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आवश्यक है बच्चें का संतुलित विकास

बालक को ‘स्मार्ट’ के साथ ही साथ ‘गुड’ भी बनाना जरूरी है। ‘गुड’ अर्थात ‘अच्छे हृदय’ का बालक। ऐसा बालक अपने जीवन की किसी भी प्रकार की परिस्थितियों में सदैव दूसरों को सुख ही पहुंचाता है। वह विश्व के लिए प्रकाशपुंज बनता है। अपने बालक को ‘विश्व का प्रकाशपुंज’ बनाने के लिए बालकों को संतुलित शिक्षा देने के अभियान में अभिभावकों को स्कूल के साथ पूरा सहयोग करना चाहिए।

परीक्षा परिणामों को किसी बालक के सम्पूर्ण जीवन का पैमाना नहीं माना जा सकता। परीक्षा परिणाम किसी छात्र की एक वर्ष के दौरान स्कूल में हुई प्रगति का मापदंड होता है। परीक्षा परिणाम इस बात की कतई गारंटी नहीं है कि वह बालक जीवन में सफल होगा या असफल? केवल भौतिक ज्ञान में वृद्धि होना और सामाजिक व आध्यात्मिक ज्ञान न्यून हो जाने की स्थिति संतुलित नहीं कही जा सकती है। इसी असंतुलन के कारण आगे चलकर बालक अपने जीवन में असफल हो सकता है। पूरे वर्ष मेहनत तथा मनोयोग से पढ़ाई करके स्कूल का परिणाम अच्छा बनाया जा सकता है, परन्तु सफल जीवन तो भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक, तीनों शिक्षाओं के संतुलन का योग होता है।

परीक्षा परिणाम केवल विभिन्न विषयों के भौतिक ज्ञान का आईना मात्र होता है। स्कूल में बच्चों की पढ़ाई इस प्रकार से होती है कि बालक अच्छे अंकों से परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाए। माता-पिता का भी पूरा ध्यान अपने बच्चों को परीक्षा में मिले अंकों की ओर ही होता है। समाज के लोग भी मात्र यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि बालक ने सम्बन्धित विषयों में कितने अंक प्राप्त किए हैं। किसी का भी इस बात की ओर ध्यान नहीं जाता कि बालक में सामाजिक एवं आध्यात्मिक गुण बाल्यावस्था से ही विकसित करने उतने ही आवश्यक हैं जितने उसमें पुस्तकीय ज्ञान विकसित करना।

ऐसा नहीं कि स्कूल-कॉलेजों में कामयाब होने वाले बच्चे अपने जीवन में हमेशा कामयाब ही हुए हैं। कभी-कभी कामयाब बच्चे भी अपने जीवन में नाकामयाब हुए हैं और इसके विपरीत भी हुआ है। ऐसे भी उदाहरण हैं कि आरम्भ में नाकामयाब रहने वाले लोग अन्तत: कामयाब हुए और विश्व में नाम कमाया। इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल अपने स्कूली दिनों में परीक्षा में बार-बार असफल हुए। परीक्षाओं में वह बार-बार फेल हुए, लेकिन अपनी असफलता से कभी निराश नहीं हुए और बाद में अपने आत्मविश्वास के बल पर वह इंग्लैंड के लोकप्रिय प्रधानमंत्री बने। उन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का उदाहरण लें। वह 32 बार छोटे-बड़े चुनाव जीतने में नाकामयाब रहे थे, लेकिन 33वीं बार के प्रयास में वह कामयाब होग गए और राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए। वह विश्व में सबसे लोकप्रिय अमेरिकी राष्ट्रपति बने।

प्रसिद्ध कहावत है, ‘मन के हारे हार है, मन की जीते जीत।’ थॉमस अल्वा एडीसन बल्ब का आविष्कार करने के दौरान 10 हजार बार असफल हुए थे। इसके बावजूद भी एडीसन ने आशा नहीं छोड़ी थी, अन्तत: वह बल्ब का आविष्कार करने में सफल हुए। महात्मा गांधी ने हाईस्कूल परीक्षा थर्ड डिवीजन में पास की थी। लेकिन अपनी मेहनत, लगन एवं ईश्वर पर अटूट विश्वास के बल पर वह जीवन में एक कामयाब व्यक्ति बने और अपने जनहित के कार्यों के कारण सदा-सदा के लिए अमर हो गए।

