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नवीन सरकार ने शंकराचार्य संस्था का किया अपमान

ओडीशा सरकार ने भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में हजारों साल की पवित्र ऐतिहासिक परंपरा का उल्लंघन करके लोगों की भावनाओं से ऐसा खिलवाड़ किया है जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। नवीन पटनायक सरकार की इस हरकत का शिकार पुरी गोवद्र्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती हुए। प्रशासन की लापरवाहियों के कारण शंकराचार्य इस साल हिंदू धर्म के सर्वोगा आचार्य होने के नाते रथों की पारंपरिक वैदिक कर्मकांड से पूजा संपन्न नहीं कर सके।

पुरी गोवद्र्धन पीठ के शंकराचार्य श्री जगन्नाथ मंदिर के सभी आंतरिक और कर्मकांडी मामलों के प्रमुख हैं। श्री जगन्नाथ मंदिर अधिकार दस्तावेज के पृष्ठ 148 (खंड 2) के मुताबिक, वे मंदिर प्रशासन के सर्वोगा अधिकारी हैं और मंदिर के कर्मकांड से संबंधित सभी मामलों में उनकी राय अंतिम और सभी के लिए बाध्यकारी होती है। हालांकि राज्य सरकार 1955 में नया ‘श्री जगन्नाथ मंदिर कानून’ बनाया। अब इसी कानून के प्रावधानों के तहत मंदिर का प्रशासन काम करता है। इस कानून में भी मंदिर प्रशासन में पुरी के शंकराचार्य की स्थिति स्पष्ट है। वे मुक्तिमंडप पंडित सभा (संतों, पुरोहितों और विद्वान पंडितों की मंदिर की नीति निर्णायक सभा)के स्थायी सभापति और मंदिर की सभी प्रशासकीय समितियों के अध्यक्ष हैं। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जगन्नाथ पुरी में गोवद्र्धन पीठ की स्थापना की और जगन्नाथ मंदिर के अच्छे प्रशासन की जिम्मेदारी पहले पीठाधीश आचार्य पद्मपाणि को सौंपी। तभी से पुरी के शंकराचार्य मंदिर प्रशासन के मामले में प्रकाश दिखाने का अपना दायित्व निभाते आए हैं। 1955 में मंदिर कानून बनने के बाद कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने मंदिर प्रशासन के मामले में शंकराचार्य के अधिकार को अनदेखा करने की कोशिश की और उसे पूरी तरह राज्य सरकार के नियंत्रण लाना चाहा। उस समय पुरी के गजपति राजा श्री रामचंद्र देव ने ओडीशा हाईकोर्ट में नए कानून की संवैधानिक वैध्यता को चुनौती दी। अपनी याचिका में उन्होंने पुरी के शंकराचार्य और गजपति राजा के मंदिर प्रशासन के मामले में अधिकारों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, जो उन्हें शास्त्रों और पीढिय़ों से हासिल है। ओडीशा हाईकोर्ट ने 1959 में फैसला सुनाया कि रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं तथा शास्त्रसम्मत संस्थाओं के मामले में राज्य हस्तक्षेप नहीं कर सकता (रामचंद्र देव बनाम ओडीशा सरकार, एआइआर 1959 ओडीशा-5)। हाईकोर्ट के इस फैसले के कुछ नुक्तों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राज्य सिर्फ मंदिर के सेकूलर मामलों में ही हस्तक्षेप कर सकता है, रीतियों-प्रथाओं के मामले में नहीं। इस तरह यह मामला अंतिम न्यायिक आदेश के साथ तय हो गया।

लेकिन समय-समय पर खासकर राजनैतिक और अफसरशाही हलकों के निहितस्वार्थी तत्व मंदिर के प्रशासनिक और कर्मकांडी मामलों में शंकराचार्य के अधिकार पर अंकुश लगाने के लिए हर संभव कोशिश करते रहे हैं। इससे मंदिर में गंभीर समस्याएं भी पैदा होती रही हैं। समूचे राज्य में मंदिर की हजारों हजार एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा किया गया। ये कब्जे ज्यादातर सरकार में ताकतवर पदों पर काबिज लोगों के हक में किए गए।

दरअसल, शंकराचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ के बाद स्वामी निरंजन देव तीर्थ पुरी गोवद्र्धन पीठ के शंकराचार्य बने। यहां यह तथ्य नहीं भुलाया जाना चाहिए कि स्वामी कृष्ण तीर्थ के निधन के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर से उगा संतों ने पुरी का शंकराचार्य बनने का आग्रह किया था। उन्हें धर्म के गहरे ज्ञान और आध्यात्मिक शक्तियों के कारण शंकराचार्य परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए चुना गया था। लेकिन गुरु जी ने विनम्रता से इससे इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें नाजुक वक्त में संघ का निर्माण करना था। गुरु गोलवलकर की वह चिट्टी आज भी गोवद्र्धन पीठ में सुरक्षित है। गोवद्र्धन पीठ के सूत्रों के मुताबिक पिछले 45 वर्षों से पुरी के शंकराचार्य से मंदिर प्रशासनिक या कर्मकांड के मामलों में कोई परामर्श नहीं किया गया है।

