ब्रेकिंग न्यूज़ 

हाथी:साथी या सिरदर्द?

वैज्ञानिकों को हमेशा से शक था कि हाथी हमेशा मधुमक्खियों से दूर रहना पसंद करते हैं। कीनिया में प्रेक्षकों ने ध्यान दिया है कि हाथी मधुमक्खी के छत्ते वाले पेड़ों को अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। जिम्बाब्वे में शोधकर्ताओं ने देखा कि मधुमक्खी के छत्ते से बचने के लिए हाथियों ने अपना रास्ता ही बदल दिया। भारत में भी यही पाया गया है कि जंगली हाथी मधुमक्खियों के छत्तों वाले क्षेत्रों से दूरी बनाए रखते हैं।

लगभग हर बच्चे ने यह कहानी सुनी होगी कि हाथियों को चूहों से डर लगता है। लेकिन, एक खोज में वैज्ञानिकों को पता चला है कि सही मायने में हाथियों को मधुमक्खियों से डर लगता है। वे आज के समय में भूमि पर जीवित सबसे बड़े जानवर हैं, फिर भी मधुमक्खी की भनभनाहट से वह भागने लगते हैं। इस नई खोज से हाथी, मनुष्य और उनकी फसलों को बचाने में मदद मिल सकती है।

वैज्ञानिकों को हमेशा से शक था कि हाथी हमेशा मधुमक्खियों से दूर रहना पसंद करते हैं। कीनिया में, प्रेक्षकों ने पाया कि हाथी मधुमक्खी के छत्ते वाले पेड़ों को अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। जिम्बाब्वे में शोधकर्ताओं ने देखा कि मधुमक्खी के छत्ते से बचने के लिए हाथियों ने अपना रास्ता ही बदल दिया।

भारत में भी यही पाया गया है कि जंगली हाथी मधुमक्खियों के छत्तों वाले क्षेत्रों से दूरी बनाए रखते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा खोजा गया हाथियों का यह डर अब उन्हें बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

मनुष्य और पशुओं के संघर्ष से असहिष्णुता पैदा हो जाती है और अपनी जीवकोपार्जन के लिए पहले से ही संघर्षरत लोग, एक ही रात में हाथियों द्वारा उनके पूरे साल की मेहनत को नष्ट किए जाने से बचाने के लिए लगातार निगरानी से थक जाते हैं, जिससे हाथियों के प्रति उनके मन में गुस्सा भर जाता है। फसलों और मानव बस्तियों से हाथियों को बचाने के लिए कई तरीकों को इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसे ड्रम बजाना और पटाखे फोडऩा। अन्य तरीके जैसे तीखी मिर्च, तंबाकू और गोबर या घास के मिश्रण को खेतों के किनारे पर जलाया जाता है। जलती हुई मिर्च और तम्बाकू हाथियों के लिए बड़े अवरोधक का काम करते हैं। उनकी सूंढ बहुत संवेदनशील होती है और इन बदबुओं से वह उस क्षेत्र में नहीं जाते। ओडिशा के तिकरपड़ा के जंगलों में ग्रामीण इस्तेमाल हो चुकी सीडी को एक तार में बांधकर उस पर टॉर्च से रौशनी डालते हैं। सीडी की सतह पर से होने वाली रौशनी की उच्च परावर्तन से हाथी डर कर भाग जाते हैं। इसी तरह फसलों के ढेर को मिर्च-तम्बाकू पेस्ट के साथ लेपित रस्सियों से बाड़ बनाकर सुरक्षित रखा जाता है।

अगर 2013 की बात करें तो पिछले 100 वर्षों में एशिया में हाथियों की आबादी में 90 प्रतिशत गिरावट आई है और गणना के अनुसार इसी अवधि में लगभग 95 प्रतिशत हाथियों का मूल निवास स्थान खो गया है। भारत में मनुष्य-हाथी के संघर्ष का कारण उनके सिकुड़ते वन क्षेत्र हैं। हाथियों की यह छोटी आबादी आगे जाकर क्षेत्रों में और बंट जाएगी। यह वास भी तेजी से सिकुड़ रहा है और जंगली हाथी ज्यादातर छोटे और सूनसान क्षेत्र में रह रहे हैं, क्योंकि उनके प्राचीन आवास पर मानव बस्तियां बस गईं हैं।

