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भोगा हुआ यथार्थ

जीवन के टेड़े-मेड़े रास्तों के अनुभव जब हृदय की सच्ची भावनाओं के साथ कागज पर अक्षरों का रूप लेते हैं, तो वह भोगा हुआ यथार्थ समाज के अंधेरों के लिए रोशनी का काम करता है। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर जंगे आजादी में कूदने वालों में शामिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र जगदीश प्रसाद जाखेटिया लगभग दो साल जेल में कैद रहे, लेकिन आजादी की जंग की मशाल थामे हुए उन्होंने आजादी से पूर्व और उसके बाद जीवन के संघर्षों में जिस यथार्थ को जाना उसे अपने जीवन के नौ दशकों बाद बहुत ही ईमानदारी और भावनापूर्ण, लेकिन सरल तरीके से पहले ‘पीड़ा’ में और फिर ‘मुफलिस की ईद’ की कहानियों और लघु कथाओं में प्रस्तुत कर दिया। नवभारत टाइम्स के पूर्व सम्पादक मधुसूदन आनंद ने इन कहानियों के बारे में सही टिप्पणी की है–”…जाखेटिया जी ने अपने जीवन के सारे अनुभवों को एक माला में पिरो दिया है।’’ कहानीकार डॉ. देवश ठाकुर ‘पीड़ा’ की कहानियों में सकारात्मक पक्ष को प्रबल बताते हैं।

मुफलिस की ईद

लेखक : जगदीश प्रसाद जाखेटिया

प्रकाशक : निरूपमा

मूल्य: 120 रु.

पृष्ठ: 128

उनका मानना है कि ‘मुफ लिस की ईद’ कहानी संग्रह में ‘लाडो’, ‘भूख’, ‘मां ही है’, ‘नूरो’ तथा ‘पानी का ऋण’ आदि कहानियां मानवीय संवेदनाओं की सूचक हैं। ये कहानियां समाज को उसका असली रूप दिखाने वाला दर्पण है। ‘पीड़ा में जहां गरीब और असहाय नारी के दर्द का मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रण दिखाई देता है, वहीं ‘नारी शक्ति’, ‘नूरो और भिखारिन’ कहानियों में महिलाओं की वास्तविक शक्ति, साहस और परिश्रम का जो परिचय मिलता है, वह आज के समाज के लिए अनुकरणीय है। जगदीश प्रसाद जाखेटिया की रचनाएं हिन्दुस्तान और धर्मयुग जैसी अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और आकाशवाणी नजीबाबाद के माध्यम से समाज तक पहुंचती रही हैं, लेकिन पुस्तक रूप में उनकी रचनाएं नौ दशकों की उनकी जीवन यात्रा के बाद ही पाठकों के हाथों में आई हैं। पाठकों से सीधे संवाद बनाते हुए ये रचनाएं जहां भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराधों पर चोट कर महिलाओं से जुड़ी समस्याओं के प्रति समाज को सचेत करती हैं, वहीं वे लेखक की संवेदनशीलता से भी परिचय कराती हैं। ये कहानियां समाज को सकारात्मक सोच का संदेश भी देती हैं। ‘प्यार का धर्म’ में बसीरन मरने के बाद अपनी आंखें और अपना निर्जीव शरीर ‘डाक्टरी स्कूल’ को देना चाहती है, जिससे उसकी आंखों से किसी अन्य का जीवन रोशन हो सके और छात्र डाक्टरी पढ़ सकें। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ और ‘लाडो’ से भी समाज को सकारात्मक संदेश मिलता है। ‘वतन के बच्चे’ और ‘मिट्टी मिला दो’ मातृभूमि के प्रेम की कहानियां हैं, जबकि ‘वेदना’ और सर्वेक्षण’ आधुनिकता के प्रभाव का बोध मिलता है। ‘नूरो’ मर्यादा में रहते हुए बेसहारा महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने और जीवन का उद्देश्य समझाने वाली एक मुस्लिम महिला की संघर्ष गाथा है। भावनापूर्ण शेरो-शायरी में रखी गई ‘मेरी अपनी बात’ से लेखक के भीतर छिपा जंगे-आजादी का सिपाही पाठक के समक्ष आ जाता है।

उदय इंडिया ब्यूरो

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