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अच्छे दिनों के लिए सुदृढ़ अर्थव्यवस्था

हमारे नए प्रधानमंत्री को इस कटु सत्य को पहचानना होगा। आज हर जागरूक मतदाता शाम को घर आते ही अपने टीवी के सामने बैठ जाता है कि आज प्रधानमंत्री ने क्या-क्या निर्णय लिए। किसी भी सरकार के लिए अलिखित जनादेश होता है भारत के नक्शे से गरीबी हटाना। यह अगले एक दशक के भीतर हो सकता है अगर सरकार दृढ़संकल्प हो और देश की अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार के लिए उसके पास बेहतरीन रोडमैप हो।

नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को 15वें प्रधानमंत्री के रूप में ऐसे समय में देश की बागडोर संभाली जब देश की अर्थव्यवस्था का रुख लगभग गर्त की ओर है। देश गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। सकल घरेलु उत्पाद घट कर 4.6 प्रतिशत पर आ गया है। राजकोषीय घाटा सकल घरेलु उत्पाद का 4.47 (5.09 करोड़ रुपए) प्रतिशत और आंतरिक कर्ज 37.2 प्रतिशत (42,12,575 करोड़ रुपए )हो गया है। चालू खाते का घाटा सकल घरेलु उत्पाद के 1. 7 प्रतिशत पर पहुंच गया है। एयर इंडिया की कुल संचित धनराशि का घाटा 30,000 करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया है। बाकी एयरलाइन्स भी खून के आंसू रो रही हैं। मार्च महीने की तिमाही में जेट एयरवेज को 2154 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। मुद्रास्फीति की दर और बेरोजगारी आसमान छू रही है। निवेश का माहौल बेहद बुरा है। लेकिन इसके विपरीत हमारे प्रतिद्वंद्वी चीन की अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत की दर से लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में मोदी का प्रधानमंत्री बनना कांटों का ताज पहनने जैसा है।

दूसरी तरफ भारतीय मतदाता का स्वभाव भी काफी बदल गया है। वह पहले से काफी महत्वाकांक्षी हो गया है। उसने नई सरकार से बेपनाह उम्मीदें पाल रखी हैं। यह आशंका बेमानी भी नहीं है कि अगर महंगाई और बेरोजगारी का हल नहीं निकला तो जनता निकट भविष्य में सरकार को फटकारने में थोड़ी भी देर नहीं लगाएगी। गैलप के क्षेत्रीय डायरेक्टर (एशिया) राजेश श्रीनिवासन कहते हैं, ”उम्मीदें जगाना और उसे पूरा न करना बहुत ही जोखिम भरा है।’’ बढ़ती गरीबी और गैर-बराबरी से ऊबे देश के युवा जल्द से जल्द उन ‘अच्छे दिनों’ को देखना चाहते हैं जिसका वादा प्रधानमंत्री ने अपने चुनावी भाषणों में किया था। आज के युवाओं को भड़कने के लिए तो बस एक चिंगारी की जरूरत है। अमेरिकी विचारक स्टेफेन कोहेन सही ही कहते हैं, ”पानी को लेकर झगड़े, नस्लीय, भाषायी समस्याएं और बढ़ती आय असमानता भारत के स्थायित्व के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। लेकिन भारत के पूर्वी क्षेत्रों में बढ़ रही माओवादी समस्या के अलावा इन सारे मुद्दों पर सबसे कम ध्यान दिया जा रहा है।’’ हमारे नए प्रधानमंत्री को इन कटु सत्यों को पहचानना होगा। किसी भी सरकार के लिए अलिखित जनादेश होता है गरीबी हटाना। आजादी के 67 साल बाद भी 40 करोड़ लोग बेहद गरीबी में जीने को मजबूर हैं। लगभग इतने ही लोग गरीबी रेखा से थोड़े ऊपर अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर हैं, जिन्हें आंशिक रूप से गरीब माना जाता है। बाकि के मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग के 45 करोड़ लोग भी बहुत माकूल माहौल में नहीं जी रहे हैं। बदहाल सफाई व्यवस्था, प्रदूषित जलवायु और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं लोगों का जीना दुश्वार कर रही हैं।

गरीबी और उससे जुड़ी अन्य समस्याओं का कारण पिछली सरकारों के द्वारा बढ़ती जनसंख्या पर लगाम न कसना है। आज देश की जनसंख्या में प्रति साल 1.8 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं, जो ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या के बराबर है। इस सच्चाई को नाकारा नहीं जा सकता कि देश की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं की जड़ बढ़ती जनसंख्या है। अगर भारत की जनसंख्या 70 करोड़ तक रह गई होती तो यह देश समृद्ध बन गया होता। कोई भी सरकार गरीबी की समस्या से पार नहीं पा सकती जब तक अगले एक दशक में जनसंख्या पर अंकुश न लगे।

