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एनजीओ: कितने सार्थक

सरकार ने ऐसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर लगाम कसने का निर्णय लिया है, जो अपने विदेशी फंड का इस्तेमाल अपने उद्देश्य से परे राजनीतिक गतिविधियों के लिए करते हैं और देश की राजनैतिक-आर्थिक गतिविधियों में बाधा डालने की कोशिश करते हैं। बेशक, ये एनजीओ अपने घोषित मकसद के अलावा गुप्त एजेंडे के साथ काम करते हैं और देशहित को चोट पहुंचाते हैं।

महज महीने भर पुरानी मोदी सरकार ने गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के खतरनाक छत्ते में हाथ डालने का साहस कर दिखाया है। सोसाइटी रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, ट्रस्ट ऐक्ट सहित विभिन्न अधिनियमों के तहत कराए गए लगभग 20 लाख एनजीओ के पंजीकरण पर निर्णय लेने के लिए इच्छाशक्ति और साहस की जरूरत है। इन सबमें फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन (रेग्यूलेशन) ऐक्ट के तहत पंजीकृत एनजीओ की संख्या मात्र दो फीसदी (43,525) है, लेकिन पिछले साल 2013 में इन्हें विदेशों से चंदे के रूप में लगभग 12,500 करोड़ रुपए की राशि प्राप्त हुई। 2011-12 में इन एनजीओ को विदेशों से प्राप्त होने वाली राशि 11,546.29 करोड़ रुपए थी। लेकिन, मुश्किल से उसके मात्र दो प्रतिशत के बारे में सूचना दी गई।

इन तथ्यों से कल्पना ही की जा सकती है कि यह चुनौती कितनी डरावनी है। पिछले वर्षों के दौरान 11,500 करोड़ से 12,500 करोड़ रुपए के बीच विदेशी चंदे पाने वाले 43,527 एनजीओ का इस्तेमाल देश में राजनैतिक और आर्थिक हस्तक्षेप के लिए किया जाता रहा है। उनसे जुड़े लोगों की तादाद भी बड़ी है, जो अराजकता फैलाने के लिए पर्याप्त है। इनके सदस्यों और ‘वॉलेंटियर्स’ के अलावा इसके लाभ पाने वालों की संख्या भी हजारों में है। एक रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी चंदों का 50 से 70 प्रतिशत हिस्सा उसके संस्थापकों ने अपने निजी इस्तेमाल में खर्च किया, जो विदेशी चंदा प्राप्त करने की बुनियादी शर्तों का घोर उल्लंघन है। लेकिन यह तभी साबित हो सकता है, जब विदेश मंत्रालय द्वारा भेजे गए नोटिस का अनुपालन हो। हालांकि उनके पास इसका जवाब भेेजने का समय है, लेकिन वे सामाजिक टिप्पणीकारों, मीडिया और नेता, वामपंथी और बुद्धिजीवियों के माध्यम से विशाल संसाधनों का प्रयोग सरकार से लड़ाई लेने में कर रहे हैं। ये सभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विपक्ष में होने के लोकतांत्रिक अधिकार का दावा करते हैं।

सरकार ने अब लड़ाई को उसके निष्कर्ष तक पहुंचाने का संकल्प लिया है। सरकार ने ऐसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर लगाम कसने का निर्णय लिया है, जो अपने फंड का इस्तेमाल अपने उद्देश्य से परे राजनीतिक गतिविधियों के लिए करते हैं। एनजीओ की राजनीतिक गतिविधियों में शिरकत पूर्णतया प्रतिबंध है।

फस्र्टपोस्ट में जय मजूमदार ने जांच की जरूरतों पर उपयोगी सुझाव दिए हैं। वे कहते हैं, ”निश्चित रूप से हमें ‘विच-हंट’ की जरूरत नहीं है। बिना विच-हंट के उनके कामकाज पर निगाह रखने की जरूरत है, ताकि पता चले कि एनजीओ क्या कह रहे हैं और क्या कर रहे हैं। साथ ही उन्हें चुनौती देने की जरूरत भी है।’’

”सरकार अथवा जो सत्ता में हैं, उन्हें एनजीओ द्वारा चुनौती देना ही लोकतंत्र नहीं है, इसका मतलब देश के नागरिकों और सरकार द्वारा एनजीओ के दावों को चुनौती देना भी है। यह चुनौती साफ तौर पर तथ्यों, मुद्दों और दावों पर आधारित होनी चाहिए।’’

”एनजीओ द्वारा विदेशी चंदों की प्राप्ति और उसके इस्तेमाल पर एक रिपोर्ट का गृह मंत्रालय खुलासा करने जा रही है। यद्यपि बड़े पैमाने पर संगठनों द्वारा विदेशी चंदों की प्राप्ति और उसके इस्तेमाल में वृद्धि हो रही है, इसलिए यह चिंता का विषय है कि बड़े पैमाने पर पंजीकृत संगठन अभी भी कानूनी रूपी से आवश्यक अपनी वार्षिक रिपोर्ट नहीं जमा कर रहे हैं।’’

अफसोसजनक रूप से इसके राजनीतिक पक्ष भी हैं। वाराणसी में नरेन्द्र मोदी की हार सुनिश्चित करने के लिए विदेशी चंदा प्राप्त लगभग 150 गैर-सरकारी संगठनों ने अभियान चलाया। इसमें सबसे मुखर और मीडिया के ‘पोस्टर ब्वॉय’ अरविंद केजरीवाल के पास भी अपना एनजीओ है, जिसे विदेशों से चंदे मिलते हैं। उनके एनजीओ के खिलाफ एक मामला अभी लंबित है।

