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डिजिटलीकरण का घमासान

भारत में पहले दो चरणों की डिजिटलीकरण की प्रक्रिया देखी गई है और परिणाम काफी हताशाजनक रहे हैं। भारत में लगभग 24 करोड़ परिवार हैं, जिसमें से 16 करोड़ परिवारों में टीवी है। जिनके घरों में टीवी है उसमें से 8 करोड़ के यहां केबल कनेक्शन, 6.5 करोड़ के यहां डायरेक्ट-टू-होम (डीटीएच) कनेक्शन और लगभग 1.5 करोड़ घरों में डीडी डायरेक्ट का कनेक्शन है।

भारत में केबल नेटवर्क के डिजिटलीकरण की कई कहानियां हैं। कुछ लोग इसे टीवी देखने का अनुभव को पूरी तरह बदलने वाला मानते हैं, तो कुछ लोग एक बुरा अनुभव। डिजिटलीकरण को एक ऐसे मंच के रूप में देखा गया है जिससे उद्योग के पूरे परिदृश्य को बदलने की ताकत मिलती है। इस प्रक्रिया के द्वारा सरकार को कर वसूली में मदद और प्रसारकों के लिए अच्छी व्यापारिक स्थिति मिल सकती है।

नई सरकार भी देश को पूरी तरह से डिजिटलाईज करने के लिए उत्सुक है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि उनकी सरकार का मकसद तेजी से कार्य करने का है। उन्होंने कहा कि नई सरकार के जनादेश को ध्यान में रखते हुए उनका प्रयास रहेगा कि जल्द से जल्द लंबित मुद्दों पर निर्णय हो। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार का नारा है कि ‘देरी बाहर है, निर्णय अंदर है’। उन्होंने नई दिल्ली में एसोचैम द्वारा आयोजित स्क्रीन 2014 की बैठक में कहा कि सरकार का काम बाधा डालने का नहीं, बल्कि उद्यमशीलता और उद्योग को प्रोत्साहन देने का है। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि डिजिटलीकरण की पहल देश में टेलीविजन प्रसारण की गुणवत्ता में सुधार में मददगार होगा। सरकार और उद्योग दोनों को उपभोक्ताओं के कल्याण के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

उनके उद्घाटन भाषण ने प्रसारण उद्योग के लिए एक दवा का काम किया, क्योंकि उन्होंने संकेत दिया है कि वर्तमान सरकार के शब्दकोश से देरी शब्द को बाहर करके कार्य कुशलता और जल्द से जल्द निर्णय लेना प्राथमिकता है। भारत में पहले दो चरणों की डिजिटलीकरण की प्रक्रिया देखी गई है और परिणाम काफी हताशाजनक रहे हैं। भारत में लगभग 24 करोड़ परिवार हैं, जिसमें से 16 करोड़ के घरों में टीवी है। जिनके घरों में टीवी है उसमें से 8 करोड़ के यहां केबल कनेक्शन है, जबकि 6.5 करोड़ घरों में डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) कनेक्शन और लगभग 1.5 करोड़ घरों में डीडी डायरेक्ट का कनेक्शन है। भारत को एक संभावित बाजार के रूप में देखा जा रहा है। पहले चरण में लगभग 8-10 लाख लोगों के घर में डिजिटलीकरण हुआ था, जबकि द्वितीय चरण में शामिल 38 शहरों के सिर्फ 12-14 लाख लोगों के घरों में ही डिजिटलीकरण हो पाया था। अब आशा केवल तीसरे और चौथे चरणों पर है, जिसमें आने वाले समय में करीब चार से पांच करोड़ लोगों के घरों को डिजिटलाईज किया जाएगा।

इतनी अच्छी संख्या होने के बावजूद, केबल और प्रसारण क्षेत्र अभी भी अपने सिस्टम को सही पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है। डिजिटलीकरण के विभिन्न चरणों के कार्यान्वयन में देरी के कारण प्रति उपयोगकर्ता सदस्यता राजस्व और औसत राजस्व में उछाल का वादा पूरा नहीं हो पाया है।

डिजिटलीकरण का मतलब था प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना, सरकार के लिए राजस्व जुटाना, चैनलों के लिए सही टीआरपी पाना और उपभोक्ताओं को केबल सेवाओं की अच्छी गुणवत्ता उपलब्ध कराना, लेकिन यह सब नाकाम रहा। शहरों और कस्बों के डिजिटलीकरण वाले चरणों को लागू करने में अड़चनों के बारे में पता होने के बावजूद, प्रसारक काफी आशान्वित थे कि कैरिज फीस से उन्हें बहुत कुछ मिल सकता है।