इसलिए गरीबी दूर करने के लिए नए प्रधानमंत्री का पहला काम, जो किसी दूसरे ने नहीं किया, वह है एक निश्चित रोडमैप तैयार करना। इसके साथ ही दो और चीजों में भी सुधार करना है, वह है मानव विकास सूचकांक में सुधार और व्यापार के लिए उचित माहौल तैयार करना। इन दोनों मामलों में दुनिया में भारत का अभी 135वां स्थान है। अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए ऐसे रोडमैप की जरूरत है, ताकि भारत की अर्थव्यवस्था 2025 तक चीन को पीछे छोड़ दे। महज सकल घरेलू उत्पाद को 9 प्रतिशत तक लाना ही इस रोडमैप का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। विकास के इस परिदृश्य में दो और महत्वपूर्ण कारकों का ध्यान रखना होगा। जैसे समाज के हर तबके तक धन पहुंचाना (समेकित विकास) और साथ ही भारत की हर गली तक उच्चतम सफाई मानकों का ध्यान रखना। आज तक हमारे पास ऐसे 10 शहर भी नहीं हैं, जो 100 प्रतिशत साफ-सफाई का दावा कर सकें। यही इस नई सरकार का उद्देश्य होना चाहिए और इसके ‘विजन डॉक्यूमेंट’ में इस सवाल का उत्तर दिखना चाहिए।

अभी तक तो भारत को बहुत सारे देशों से आगे होना चाहिए था। 1950-60 के दशक में चीन भारत से काफी पीछे था। यह तो देंग जियाओ पिंग थे, जिन्होंने एक बच्चे की नीति को कड़ाई से लागू किया और चीनी अर्थव्यवस्था को खोलने के लिए 1974 में बड़ी संख्या में आर्थिक सुधार किए। अगले 30 सालों में चीन दुनिया की सबसे तेज उभरने वाली अर्थव्यवस्था बन गया। अपनी मृत्यु से पहले देंग यह कह सकते थे कि उन्होंने इतिहास में किसी भी नेता से ज्यादा लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया। चीन एक निरंकुश होते हुए भी खुले दिमाग का समाज है और हम एक लोकतांत्रिक देश होकर भी बंद दिमाग के। इन दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रवैये में फर्क के कारण ही भारी अंतर है। उदाहरण के तौर पर चीन ने छह साल में ही 18,200 मेगाटन क्षमता वाला 3-जॉर्ज डैम बना लियए, जबकि हमारे यहां 1983 से लेकर अब तक मात्र 17,000 मेगाटन अतिरिक्त क्षमता जुड़ी है। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। विदेशी निवेशक अभी भी भारत की अर्थव्यवस्था को गतिशील और भारतीय प्रजातंत्र को चीन के सामने मजबूत देखना चाहते हैं। बहुत दिनों के बाद एक मजबूत सरकार आई है और हम उम्मीद और प्रार्थना करते हैं कि यह सरकार मजबूत भारत का निर्माण करेगी और अच्छे दिनों का आगाज भी जल्द करेगी। भारत के नए प्रधानमंत्री देश के लिए देंग जियाओ पिंग साबित हों, यही सब की कामना होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, सरकार या संसद की भावना होनी चाहिए कि 2025 तक देश चीन से आगे हो।

भारतीय मतदाता इन क्षेत्रों में तुरंत परिणाम चाहते हैं :

  • रोजगार अवसरों में वृद्धि, ताकि पढ़े-लिखे नौजवान अच्छा जीवन जी सकें।
  • जरूरी वस्तुओं के दाम घटें।
  • खान-पान की वस्तुओं में मिलावट पर रोकथाम लगे।
  • गरीबी उन्मूलन और स्वच्छता पर जोर बढ़े।

अर्थव्यवस्था के विकास के 5 महत्वपूर्ण कारक

  • वित्तीय शुचिता को ध्यान में रखकर वित्तीय प्रबंधन।
  • सड़क, रेल, एयरपोर्ट, सिंचाई, बिजली परियोजनाओं, औद्योगिक शहरों के लिए आधारभूत संरचनाओं का विकास करना। इन संरचनाओं के विकास से और भी बहुत सारी समस्याओं से निजात मिल सकती है।
  • कार्यकुशलता और दक्षता को बढ़ावा देने के लिए सुधार की आवश्यकता।
  • पर्यटन और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देना।
  • जनसंख्या पर काबू पाना।

