तड़का, चूल्हे की दाल को और लजीज बना देता था। जात-पांत, लड़का-लड़की, उम्र का कोई बन्धन नहीं। किसी का घर हो दीवार फांदकर गेंद उठाना, घर में कहीं भी छिप जाना शगल था। बबली की दादी बताती वहां छिप जा। कोई छोटू को अपने आंचल में ही छिपा लेती। बच्चों में बड़े भी बच्चे बन जाते और ताऊजी, ताईजी को हमारा बहाना कर खूब चिढ़ाते। क्या बचपन था हम लोगों का। सरकारी सहायता से परे कच्ची गलियां ही हमारे लिए बड़े-बड़े मकान ही और पार्क थे। किसी का खाली प्लॉट ही पूरे मुहल्ले का क्रिकेट का ग्राऊंड था।

गलियां सिमट-सिमट कर छोटी हों गयीं। प्लॉटों में बहुमंजिली फ्लैट बन गये। मकानों में दीवारें और दीवारों पर लोहे की जालियां चढ़ गईं और तरस गए उनमें झांकने को रिश्ते। चारों ओर क्या गांव, क्या कस्बे, क्या शहर सभी विकास की आंधी में सिमट रहे हैं। गांवों के तालाब, शहरों की झीलें, सभी पर कब्जा हो गया। शहरी पार्कों में पार्किंग, स्कूलों में इंजीनियर-ठेकेदार की जोड़ी ने खेल के मैदानों को उजाड़ दिया है। सरकारी फंड को ठिकाने लगाने के लिए विकास व नई योजना के नाम पर हरी घास उजाड़ गई। कच्ची मिट्टी पर टाईल्स लगा दीवारें खड़ी कर दी गईं। आर.डब्लू.ए. के महारथियों ने तो लगता है कभी बचपन जिया ही नहीं। पार्कों में छतरियां, सौन्द्रयीकरण के नाम पर टीलें-गड्ढे करवाकर और उसे सजावटी पौधों से ढंककर ठेकेदार पौ बारह कर रहे हैं।

गलियां-सड़के सब गाडिय़ों से अटी पड़ी हैं। दिल्ली पुरानी गाडिय़ों की सबसे बड़ी मंडी है। बच्चों की साइकिल के रेट पर पुरानी गाड़ी मिल जाती हैं। बेचारा बालमन गाड़ी में घूमने के ख्वाब में नयी साइकिल की जिद छोड़ देता है। छोटू की साइकिल के पैसे, मम्मी की गृह बचत और पापा के दोस्तों की उधारी से एक छकड़ा गाड़ी घर के बाहर आ खड़ी हो जाती है। दो चार महीने में पेट्रोल महंगा हो जाता है और गाड़ी परमानेन्ट खड़ी हो जाती है। फिर यही सिलसिला पूरे मुहल्ले में चलता रहता है। कहीं दहेज में तो कहीं गिफ्ट में गाडिय़ां आती-जाती हैं और धीरे-धीरे गली-मुहल्ले की सड़कें गाडिय़ों से पट जाती हैं।

पार्क तो उद्यान विभाग के विकास और आर. डब्ल्यू ने और गलियों को गाडिय़ों ने छिन लिए। अब प्लास्टिक की गेंद से गली में खेलना भी बंद हो गया। सारा शारीरिक व मानसिक विकास विडियो गेम, व्हाट्सऐप पर हो रहा है। सब कुछ हमसे छीन कर हम पर ही भड़ास निकालते हैं कि सारे दिन पड़े रहते हो, मोबाइल पर लगे रहते हो, खेलते-कूदते क्यों नहीं? टी.वी. भी हमारा नहीं। न्यूज बाबा की, प्रोग्राम मम्मा-अम्मा के, फोन पापा का, लेपटॉप चाचा का है। हमारे पास बचपना है…

करें तो क्या करें, जाएं तो कहां जाएं…
गिल्ली डंडा बजाये जहां

काश! गगन छूती इमारतों में मुट्ठी भर खुला आसमां हो जहां
निक्कू संग पतंग के पेंच लड़ायें वहां कुछ देर लट्टू घुमायें जहां

गिद्धों, भेडिय़ों से निष्कंटक जमीं हो जहां सखी सहेलियों संग सावन के गीत गाये वहां ऊंचे नीम की डार पे पींग बढ़ायें जहां

अम्बुआ की कच्ची केरी खायें जहां
बचपन को हम भी पंख लगायें वहांвелосипед украина ценараскрутка сайта онлайн бесплатно

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