हाथी-मानव संघर्ष दोनों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है, जिसके कारण संरक्षणवादी भी चिंतित हैं। ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड में हाथियों की आबादी लगातार घट रही है, क्योंकि दर्जनों हाथी अवैध शिकार के ग्रास बन गए हैं। शिकारी और प्रभावित ग्रामीण हाथियों को जहर देकर, बिजली का करंट देकर या फिर गोली मारकर उनका शिकार कर रहे हैं। विशेषज्ञ एशिया में इस तरह के टकराव को हाथियों की मौत का प्रमुख कारण मानते हैं।

एक अकेला भूखा हाथी पूरे परिवार की फसल को एक ही रात में साफ कर सकता है। किसान को फसल के मौसम के दौरान पूरी रात मशाल जलाकर घूमना पड़ता है। हाथी के पास आते ही किसान ज्वलंत लाठी के साथ चल पड़ते हैं और उनके बच्चे बर्तन से आवाज निकालते रहते हैं। सभी क्षेत्रों में पहरा तो नहीं दिया जा सकता और कभी-कभी हाथी भी भयभीत नहीं होते हैं।

सही तरह से रखा गया मधुमक्खियों का छत्ता हाथियों को दूर रखता है। इससे अक्सर होने वाले मानव-हाथी संघर्ष, जिसमें हाथियों को मार दिया जाता है, भी कम हो जाता है। झारखंड और ओडिशा में ग्रामीणों को जब छत्ते के बारे में बताया गया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ और उन्हें असंभव लगा कि हाथी जैसा विशाल और शक्तिशाली जीव को भी छोटी मधुमक्खियों का डर हो सकता है। एक मधुमक्खी का डंक मनुष्य के लिए पीड़ा का विषय हो सकता है और उसे सहन करने के लिए भले ही हाथी की मोटी चमड़ी पर्याप्त है, लेकिन अगर आंख, कान या सूंड जैसे उनके संवेदनशील अंगों पर मधुमक्खियां डंक मार दें तो यह उनके लिए बेहद दर्दनाक साबित हो जाता है।


गजपति का पतन


ओडिशा में राजाओं को ‘गजपति’ के नाम से संबोधित किया जाता था। यह संबोधन आज भी कायम है। वर्तमान में पुरी के महाराजा, जो भगवान जगन्नाथ के मुख्य सेवक हैं उनको भी ‘गजपति’ नाम से संबोधित किया जा रहा है। ओडिशा के घने जंगल जो पहले हाथियों से भरे रहते थे अब वो तेजी से कब्रिस्तान में बदलते जा रहे हैं। यहां गत् पांच वर्षों में लगभग 400 हाथियों की मौत हो चुकी है।

इलैक्ट्रॉक्यूशन या बिजली द्वारा प्राणदण्ड, चाहे वो आकस्मिक हो या फिर जानबूझकर लेकिन प्रदेश में हाथियों की मृत्यु का यही मुख्य कारण है। पिछले एक दशक में राज्य में बिजली के कारण लगभग 116 हाथियों की मौत हो चुकी है। उनमें से 46 हाथियों को जानबूझकर मारा गया, वहीं दूसरी तरफ 70 हाथी आकस्मिक मौत के शिकार हो गए। लगभग 7 हाथियों की ट्रेन से कटकर मौत हुई और 16 की अन्य दुर्घटनाओं मे हुई।

वन और ऊर्जा विभागों के बीच समन्वय की कमी बड़े पैमाने पर बिजली से हाथिओं की मौत का कारण है। गत् वर्ष ऊर्जा मंत्री ने कहा कि ‘यह वन और पर्यावरण विभाग की जिम्मेदारी है कि वह समय पर ऊर्जा विभाग को हाथियों के मार्ग के बारे में सूचित करे।’ वन और पर्यावरण विभाग ने इन मौतों के लिए जिम्मेदार बिजली विभाग के इंजीनियरों के खिलाफ मामले दर्ज किए हैं।

सरकार ने ओडिशा से हाथियों की घटती आबादी के डर को ये तर्क देकर नकार दिया कि हाथियों की मृत्यु दर से ज्यादा उनकी जन्म दर है। यहां हाथियों का अंर्तराज्यीय प्रवासन भी किया जाता है, खासकर झारखंड से। सघन वनों के कारण कम से कम 25 हाथियों को ओडिशा के क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों में स्थानांतरित किया गया है। इसके अलावा, ओडिशा में मादा हाथियों की दर बाकी राज्यों की तुलना में ज्यादा है, जो इनके विकास दर को और भी बेहतर बनाएगा।