आईबी की इस रिपोर्ट के खुलासे के बाद भारतीय मीडिया (मुख्यधारा और सोशल) में हंगामा खड़ा हो गया है। विभिन्न सरकारी नीतियों की पहल, खासकर ऊर्जा, पॉवर, इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा और कृषि क्षेत्र के खिलाफ गतिविधियां चलाने वाले विदेशी चंदा प्राप्त एनजीओ पर आधारित यह रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण है। यह अब तक साफ नहीं हो पाया है कि इन रिपोर्टों को कब तैयार किया गया और किसने इसे मीडिया में लीक किया। इस रिपोर्ट में विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले एनजीओ के नाम शामिल हैं और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोगों ने उनके बचाव में जवाबी हमला बोल दिया है। जयराम रमेश, प्रशांत भूषण जैसे बहुत से लोगों ने इसे गृह मंत्रालय द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले का प्रयास करार दिया है।

सच्ची असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब यह अपने निजी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बाहरी दानदाताओं द्वारा प्रेरित हो तब यह देश के हितों पर प्रहार जैसा है। भारत में लाभ कमाने वाले संगठनों के बजाय गैर-सरकारी संगठनों को सम्मान देने और उन पर विश्वास करने की प्रवृत्ति रही है, क्योंकि ये समाजसेवी और परोपकारी संस्थाओं के रूप में ऐसी गतिविधियों से जुड़ी रही हैं जो बिना किसी स्वयं के लाभ के जरूरतमंद और वंचित लोगों के हितों के लिए काम करती रही हैं। हालांकि यह भी एक मिथक है।

बुनियादी इरादे और उद्देश्यों के संदर्भ में मुनाफे के लिए बनाई गई संस्थाओं के प्रमोटरों और दान एवं लोगों की हितों के लिए लडऩे के लिए बनाए गए गैर-सरकारी संस्थाओं में कोई नैतिक अंतर नहीं होता। एक को ग्राहक की जरूरत होती है। वह लाभ कमाने के लिए अपने उत्पादों को लागत से ज्यादा दाम पर बेचती है और उस लाभ को सरकार सहित अपने अंशधारकों से भी साझा करती है। इस अपने काम के दौरान वह पर्यावरण का ध्यान रखे बिना प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और वातावरण तथा नदियों के पानी को दूषित कर नुकसान भी पहुंचाती है।

गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) प्रर्वतकों द्वारा वित्तीय लाभ कमाने के उद्देश्यों के बिना स्थापित एक निगम होता है। लेकिन इनके पास दानदाता के रूप में कार्यों के लिए संसाधन देने वाले व्यक्ति या संस्था होते हैं। जिन लोगों को सेवा करने का दावा किया जाता है, वे उनके ग्राहक होते हैं। यह सोचना गलत होगा कि उनके काम मुफ्त में किए गए होते हैं और यह किसी भी जांच से परे है। यहां तक कि मंदिरों में मिले दानों की भी ऑडिट और जांच होती है। गरीबों की मदद करने वाले कई ट्रस्टों को धन का बेजा इस्तेमाल करते हुए पकड़ा जा चुका है। एनजीओ को सिर्फ इस आधार पर जांच से छूट नहीं दी जा सकती कि वे गैर-लाभकारी संगठन हैं। कंपनियों की तरह ही वे भी आंशिक रूप से स्वार्थ के लिए संचालित होते हैं। इसके लिए कुछ निश्चित मानदंड होने चाहिए कि वे सही कर रहे हैं या गलत। जब यह मामला कंपनी का होता है, तो इसे नौकरी, आय, कर देय और सामुदायिक खर्चे के रूप में खाताबही के सकारात्मक पक्ष में दिखाए जाते हैं। पर्यावरणीय क्षति, कानून का उल्लंघन और कर्मचारियों के साथ दुव्र्यवहार आदि नकारात्मक पक्ष हो सकते हैं। अगर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को एक साथ रखें तो पाएंगे कि कंपनी के कार्यों में बुराई से अधिक अच्छाई है।

पर्यावरणीय नुकसान का आंकलन करना दुश्कर है। कोई भी व्यक्ति एक तरफ दूषित नदी की सफाई करने की कीमत तो दूसरी तरफ किसी फैक्टरी या कोयला खादान स्थापित करने के लिए हजारों पेड़ों को काटने से इसका अंदाजा स्वयं लगा सकता है। इसके विपरीत जब बात एनजीओ की आती है, जो लोगों के लिए भूमि और पर्यावरण का संरक्षण करते हैं तो उनके सकारात्मक पक्ष को मापना मुश्किल हो जाता है। उन एनजीओ जिनके बारे में आईबी की रिपोर्ट में कहा गया है, वे मूलत: पर्यावरण और सामाजिक मसलों से संबंधित हैं, लेकिन उनमें से कुछ राजनीतिक सीमा तक चले गए। यहां उनके सकारात्मक पक्ष को मापना बेहद कठिन है। उदाहरण के लिए, एक डैम बनने से कोई भी व्यक्ति लोगों के विस्थापन (उनका पुनर्वास करने की जरूरत होती है) और पेड़ों की कटाई के अलावा पर्यावरण के नुकसान का अंकलन कैसे कर सकता है? नए कोयला खादानों की वजह से क्या नुकसान हो सकता है?