ताजा घटनाक्रम में राज्य सरकार पर इस मामले में फैसला करने का दबाव बनाया गया कि ”क्या सामान्य लोग पवित्र रथ पर चढ़कर भगवान की मूर्ति को स्पर्श कर सकते हैं?’’ गौरतलब है कि हाल के वर्षों में कुद निहितस्वार्थी तत्वों ने ऐसी कुप्रथा शुरू कर दी है कि सामान्य लोगों को भी कुछ मोटी रकम देकर पवित्र रथ पर चढ़कर भगवान की मूर्ति को स्पर्श करने की इजाजत दे दी जाती है। कई बार तो विदेशियों को भी पवित्र रथ पर मूर्ति को स्पर्श करने दिया जाता है, जबकि यह पूरी तरह वर्जित है। और जो लोग मांगी गई रकम नहीं दे पाते, उनके साथ दुव्र्यवहार किया जाता है।

इस प्रथा की इतनी आलोचना हुई कि सरकार ने 2013 में इस पर शंकराचार्य से उनकी राय मांगी। सरकार के आग्रह पर शंकराचार्य ने देश भर से संतों, पंडितों और कानूनी विशेषज्ञों की उगास्तरीय बैठक बुलाई। सबकी राय लेकर उन्होंने सरकार को अपने मत से अवगत कराया कि ”सेवायतों (पुरोहितों) के अलावा किसी को भी पवित्र रथ पर चढ़कर भगवान की मूर्ति को स्पर्श करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’

लेकिन शंकराचार्य का यह फैसला कुछ निहितस्वार्थी तत्वों को स्वीकार नहीं था, जो मंदिर के सत्ता केंद्र में होने का दावा करते हैं। मामला हाईकोर्ट में ले जाया गया। हाईकोर्ट ने शंकराचार्य के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा कि वे ही मंदिर की प्रथाओं के मामले में सर्वोगा अधिकारी हैं। लेकिन निहितस्वार्थी तत्वों ने शंकराचार्य की खुली आलोचना की और रथ यात्रा के दिन उन्हें उनके फैसले का परिणाम भुगतने की धमकी दी। दूसरी तरफ सरकार ने तुष्टीकरण की नीति अपनाई और शंकराचार्य के फैसले पर अमल नहीं किया। इसके बदले कुछ खास मौकों पर लोगों को पवित्र रथ पर चढऩे की इजाजत दे दी गई। सरकार का यह फैसला न शंकराचार्य, न गजपति राजा को स्वीकार्य था। विशेषज्ञों का कहना है कि मंदिर के रीति-रस्म के बारे में जब शंकराचार्य ने फैसला सुना दिया तो उस पर शब्दश: अमल होना चाहिए था, राज्य सरकार का उसमें हस्तक्षेप का कोइ्र अधिकार नहीं है। शंकराचार्य के फैसले के विरोधियों ने सरकार पर यह दबाव बनाया कि शंकराचार्य को भी पारंपरिक पूजा के लिए रथ पर जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह प्रथा है कि शंकराचार्य तीनों रथों पर सात सेवायतों के साथ जाएंगे और उनकी सहायता से पूजा करेंगे। इस बार प्रशासन शंकराचार्य से कहा कि वे अकेले आएं और मूर्ति को स्पर्श न करें। भगवान जगन्नाथ के पहले सेवक माने जाने वाले गजपति महाराज श्री दिव्य सिंह देव ने इस पर कहा, ”सरकार ने शंकराचार्य को अकेले आने को कहकर भयंकर भूल की है। वे हिंदू धर्म के सर्वोगा गुरु हैं। परंपरा यह है कि शंकराचार्य अपने शिष्य संन्यासियों के साथ रथ पर पूजा संपन्न करते हैं। पहले सात संन्यासी शंकराचार्य के साथ जाया करते थे। इस बार उन्होंने स्वयं सिर्फ दो संन्यासियों के साथ पहुंचने को कहा था क्योंकि उन्होंने ही तीर्थयात्रियों को रथ पर जाने से मना करने का फैसला सुनाया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार ने रथ यात्रा के एक दिन पहले उन्हें चिट्टी भेजकर अकेले ही आने को कहा, ताकि वे आ न सकें और पूजा न कर सकें।’’ वे यह भी कहते हैं, ”सरकार को शंकराचार्य को निर्देश देने और उनके मार्ग में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं है। सरकार मंदिर की प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं कर सकती और उसे कुछ निहितस्वार्थी तत्वों के खातिर हिंदू धर्म के सर्वोगा आचार्य के लिए ऐसी परेशानी पैदा नहीं करनी चाहिए थी।’’

विडंबना देखिए कि रथ यात्रा के दिन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक लगभग पूरे समय मंदिर के पास मौजूद रहे। दो केंद्रीय मंत्री जुएल ओरांव और धर्मेंद्र प्रधान शंकराचार्य से मिलने पहुंचे और मुलाकात के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री से मामले में हस्तक्षेप करके प्रशासन की चूक सुधारने की अपील की, ताकि शंकराचार्य संस्था की अनदेखी रोकी जा सके। लेकिन मुख्यमंत्री ने दोनों की एक नहीं सुनी।

दरअसल यह घटना राज्य सरकार द्वारा शंकराचार्य की अनदेखी करने और जगन्नाथ पुरी के पवित्र तीर्थ पर कब्जा करने की मिसाल है, जबकि शंकराचार्य के अधिकारों को कानून भी स्वीकार करता है।

पुरी से देबाशीष त्रिपाठी

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