संरक्षणवादियों ने राज्य में हाथियों की स्थिति को चर्चा का विषय बताया है। उन्होंने वन भूमि के डायवर्जन, गाडिय़ों की बढ़ती आवृत्ति, सिंचाई परियोजनाएं, बिजली कनेक्शन में वृद्धि और खनन के लिए भूमि के तर्कहीन आवंटन को हाथियों की मौत का प्रमुख कारण बताया है।

जहां एक तरफ लोग वन विभाग के अधिकारियों को हाथियों की मौत का जिम्मेदार मानते हैं वहीं अधिकारी श्रमशक्ति की गंभीर कमी को दोषी मानते हैं। 40 प्रतिशत स्वीकृत पद अब भी खाली पड़े हैं। इसके अलावा, आजकल शिकारी भी बेहतर नवीनतम हथियारों से लैस हैं।

वन्यजीव कार्यकर्ता विश्वजीत मोहंती ने कहा – ”ओडिशा के प्रस्तावित हाथी रिजर्व क्षेत्रों में मेगा बॉक्साइट और लौह-अयस्क के खनन से हाथियों की आबादी गंभीर रूप से प्रभावित होने वाली है।’


कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तरांचल और झारखंड के किसानों को ‘मधुमक्खियों का बाड़’ बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। इसमें छत्ते को खंभे से लगभग दस मीटर की दूरी पर टांग दिया जाता है। खंभे से जुड़ी एक लंबी तार हाथी के आने पर स्विंग करती है, जिससे मधुमक्खियों को परेशानी होती है। फिर मधुमक्खियों का झुंड हाथियों के पास भिनभिनाने लगता है और अपनी धीमी गडग़ड़ाहट से अन्य हाथियों को चेतावनी देता है। वन अधिकारियों के अनुसार, एक बार मधुमक्खी का डंक लगने के बाद हाथी उस क्षेत्र विशेष में दुबारा नहीं जाते। इस योजना को पिछले तीन वर्षों से उत्तरी कर्नाटक के दान्डेली-अंशी टाइगर रिजर्व में लागू किया है और इसके परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। परियोजना में भाग लेने वाले 35 गांवों के किसानों ने कहा कि जबसे इन उपायों को लागू किया है हाथियों ने उनके क्षेत्र में उत्पात मचाना कम कर दिया। हाथियों का मानव निवास स्थान पर धावा बोलने का मुख्य कारण जंगलों में भोजन और पानी की कमी है। लेकिन मधुमक्खियों के छत्ते वाली बाड़ हाथियों को मानव निवास से दूर रखना सुनिश्चित कर देती है।

सरकार किसानों को मधुमक्खी और छत्ते खरीदने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए एक योजना लागू करने जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि यह एक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल विधि है और इससे हाथियों को कोई स्थायी नुकसान भी नहीं होता। इसके अलावा, किसानों को शहद से अतिरिक्त आमदनी भी मिल सकती है। यह आदमी और जानवर, दोनों के लिए वास्तव में एक जीत की स्थिति है। सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई पारंपरिक मधुमक्खी बॉक्स की कीमत 2,500 रुपए प्रति बॉक्स है, जो महंगी तो है लेकिन किसानों को एक सस्ता विकल्प मिल गया है। वे अपने खेतों के किनारों पर मधुमक्खियों के मोम से लेपित साधारण मिट्टी के मटके रख देते हैं। कुछ समय के बाद, उन मटकों पर मधुमक्खियों का झुंड बैठने लगता है। इस तरह किसान अपनी फसलों की रक्षा करने में सक्षम हो जाते हैं।

हाथी एक होशियार जीव होता है। फसल को तबाह करने की ये आदत उन्हें अक्सर पीढिय़ों के माध्यम से मिलती हैं। हाथी एक दूसरे को सिखा सकते हैं और शायद मनुष्य भी हाथियों को थोड़ी सूझ-बूझ से उनको बहुत कुछ सिखा सकते हैं।

किसानों और हाथियों के बीच के रिश्ते में सुधार लाना सर्वोपरी है। हाथियों को बिना डर के खाने-पीने और घूमने की छूट मिलनी चाहिए। किसानों को भी हाथी के डर से मुक्त रहना चाहिए। इसके लिए ऐसा समाधान होना चाहिए जो सस्ता, सुरक्षित और टिकाऊ हो।

अनिल धीर

 

 blablafitnessukladka-parketa

Leave a Reply

Your email address will not be published.