इन विकास परियोजनाओं का कुछ एनजीओ ने खुलकर विरोध किया, जिसके लाभ और हानि दोनों ही हैं। ऐसे मामलों के क्या उपाय हैं, जब घाटे में रहने वाले लोगों की अपेक्षा फायदा लेने वाले लोग ज्यादा हों, जिनकी पूरी क्षतिपूर्ति की जाती है? उदाहरण के लिए, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के नाम पर एक याचिका द्वारा कोयला आधारित पावर प्लांट को रोकना संदेहास्पद है।

कोयला खादान रोजगार और आय बढ़ाते हैं। ये उद्योगों को आगे बढऩे के लिए बिजली उपलब्ध कराते हैं। यहां तक कि इससे गांवों को भी बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। पर्यावरणीय नुकसान की भावी लागत के खिलाफ हम फायदे के लिए क्या उपाय करेंगे? क्या क्षतिपूरक कार्यों से पर्यावरण के नुकसान को कम किया जा सकता है? एनजीओ की नैतिक निश्चितता कोयला और नाभिकीय परियोजनाओं को रोकने की कोशिश कर रही है और उसे अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से बदलने की उनकी कोशिश को चुनौती देने की जरूरत है। कोयले की ओर उंगली उठाना आसान है, लेकिन सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा सहित अक्षय ऊर्जा के नकारात्मक पहलुओं को गंभीर रूप से कम करके आंका जा रहा है।

सौर ऊर्जा को ही लें। इसके लिए एक बड़े भूभाग की जरूरत होती है। खासकर यूपीए सरकार की गलत मानसिकता वाली भूमि अधिग्रहण के संदर्भ में कहें तो क्या भारत में सस्ती और बहुतायत में मिलने वाली वस्तु सिर्फ भूमि है? मैट रीडली अपनी पुस्तक ‘दि रेश्नल ऑप्टिमिस्ट’ में कहते हैं कि अमेरिका जैसे देशों में पारंपरिक ऊर्जा को सौर ऊर्जा से बदलने के लिए स्पेन जितने भूभाग की आवश्यकता होगी। पवन ऊर्जा के बारे रीडली लिखते हैं, ”विंड टरबाइन के लिए कंक्रीट और स्टील की आवश्यकता नाभिकीय संयंत्रों में प्रयोग किए जाने वाले कंक्रीट और स्टील से 5 से 10 गुना ज्यादा की होती है। इसमें पक्की सड़कों और मीलों लंबी केबल का जिक्र नहीं है।’’ विडंबना यह है कि सीमेंट, स्टील और केबल उन खनन उद्योगों के उत्पाद हैं, जिन पर एनजीओ अपनी तलवारें लहराते रहते हैं।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि सौर ऊर्जा के भी अपने प्रदूषण हैं। फोटोवोल्टिक सेल में सिलिकॉन और पारा जैसे विषाक्त धातु हैं। कोई भी मानवीय गतिविधि साइड इफेक्ट से मुक्त नहीं है। जर्मनी, जिसने 2025 तक अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से अपनी आवश्यकता की 40 प्रतिशत ऊर्जा पैदा करने की महत्वकांक्षी परियोजना की घोषणा की थी, ने भारी लागत को देखते हुए इस परियोजना को त्याग दिया। कोयला, नाभिकीय और जलविद्युत परियोजना के बिना भारत अपनी विकास की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। देश और लोगों के कल्याण के बारे में गंभीरता से रुचि रखने वाले एनजीओ को अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करना चाहिए और उन्हें आंख बंद कर प्रत्येक कोयले वाली और नाभिकीय परियोजना का विरोध नहीं करना चाहिए। यह उन पर है कि वे साबित करें कि वे विकास विरोधी नहीं हैं। हालांकि बात यहां पूरी तरह से साफ नहीं है।

दूसरा प्रश्न है कि इस तरह के मसले को हाथ में लेने के लिए क्या किसी विदेशी चंदे की जरूरत है? अगर ऐसा है तो किस प्रेरणा से विदेशी दानदाता चंदे देते हैं? क्या इसके लिए एनजीओ को सचेत और जवाबदेह होना चाहिए? यदि इन एनजीओ की स्थापना व्यय की ओर देखें तो उनके द्वारा अपने संस्थापकों या लोगों के हितों की रक्षा करते हुए देखकर आश्चर्य होता है। लोकतंत्र में लोगों की हितों और अधिकारों के लिए लडऩे के लिए कई रास्ते हैं। इसके विपरीत सेतुसमुद्रम परियोजना बनाम कुंदनकुलम परियोजना के विरोध के तरीकों को साफ देखा जा सकता है। विवादास्पद परियोजनाओं में एनजीओ द्वारा अदालतों से स्थगन आदेश लेने का स्वागत है। फिर इसकी जिम्मेदारी सरकार पर आ जाती है कि वह साबित करे कि कुछ लोगों के विस्थापित होने के बावजूद यह खास परियोजना समाज के हित में है। इससे परियोजना में विलंब हो सकता है, लेकिन कम से कम यह रास्ता सभ्य और कानूनी है। इससे प्रभावित लोगों का समय से पुर्नस्थापना और क्षतिपूर्ति सुनिश्चित हो जाती है। इस तरीके को एफसीआरए ऐक्ट द्वारा अस्वीकृत नहीं किया गया है। जब ये एनजीओ विरोध के नाम पर बड़े पैमाने पर लोगों को कानून अपने हाथ में लेने को उकसाते हैं (जैसा कि कुंदनकुलम और नर्मदा मामलों में देखा गया), तब कानून के उल्लंघन का मामला सामने आता है। वास्तव में एफसीआरए ऐक्ट या एनजीओ के ‘संभावित व्यवहार’ के बारे में अनुचित कुछ भी नहीं है, जैसा कि सत्ता समूह द्वारा कहा जाता है।