कराधान उनकी मुख्य समस्याओं में से एक बन गया है, क्योंकि उन्हें दोहरा कर देना पड़ता है। वर्तमान में एक डीटीएच ऑपरेटर को 33 प्रतिशत कर देना होता है, जिसमें 12.5 प्रतिशत सेवा कर और औसतन 10.5 प्रतिशत मनोरंजन कर होता है। यह सभी कर परोक्ष रूप से ग्राहकों से ही लिए जाते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, डीटीएच कंपनियों को लगभग 20,000 करोड़ रुपये का नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

एक और बड़ी समस्या सेट टॉप बॉक्स की है। डिजिटलीकरण की पूरी प्रक्रिया में सभी सेट टॉप बॉक्स चीन से आयात किये गए हैं। अब इन बॉक्सों की काफी शिकायतें आ रही हैं। लोग अपने घरों और व्यावसायिक संगठनों में स्थापित डिजिटल सेट टॉप बॉक्स के बारे में शिकायतें कर रहे हैं। दृश्य और श्रव्य में गड़बड़ी और समय-समय पर चैनेलों का बंद हो जाना, पूरी डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को सवालों के घेरे में ला दिया है। भारत में इन बॉक्सेस के उत्पादन के लिए समर्पित कारखानों की स्थापना अभी तक नही हुई है। अगर भारत में सेट टॉप बॉक्स का उत्पादन शुरू हो जाए तो इससे न केवल यह सस्ते और आसान रूप से संभाले जा सकेंगे, बल्कि देश में लोगों के लिए भारी रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकेंगे।

सेट टॉप बॉक्स लगाने की जल्दी में केबल ऑपरेटर्स ने उपकरण की स्थापना से पहले केबल का उपयोग फॉर्म (सीएएफ) को भरने जैसे महत्वपूर्ण कदम की अनदेखी कर दी है। डिजिटल पता प्रणाली (डी.ए.एस) को अनिवार्य करने का उद्देश्य देश में केबल दर्शकों की वास्तविक संख्या की पहचान करने का था, लेकिन ज्यादातर ग्राहकों का फार्म न भरने के कारण यह लक्ष्य अभी भी अधूरा है।

डिजिटलीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से केबल इंडस्ट्री ने काफी बदलाव देखे हैं। मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओएस) ने धीरे-धीरे टीवी पर दिखाई दे रहे कंटेंट पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया है, जो पहले स्थानीय केबल ऑपरेटर्स (एलसीओस) के पास था। स्थानीय केबल ऑपरेटरों के व्यवसाय की अघोषित कमाई की मलाई का एक बड़ा हिस्सा सीधे उनकी जेबों में जाती थीं। इससे बढ़ता राजस्व काफी प्रभावित होता था। डिजिटलीकरण होने से सेट टॉप बॉक्स (एस.टी.बी) और ग्राहक परिसर (ग्राहक आवेदन प्रपत्रों या सीएएफ) का अनिवार्य पंजीकरण के माध्यम से इस ग्राहक भुगतान तंत्रिका में पारदर्शिता की उम्मीद जगी है। इन प्रपत्रों द्वारा पंजीकृत उपयोगकर्ताओं के विवरण और उनके पसन्द के चैनलों की जानकारी मिल सकती है और पूरी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो सकती है।

डिजिटलीकरण में लाइसेंसिंग भी एक बड़ी समस्या है, जिसने पूरी प्रक्रिया को और भी जटिल बना दिया है। वर्तमान में किसी को अपना केबल नेटवर्क शुरू करने से पहले विभिन्न मंत्रालयों से कई तरह की अनुमतियां लेनी पड़ती हंै। इसके कारण लाइसेंस हासिल करने में बहुत देरी होती है। 25 से अधिक वर्षों से इस क्षेत्र में जमे केबल ऑपरेटरों को नए लाइसेंस हासिल करने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है और यह बुरी तरह से उनके व्यापार को नुकसान पहुंचा रहा है। सरकार को एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसके द्वारा लाइसेंस की प्रक्रिया आसान और असरदार हो जाए। भारत तब तक शत-प्रतिशत डिजिटलाइज देश नहीं बन सकता, जब तक कि उसकी प्रक्रिया में उचित संतुलन नहीं आ जाए।

रोहन पाल

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