इसमें शायद दो राय नहीं होंगी कि जीवनयापन के लिए भौतिक शिक्षा अति आवश्यक है। यह सोचना उचित नहीं है कि परीक्षा परिणाम यदि अच्छा आ गया हो, तो जीवन में सफल हो गये या रिजल्ट खराब हो गया तो जीवन में असफल हो जी जाएंगे। जीवन में संतुलन जरूरी है। रिजल्ट कार्ड भौतिक ज्ञान की उपलब्धियों का पुरस्कार है। रोटी कमाने के लिए भौतिक शिक्षा जरूरी है। मनुष्य पढ़-लिखकर अर्थात भौतिक ज्ञान अर्जित करके मेहनत से रोटी कमाएगा। यदि यह नहीं करेगा, तो चोरी करेगा या भीख मांगने का रास्ता अपनाएगा। आज के समय में व्यापार करने के लिए भी विभिन्न तरह के फॉर्म आदि भरने पड़ते हैं। अर्थात् व्यापार में पढ़ा-लिखा व्यक्ति ज्यादा तेजी से तरक्की करता है। कम्प्यूटर के ज्ञान के बिना पढ़ाई भी आज बेकार लगती है।

बालक को स्मार्ट होने के साथ ही साथ उसमें अन्य गुणों का समावेश होना भी जरूरी है। स्कूलों में मिलने वाला परीक्षा परिणाम तो बालक के जीवन का मात्र एक हिस्सा है। भौतिक शिक्षा बालक को रोटी कमाने के लिए तैयार करने में तो सहायक है, किन्तु जीवन को सुखी बनाने के लिए उसे भौतिक के साथ ही साथ सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षा देने की भी आवश्यकता है। बालक को ‘स्मार्ट’ के साथ ही साथ ‘गुड’ भी बनाना जरूरी है। ‘गुड’ अर्थात ‘अच्छे हृदय’ का बालक। ऐसा बालक अपने जीवन की किसी भी प्रकार की परिस्थितियों में सदैव दूसरों को सुख ही पहुंचाता है। वह विश्व के लिए प्रकाशपुंज बनता है। अपने बालक को ‘विश्व का प्रकाशपुंज’ बनाने के लिए बालकों को संतुलित शिक्षा देने के अभियान में अभिभावकों को स्कूल के साथ पूरा सहयोग करना चाहिए।

यह नहीं भूलना चाहिए कि बच्चे ही हमारी असली पूंजी हैं। जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता है, उसी तरह उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ती है। अत: हमें भी बच्चे के मानसिक विकास के अनुरूप बदलना चाहिए। यदि बाल्यावस्था में संस्कार-व्यवहार विकसित करने के लिए बच्चे को स्वस्थ वातावरण नहीं मिले, तो युवावस्था में प्रगतिशील गुणों के अभाव में उसे जीवन की परीक्षा में सफल होने में कठिनाई होती है। अभिभावक उस समय उसके आस-पास नहीं होंगे। गुणों को विकसित करने की सबसे अच्छी अवस्था बचपन की होती है।

बच्चों के जीवन निर्माण में परिवार, समाज और स्कूल का एकताबद्ध प्रयास जरूरी  

बच्चों के जीवन-निर्माण में परिवार, समाज और स्कूल को मिलकर सकारात्मक वातावरण विकसित करना होगा। इसके लिए परिवार, समाज और स्कूल को बच्चों कीपरीक्षा के परिणाम को उनके जीवन की सफलता का पैमाना न बनाते हुए प्रत्येक बालक को जीवन की परीक्षा के लिए तैयार करना होगा। प्रत्येक बालक को सर्वश्रेष्ठ भौतिक शिक्षा के साथ ही सामाजिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा देकर उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना होगा। इस प्रकार संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण शिक्षा के माध्यम से निर्मित प्रत्येक बालक सम्पूर्ण जीवन की परीक्षा के लिए तैयार होगा और ऐसी ही पीढ़ी के द्वारा एक सुन्दर एवं सुरक्षित समाज की स्थापना भी हो सकेगी।

डॉ. जगदीश गांधी

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