आमतौर पर जिस समस्या का सामना सरकार को करना होता है, वह है ज्यादातर एनजीओ के लोगों की सेवा के नाम पर खुद को कानून से ऊपर समझना। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद इन परियोजनाओं को ये एनजीओ आगे बढऩे देते हैं, लेकिन सामंजस्य नहीं बैठाते। ये ऐसा इसलिए नहीं करते, क्योंकि ग्रीनपीस सहित इनमें से ज्यादातर एनजीओ ‘उपयोगितावाद’ की नैतिकता में विश्वास नहीं करते। वे लोग ‘किसी के अधिकारों का हनन नहीं’ की वैकल्पिक नैतिकता को अपनाया है।

नर्मदा बांध मामले में वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अंतत: पर्दा गिराया। इसके बावजूद मेधा पाटेकर को यह स्वीकार्य नहीं था। उन्हें क्या स्वीकार्य है? वह क्या चाहती हैं कि जादू से अपने विरोधियों को गायब कर, खुद जीत जाएं? हम विरोध करें, हम आंदोलन करें, हम धरना दें और यह सब ठीक है। लेकिन भारत का सर्वोच्च न्यायालय या संसद उन्हें अपना पंच स्वीकार कर ले।

कोई भी व्यक्ति हमेशा के लिए ‘सिर्फ मेरी ही राय सही है’ जैसी अराजकता पर नहीं चल सकता। यह सिर्फ राय नहीं है, बल्कि यह कानूनी रूप से जारी प्रक्रिया के प्रति असहिष्णुता है। मेधाओं, ग्रीनपीसों और केजरीवालों के साथ समस्या यह है कि उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी परिणाम उन्हें स्वीकार्य नहीं है, चाहे वे वैध और कानूनी रूप से मान्य ही क्यों न हो। लेकिन उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि वे कानून, देश और बहुमत से ऊपर नहीं हैं।


एनजीओ पर आईबी की रिपोर्ट


इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट में ग्रीनपीस, कॉर्डेड, एमनेस्टी और ऐक्शनऐड जैसी विदेशी चंदा प्राप्त एनजीओ पर पश्चिमी देशों की विदेश नीति हितों के उपकरण के रूप में काम करते हुए पूरे देश भर में नाभिकीय और कोयला संयंत्रों के खिलाफ आंदोलन को प्रायोजित करने का आरोप लगाया गया है।

आईबी द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय और अन्य सरकारी एजेंसियों को भेजी गई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कथित रूप से पीयूसीएल और नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे स्थानीय संगठनों के जरिए काम करने वाले एनजीओ ने देश की सकल घरेलू उत्पाद पर 2-3 प्रतिशत का नकारात्मक प्रभाव डाला है।

प्रधानमंत्री कार्यालय, संयुक्त खुफिया समिति और रॉ के प्रमुख, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सचिवालय, कोयला और ऊर्जा सचिवों, गृह सचिव, वित्त मंत्री और कैबिनेट सचिव को संबोधित करते हुए आईबी के संयुक्त निदेशक सफी ए. रिजवी द्वारा हस्ताक्षरित रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि विदेशी चंदा प्राप्त एनजीओ के ‘सक्रियता वाले क्षेत्र’ में गैर-नाभिकीय, गैर-कोयला और गैर-आनुवंशकीय रूप से परिष्कृत अवयव आंदोलन शामिल हैं। पॉस्को और वेदांता सहित अन्य बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं के अलावा ये एनजीओ उत्तर-पूर्वी भारत में खनन, बांध और तेल ड्रिलिंग परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाने के लिए भी काम करते आ रहे हैं।

3 जून की इस रिपोर्ट के अनुसार, प्रफुल्ल बिदवई और मेधा पाटेकर जैसे लोगों के उभार के पीछे यही विदेशी चंदा प्राप्त एनजीओ का प्रभाव है। इस परिपत्र के अनुसार ग्रीनपीस ने अपनी गतिविधियों का विस्तार कोयला आधारित बिजली संयंत्र और कोयला खदानों तक किया और इसके बदले में उसे पिछले 7 सालों में 45 करोड़ रुपए चंदे के रूप में विदेशों से प्राप्त हुए।

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि इन विदेशी चंदों का इस्तेमाल भारत के प्रमुख कोल-ब्लॉकों और कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के खिलाफ ‘कोल नेटवर्क’ छतरी के तहत आंदोलन चलाने के लिए किया जाता है। 2013 से ग्रीनपीस ने महान की परियोजना-प्रभावित पांच गांवों में महान संघर्ष समिति के बैनर तले आंदोलन को संचालित किया था। इनका लक्ष्य कोल इंडिया लिमिटेड, हिंडाल्को, एस्सार और आदित्य बिड़ला ग्रुप को निशाना बनाना था। ग्रीनपीस ने एक निजी रिसर्च इंस्टीट्यूट को महान में स्वास्थ्य, प्रदूषण और अन्य पहलू पर शोध करने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई, ताकि इस रिपोर्ट को आधार बनाकर कोल ब्लॉक पर प्रतिबंध लगवाया जा सके।