इन पांच बुनियादी कारकों के आधार पर मैंने 22 सूत्री कार्यक्रम तैयार किया है, जिससे भारतीय मतदाताओं की सभी आकांक्षाएं पूरी की जा सकती हैं :

  1. राजकोषीय घाटे को 2017 तक सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत तक लाना।
  2. चालू खाते के घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 0.5 प्रतिशत तक लाना। साथ ही सरकार एक विशेष प्रकोष्ठ का गठन करे जो यह सुझाव दे कि व्यापार में आने वाली बाधाओं को दूर करके ज्यादा से ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाने के लिए क्या किया जाए।
  3. बिजली कंपनियों के कर्जे में कमी लाना (इस संबंध में 19 मई 2014 को सुप्रीम कोर्ट में दिए गए बिजली कंपनियों के दस्तावेज पर ध्यान दिया जाए)। विभिन्न राज्यों पर इन बिजली कंपनियों की लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का बकाया है।
  4. बैंकों के शुद्ध लाभ में कमी लाई जाए। इन बैंकों की बकाया राशि कुल जमा 5 लाख करोड़ रुपए है।
  5. केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के कर्ज में कमी लाई जानी चाहिए। पश्चिम बंगाल सरकार के ऊपर 2.25 लाख करोड़ का कर्ज है, जिसका वार्षिक ब्याज 25,000 करोड़ रुपए वह चूका रही है। राज्य के विकास के लिए सरकार के पास पैसा ही नहीं है। यह भी देखा गया है कि कुछ राज्य ब्याज की किश्तें तो लगातार चुकाते हैं, लेकिन मूलधन बकाया ही रहता है, जोकि वित्तीय अनुशासनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  6. देश में स्वच्छता को बढ़ावा देना। देश के मानव विकास सूचकांक में भी वृद्धि करना। स्वच्छता के मायने बहुत बड़े हैं, यह सिर्फ गांवो में शौचालय की व्यवस्था करने तक सीमित नहीं है। इसमें शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के पर्यावरण की पूरी सुरक्षा के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में 100 प्रतिशत सीवरेज प्रणाली और कचरे के शोधन की व्यवस्था भी शामिल है। इस समस्या को देखते हुए एक अलग मंत्रालय बनाया जा सकता है। इसी तरह एक राष्ट्रीय स्वच्छता कार्यक्रम भी शुरू किया जा सकता है, जिससे भारत की तस्वीर बदले और तभी देश सचमुच ‘अतुल्य भारत’ कहलाएगा।
  7. देश में व्यापार करना आसान बनाना होगा। इस मामले में अभी देश 189 देशों की सूची में 135वें स्थान पर है। साथ ही बढ़ते ड्रग्स की समस्या और मीडिया और फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को रोकने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास करने होंगे। गैर-सरकारी संगठनों को अनुदान देना बंद करना चाहिए, क्योंकि वे भ्रष्टाचार के गढ़ बनते जा रहे हैं।
  8. जरूरी वस्तुओं, खासकर सब्जियों और दाल की कीमतों में कमी लानी चाहिए। इस समस्या से निजात पाने के लिए सभी 7 पूर्वोत्तर राज्यों, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सब्जी की खेती को बढ़ावा देना होगा और सभी शहरों में ‘अपनी मंडी’ की अवधारणा तैयार करनी होगी।
  9. जल संसाधन के साथ-साथ सभी नदी क्षेत्रों में पनबिजली का विकास भी एक अहम मुद्दा है। ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र अकेले 75,000 मेगावॉट बिजली पैदा करने की क्षमता रखता है। अकेले मध्य प्रदेश ही पूरे देश को खाना खिला सकता है, अगर उसके पूरे कृषि योग्य भूमि को अच्छी सिंचाई की सुविधा मिले। पनबिजली और नाभिकीय बिजली संयंत्रों का विकास ताप विद्युत संयंत्रों पर हमारी निर्भरता को खत्म करने में सहायक होंगी। अगले 15 वर्षों में अगर देश ने 1 लाख मेगावॉट तक की क्षमता का विकास न किया तो आगे बहुत मुश्किलें आ सकती हैं।