रिपोर्ट में कुंदनकुलम परियोजना के खिलाफ आंदोलन करने वाले पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी के संयोजक एस.पी. उदयकुमार के दो बैंक खातों में जमा लगभग 40 हजार अमेरिकी डॉलर की रकम को लेकर भी प्रश्र उठाया गया है। संभवत: यह पैसा ओहियो विश्वविद्यालय द्वारा कुंदनकुलम में संसाधन और लेख उपलब्ध कराने के लिए भेजा गया है। रिपोर्ट में आगे छह ऐसे एनजीओ पर आरोप लगाए गए हैं, जो भारत में ऐंटी-जीएम गतिविधियों को संचालित करती हैं और इनकी फंडिंग का मुख्य स्रोत जर्मनी है।

हालांकि आईबी की इस रिपोर्ट का लगभग सभी एनजीओ और उनके हजारों सदस्यों एवं लाभुकों ने विरोध किया है, लेकिन रिपोर्ट में कुछ ऐसे लोगों के नाम शामिल हैं, जो बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसमें नौसेना के पूर्व मुख्य एडमिरल एल. रामदास, त्रिपुरा के पूर्व पुलिस महानिदेशक के. एस. सुब्रह्मण्यम, वरिष्ठ स्तंभकार प्रफुल्ल बिदवई, एंटी-न्यूक्लियर कार्यकर्ता एस.पी. उदयकुमार का नाम शामिल है। इन लोगों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर एनजीओ का बचाव किया है। फंडिंग को लेकर ग्रीनपीस का कहना है कि ग्रीनपीस इंडिया को वित्तीय मदद भारत के व्यक्तिगत समर्थकों द्वारा उपलब्ध कराई गई है। ग्रीनपीस एक स्वतंत्र प्रचार संगठन है, जो सरकारी या कॉरपोरेट से चंदे स्वीकार नहीं करता।

मेधा पाटेकर की नर्मदा बचाओ आंदोलन के कारण पिछले 10 वर्षों में हुई क्षति का अनुमान लगभग 45 हजार करोड़ रुपए लगाया गया है, जो परियोजना की कुल लागत से भी ज्यादा है। आंदोलनों के कारण ऐसी कई परियोजनाओं को मिलाकर लाखों करोड़ रुपए का नुकसान अब तक हो चुका है।


इनमें से ग्रीनपीस, गैर-सरकारी संगठनों का मैकडोनाल्ड है। हजारों कर्मचारियों और अज्ञात वॉलेंटियर्स वाला यह एनजीओ अपने 28 क्षेत्रीय कार्यालयों के साथ 40 देशों में संचालित है। ग्रीनपीस के पूर्व संस्थापक क्या कहते हैं, उसके बारे में पढ़ते हैं। यह पूर्व संस्थापक सदस्य पॉल वाटसन (ग्रीनपीस के ह्वेल के शिकार विरोधी रोमांच पर) के कहे कुछ अंश हैं :

‘ग्रीनपीस एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय निगम है। हमने देखा कि अज्ञात नौकरशाह अपने आदर्शों को भी लाभ में तब्दील कर देते थे, इससे उपजी कुंठा और गुस्से से हमें ग्रीनपीस स्थापित करने का विचार आया। ग्रीनपीस मीडिया प्लेटफॉर्म और मनोविज्ञान का प्रयोग करते हुए सीधे मेल के जरिए लोगों से पैसे ऐंठती है…. हमने एक बड़े कॉरपोरेट राक्षस का निर्माण किया है, जो यह भूल चूकी है कि वह कहां से आई है और अब लोगों को सार्वजनिक अपराधबोध से ग्रसित कर रही है।’

‘ग्रीनपीस विश्व का सबसे बड़ा बहुराष्ट्रीय फील-गुड निगम बन चुका है… ग्रीनपीस पृथ्वी को बचाने का भ्रम पैदा कर उसकी मार्केटिंग कर रही है और उसके पास भोले-भाले वॉलेंटियर एवं वेतनभोगी समर्थकों की बड़ी फौज है, जो पूरे विश्वास से कहते हैं कि ग्रीनपीस वास्तव में पर्यावरण को बचा रही है, खासकर ह्वेल को… यह गलत है। अब समय आ गया है कि लोग जागें और देखें कि पर्यावरण के नाम पर काम करने वाले ये संगठन वास्तव में हैं क्या। ये लोगों को गुमराह करने वाली एक उच्च स्तरीय पब्लिक मशीन हैं। ग्रीनपीस संगठन स्वरूप अब यही है। ये संगठन अपने अद्वितीय कारॅपोरेट कौशल के जरिए गर्म लाल खून को ठंडे हरे रूपए में बदलने में बहुत सफल और कुशल हो चुके हैं।’

अमेरिका द्वारा नाभिकीय परीक्षण करने के विरोध में कुछ वॉलेंटियर के साथ छोटी नौकाओं में ग्रीनपीस की शुरुआत हुई थी। लेकिन समय के साथ उनकी नांवें बड़ी से और बड़ी होती गईं। उनके प्रदर्शनकारियों और आंदोलनकारियों को पता है कि कैसे नाटक शुरू किया जाता है और पैसे कैसे इकट्ठे किए जाते हैं। यह आधुनिक आंदोलन प्रौद्योगिकी की रणनीति भारत और विदेशों में आम है।

2013 में ऑस्ट्रेलिया के दो ग्रीनपीस समर्थकों ने एक खेत पर हमला कर वहां के आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों को नष्ट कर दिया। उन्होंने अपने इस तांडव को फिल्माया और उस वीडियो का इस्तेमाल अपनी प्रसिद्धि और ड्रामे के लिए किया। इसके लिए एनजीओ पर मुकदमा किया गया और नुकसान की भरपाई के रूप में उसे 2 लाख 80 हजार अमेरिकी डॉलर देने पड़े। वे धनी हैं और वे इसका वहन कर सकते हैं। इन दो वॉलेंटियर को निलंबन की सजा सुनाई गई, क्योंकि यह पहली बार किया गया अपराध था और उनमें से एक गर्भवती थी। ग्रीनपीस ने अपने इन दो कर्मचारियों पर कार्रवाई कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया। इस तरह के लोकतांत्रिक आंदोलन को देखकर आश्चर्य होता है।


एमनेस्टी स्कीम’


‘फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) ऐक्ट, 1976’ के तहत पंजीकृत 8,673 संघों ने लगातार तीन वित्तीय वर्षों, 2001-2002, 2002-2003 और 2003-2004, तक आवश्यक एफसी-3 रिटर्न (विदेशों की प्राप्ति और उसके इस्तेमाल का वार्षिक ब्यौरा) को जमा नहीं किया। इन्हें ‘पूर्व अनुमति’ की श्रेणी में रखते हुए 26 अक्टूबर 2005 की दिनांक वाली राजपत्र अधिसूचना एस.ओ. 1621(ई) द्वारा 15 नवंबर 2005 को प्रकाशित कर चेतावनी दी गई थी।

उसके बाद, 16 जून 2006 की तारीख वाली राजपत्र अधिसूचना एस.ओ 924(ई), जिसे 21 जून को प्रकाशित किया गया था, के जरिए एमनेस्टी योजना को सूचित किया गया कि पूर्व अनुमति की श्रेणी वाले संस्थानों को यह अवसर दिया जाता है कि वे अपने रिटर्न को दुरूस्त करें या उपरोक्त उल्लेखित तीन सालों के रिटर्न का सबुत 31 दिसंबर 2006 तक संबंधित कार्यालय में जमा करें। ये संघ अगर 31 दिसंबर 2006 तक अपने रिटर्न जमा कराते हैं या जमा करने का सबूत पेश करते हैं तो उनका पंजीकरण बहाल करते हुए, उन्हें ‘पूर्व अनुमति’ की श्रेणी से हटा दिया जाएगा। पूर्व अनुमति की श्रेणी वाले संघों का पंजीकरण बहाल करने के लिए भी अभ्यावेदन जारी रहेगा।

एमनेस्टी योजना के अनुसार, संघ, विशेष रूप से विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले, चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा प्रमाणित 2001-02 से 2007-08 (सात साल) तक का अपना वार्षिक रिटर्न ‘भुगतान एवं प्राप्ति खाते’ तथा ‘बैलेंस सीट’ के साथ निर्धारित एफसी-3 प्रारूप में सूचना जारी होने के छह महीने के अंदर जमा करा सकते हैं। इस अवधि में जिन एनजीओ ने कोई भी विदेशी चंदा प्राप्त नहीं किया, उनकी भी ‘शून्य रिटर्न’ आवश्यक है। इस तरह के रिटर्न को पंजीकृत डाक द्वारा सेक्शन ऑफिसर को भेजा जा सकता है। (एफसी-1 सेक्शन)


याद कीजिए अपने केजरीवाल को, जिन्होंने बकाएदारों से पानी और बिजली का बिल नहीं जमा करने के लिए कहा था। भारत इन जोकरों को इसलिए बर्दाश्त करता है, क्योंकि वे दूसरों पर नकली ‘नैतिक श्रेष्ठता’ थोपते हैं और कई सीधे-सादे लोग उनकी इस चाल में फंस जाते हैं। आप आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों या बकाया बिलों का विरोध कर सकते हैं, लेकिन एक ऐसी रेखा भी है, जिसे कोई पार नहीं कर सकता। आंदोलन प्रौद्योगिकी का खतरनाक स्वरूप है कानून तोडऩा, निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और कार्रवाई करने के लिए सरकार को धमकाना।

जैसा कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ होता है, आप अपने उत्पाद के लिए लोगों को खोजने के लिए कहां जाएंगे? चीन या भारत! और यही वजह है कि ग्रीनपीस को भारत में अपना बाजार मिला। जनता को भावुकता, नाटक और मीडिया की खबरें बेहद पसंद हंै। सिर्फ यही कहना है कि सरकार ‘गरीब विरोधी’ है और आपको भारत में हजार लोग साथ में खड़े मिल जाएंगे और सबसे महत्वपूर्ण चीज साथ में पैसा भी।

सिर्फ जनता से कहना है : कोई नाभिकीय ऊर्जा नहीं, कोई कोयला आधारित संयंत्र नहीं, कोई बांध नहीं। जो आपका विरोध करे उसे भ्रष्ट कहिए, जो आपका विरोध करे उसे गरीब विरोधी कहिए, जो आपका विरोध करे उसे पर्यावरण विरोधी कहिए और फिर आप विजेता होंगे। ग्रीनपीस ठीक यही काम करता है और अरविंद केजरीवाल ऐंड कंपनी भी यही काम करती है। अपने अतीत में जो काम ग्रीनपीस ने समुद्र में किया, उसी ‘अराजक’ तकनीक को वह भारत में भी अपना रही है। यह टीवी के लिए तो ठीक है, लेकिन इन आंदोलनकारी नेताओं पर आम लोगों के जीवन को खतरे में डालने के लिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए। मध्य प्रदेश का नदी-आंदोलन भी एक तमाशा था। इनके नेता इतने चालाक थे कि डूबने के डर से वे वहां नहीं पहुंचे, लेकिन टीवी पर अपना बयान देने के लिए सदैव उपस्थित रहे। यहां मैं एक अंग्रेजी दैनिक समाचार-पत्र ‘दि टाइम्स ऑफ इंडिया’ में छपी खबर को उद्धृत करना चाहूंगा, जो कि ड्रामेबाजी का प्रमुख उदाहरण है: ”उस गांव में आपका स्वागत है, जो पिछले तीन सप्ताह से ‘जल सत्याग्रह’ के तूफान से जूझ रहा है। यह कहानी पूरी मीडिया की है, जो हाथों में मोबाइल फोन लेकर दौड़ी चली आई थी। जो जगह टीवी पर दिखी, जहां आंदोलनकारी प्रदर्शन कर रहे थे, वह सही ढंग से कोई गांव नहीं, बल्कि नर्मदा नदी से निकलने वाली नहर का किनारा है… जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने पानी घटने के बाद प्रदर्शन-स्थल का निरीक्षण किया तो पाया कि वह जगह सिर्फ दो फुट गहरी है… आंदोलन में शामिल एक ग्रामीण महताब गिरी ने बताया – ‘हम पानी में बैठे हुए थे। सबसे पहले हमलोगों ने ईंट और पत्थरों की स्लैब रखीं, जिस पर बांध का पानी निकलने के लिए लोहे के गेट बने हुए थे। इससे प्रदर्शन के दौरान आराम से बैठने में मदद मिलती थी…’ जब भी मीडिया कोई शॉट लेती, हम थोड़े गहरे पानी में की गई दूसरी व्यवस्था का प्रयोग करते थे। कभी-कभी पानी का स्तर दिखाने के लिए आंदोलनकारी गर्दन तक या ठुडी तक पानी में उतर जाते थे। जब वे खड़े होते थे तो मुश्किल से पानी उनके कमर तक पहुंचता। वे हमेशा पानी में ही नहीं खड़े रहते, बल्कि हमेशा नहर के अंदर-बाहर किया करते थे। हर समय पानी में रहने वाले सिर्फ तीन ही व्यक्ति थे। इसमें से तीसरी ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की कार्यकर्ता चित्तरूपा पाटिल थी, जो मीडिया को जानकारी देने के लिए अक्सर बाहर आती रहती थीं। दूसरे लोग अपनी बारी का इंतजार करते। टीवी शॉट में इसके सबूत मौजूद हैं।


गृहमंत्रालय की चेतावनी


केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने आगाह किया है कि भारत में गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) सेक्टर मनी-लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों की वित्तीय सहायता के रूप में खतरा साबित हो सकते हैं। भारत में विदेशी चंदा प्राप्त करने के लिए 2 प्रतिशत से भी कम एनजीओ सरकार से पंजीकृत हैं।

साल 2011-12 के लिए ‘फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन रेग्यूलेशन ऐक्ट (एफसीआरए)’ के अंतर्गत विदेशी चंदे की प्राप्ति और उसके इस्तेमाल पर गृहमंत्रालय की ताजा रिपोर्ट पर केन्द्रीय गृह सचिव अनिल गोस्वामी का कहना है – ”सरकार की आम नीति है विदेशी चंदे की लिए प्रोत्साहित नहीं करना। हालांकि यदि यह कल्याणकारी गतिविधियों के लिए है, तो केन्द्र से पंजीकरण या उसकी पूर्व अनुमति से विदेशी चंदे प्राप्त किए जा सकते हैं।’’

एफसीआरए कानून को सख्ती से लागू करने के साथ-साथ अन्य देशों से और अधिक समन्वय स्थापित करने के लिए जरूरी कदम उठाने पर जोर देते हुए गृह मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है – ”यह व्यापक सामान्यीकरण के लिए उचित नहीं है, फिर भी यह ध्यान देने योग्य है कि भारत में एनजीओ सेक्टर खतरे की चपेट में है।’’ रिपोर्ट में इसे ‘चिंता का विषय’ बताते हुए कहा गया है कि अधिसंख्य पंजीकृत एनजीओ सरकार को अपनी वैधानिक वार्षिक रिपोर्ट नहीं देते। एफसीआरए के तहत पंजीकृत एनजीओ (43,527 में से 19,000) सरकार के समक्ष विदेशी चंदे की प्राप्ति और उसके इस्तेमाल की वार्षिक रिपोर्ट जमा नहीं किया।

”यद्यपि भारत में एनजीओ की संख्या और उनके अभियानों में लगने वाले पैसों के बारे में कोई केन्द्रीकृत डाटाबेस नहीं है, लेकिन अनाधिकारिक आंकड़ें बताते हैं कि भारत में 20 लाख से ज्यादा एनजीओ सोसाईटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, ट्रस्ट ऐक्ट आदि के तहत पंजीकृत हैं, जिसमें विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले एनजीओ, कुल एनजीओ के मात्र 2 प्रतिशत है।’’

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसके उपयोग के बारे में सूचना देने वाले एनजीओ की संख्या बढ़ रही है, लेकिन यह चिंता की बात है कि बड़ी संख्या में एनजीओ कानूनी रूप से आवश्यक अपनी वैधानिक वार्षिक रिपोर्ट को अभी भी जमा नहीं करते। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी बाल कल्याण संगठन ‘कॉम्पैशन इंटरनेशनल’ भारत को सबसे अधिक चंदा देने वाले संगठन के रूप में उभरा है। इसने 2010-11 में दिए गए 99.2 करोड़ रूपए के चंदों को लगभग दुगना करते हुए 2011-12 में 183.83 करोड़ रूपए दिए। चंदे के रूप में 130 करोड़ रूपए देने वाला दूसरा सबसे बड़ा विदेशी दानदाता ‘चर्च ऑफ जीसस क्राइस्ट ऑफ लैटर डे सेंट्स’ भी अमेरिका का ही है। पिछले साल दिए गए अपने दान में 20 प्रतिशत की वृद्धि कर 3,838.23 करोड़ रूपए देने वाला अमेरिका, अभी भी सबसे बड़ा दानदाता देश है। भारतीय एनजीओ को विदेशों से मिलने वाले चंदों में पिछले तीन सालों में पहली बार 11 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होकर 2011-12 में यह राशि 11,546 करोड़ रूपए हो गई।

दिलचस्प बात है कि रिपोर्ट में तिब्बत को अलग देश के रूप में दिखाया गया है और तिब्बत ने भारतीय एनजीओ को 99 करोड़ रूपए का चंदा दिया है। दिल्ली स्थित एनजीओ को अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे ज्यादा, 2,285 करोड़ रूपए चंदे के रूप में मिले, जबकि चेन्नई स्थित एनजीओ ‘दि वल्र्ड विजन ऑफ इंडिया’ को व्यक्तिगत रूप से सबसे अधिक विदेशी दान मिला।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय एनजीओ ने ग्रामीण विकास को सबसे शीर्ष क्षेत्र के रूप में हवाला दिया है, जहां सबसे अधिक विदेशी दान में मिली रशि को खर्च किया गया। इन एनजीओ ने घोषित किया कि ग्रामीण विकास के क्षेत्र में 945 करोड़, बाल कल्याण में 929 करोड़ और विद्यालय व महाविद्यालयों के निर्माण में 824 करोड़ रूपए खर्च हुए।


यह आधुनिक टीवी-टाइम आंदोलन प्रौद्योगिकी है। टीवी पर पीडि़तों का दर्द देखकर लोग पसीज जाते और पैसा भेजना शुरू कर देते। कुंदनकुलम परियोजना और मायावी एस.पी. उदयकुमार के बारे में क्या ख्याल है? वे परमाणु विज्ञान में उतने ही धाराप्रवाह हैं, जितना कि एक रूसी भोजपुरी बोलने में। उनके खिलाफ कई मामले लंबित हैं और मुझे उम्मीद है कि गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा। उनके नेतृत्व में जो भी आंदोलन हुए, वह चर्चों के समर्थन से ‘एक प्रायोजित डर-पैदा’ करने के अलावा और कुछ नहीं था। यह एक लंबी कहानी है लेकिन इसका ‘दिकैपुल्लई’ (@TheKaipullai) द्वारा अपने ब्लॉग ‘5 रिजन्स ह्वाई देयर इज समथिंग रॉन्ग विद दि प्रोटेस्ट्स इन कुंदनकुलम’ के भाग-1 और भाग-2 में गहराई से विश्लेषण किया है। मेरी सलाह है कि इन दोनों भागों को पढ़ें और खुद ही निर्णय करें। यह कोई ‘कारण’ नहीं बल्कि पैसा है, जो इनमें से बहुत से अनैतिक एनजीओ को कार्रवाई करने को प्रेरित करता है। और वे लोग दावा करते हैं कि वे देवदूत हैं, जिसे लोगों को बचाने के लिए भेजा गया है। ‘हमलोग धरती को बर्बाद कर रहे हैं… हमलोग धरती को बर्बाद कर रहे हैं… !’ किसी को डराने के लिए इतना ही काफी है।

ग्रीनपीस की कहानी की यह विडंबना है कि यह कुछ ही दिन पहले 16 जून को सामने आई। जब पैसे के लिए कभी खत्म नहीं होने वाला लालच आ जाए तो आप क्या करेंगे? जुआ! यह वही चीज है, जिसे ज्यादातर लोग खेलते हैं और ग्रीनपीस ने भी यही खेला। हेडलाइन के अनुसार, ”करेंसी स्पेक्यूलेशन में ग्रीनपीस ने 8 मिलियन पौंड खो दिए।’’ इसका विवरण इस प्रकार है: ”त्रुटियों की श्रृंखला से हुई हानियों के लिए हम अपने समर्थकों से पूर्ण माफी की पेशकश करते हैं।’’ ग्रीनपीस के अंतर्राष्ट्रीय फाइनांस यूनिट में काम कर चुके एक सदस्य का कहना है:”हम व्यक्तिगत लाभ के लिए काम नहीं कर रहे थे, लेकिन हम वरिष्ठ प्रबंधन से स्वीकृति हासिल करने में असफल रहे। उन्होंने हमें अनुबंध से मुक्त कर दिया।’’ आप देखते हैं कि आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के खेत में जो हुआ वह उसके कर्मचारी द्वारा किया गया स्वयं का कृत्य था। ग्रीनपीस को इससे कुछ लेना-देना नहीं है। और हां, ग्रीनपीस प्रबंधन की जानकारी के बिना उसके कुछ कर्मचारियों ने कई मिलियन यूरो को संभाला। क्या आप विश्वास करेंगे? अगर यह विश्वसनीय है तब आप समझ सकते हैं कि सीधे-सादे लोगों को ग्रीनपीस ने कयामत की रात का डर दिखाकर उनकी ‘भावनाएं’ कैसे खरीदीं। इनके लिए पैसा और नवाचार ही आंदोलन है।

 विजय दत्त

 

 

 

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