  10. रेलवे का विस्तार देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में बहुत ही सहायक हो सकता है। फौरी तौर पर 18,000 किलोमीटर की रेल लाइन को डबल करना और उसका विद्युतीकरण करना जरूरी है। रेल बहुत बड़ी संस्था हो गई है और अब इसके पर कतरने की जरूरत है। इसके लिए सबसे पहले तो राज्यों को अपने क्षेत्र में रेल चलाने की इजाजत दे देनी चाहिए। रेल मंत्रालय को बस अंर्तराज्यीय रेल नेटवर्क पर काम करना चाहिए। फ्राईट कॉरीडोर परियोजना को रेलवे की फ्लैगशिप परियोजना में बदल देना चाहिए। रेलवे के विद्युतीकरण से डीजल पर 25,000 करोड़ रुपए का खर्च भी बचेगा। खास योजनाओं की मदद से अनुपयोगी पड़े रेलवे ट्रैक को भी काम में लाया जा सकता है। नए कोयला खदानों और लौह अयस्क पाए जाने वाले क्षेत्रों के लिए भी नई पटरियों की जरूरत है।
  11. सड़क, सीमेंट और स्टील फैक्ट्रियों, जल निकास, बिजली संयंत्रों, बंदरगाहों जैसे निकायों में जबरदस्त ढंग से बुनियादी ढांचे के विकास की जरूरत है। भारत निर्माण योजना को पुनर्जीवित करते हुए अगले 2 साल के अंदर उसका पूरा होना सुनिश्चित करना चाहिए। अधिकतर राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कें काफी बदहाल स्थिति में हैं, इनकी तुरंत मरम्मत करनी होगी।
  12. भारतीय खाद्य निगम में काफी सुधार की जरुरत है। गोदामों की कमी की वजह से जो अनाज सड़ रहे हैं, उनको भी बचाना जरूरी है। अभी भारत में खपत से ज्यादा गेहूं की उपज है। गेहूं का सही ढंग से निर्यात तभी हो सकेगा जब उम्दा किस्म के बीज किसानों को उपलब्ध कराए जाएंगे।
  13. कच्चे तेल की खपत और आयात के खर्चों (जो 160 मीट्रिक टन के लिए 10 लाख करोड़ सालाना है) में कमी लानी होगी। यह हमारे सकल घरेलू उत्पाद के 9 प्रतिशत के आसपास है। इसमें कमी लाने के लिए हमें युद्धस्तर पर देश और विदेश में नए गैस और पेट्रोलियम के संसाधन खोजने होंगे। इतने दिनों में एनएलईपी 9 ब्लॉक में से एक ही ब्लॉक में तेल खोज पायी है। यह कार्यक्रम देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। तेल एवं प्राकृतिक गैस कॉरपोरेशन और गुजरात राज्य पेट्रोल कॉरपोरेशन, दोनों अलग-अलग जगहों पर गैस और पेट्रोल की खोज के लिए बेहतरीन ब्लॉक देने चाहिए। इथेनॉल के उत्पादन को महत्व देते हुए 15 प्रतिशत तक इसे गाडिय़ों के ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। गन्ने की पैदावार बढ़ाने और इथेनॉल के उत्पादन की तकनीक को ब्राजील से आयात करने की जरूरत है।
  14. ताप बिजली संयंत्रों के लिए सही मात्रा में कोयला का उत्पादन सुनिश्चित करना होगा, क्योंकि कोयले की कमी ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी परेशानी है।
  15. सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांति लाने की जरूरत है। सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पानी गरम करने से लेकर खाना बनाने तक किया जाए तो ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों की काफी बचत की जा सकती है। सरकार को चाहिए कि राजस्थान व गुजरात के रेगिस्तानी इलाकों में 2020 तक 50,000 मेगावॉट तक की सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जाए।
  16. जनसंख्या विस्फोट पर 2020 तक काबू पाया जाए। जनसंख्या का मुद्दा एक ऐसे टाइम बम की शक्ल अख्तियार कर चुका है जो कभी भी फट सकता है। जनसांख्यिकीय समस्या को जनसांख्यिकीय लाभांश के रूप में सिर्फ कागजों पर दिखाया जा सकता है।
  17. बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटना भी बहुत जरूरी है या फिर इन राज्यों में उप-राजधानियों की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि प्रशासन का काम आसानी से हो सके। उ.प्र. जैसे राज्य, जो एक देश के बराबर है, में चुस्त प्रशासन कायम करना मुश्किल काम है। एक कुशल प्रशासन के लिए राज्यों का आकर 20 लोकसभा क्षेत्रों के बराबर होना चाहिए। महाराष्ट्र को ही देख लीजिए, राजधानी मुंबई एक कोने में है और दूसरा कोना राजधानी से 1000 किलोमीटर दूर, इसलिए या तो राज्यों का पुनर्गठन होना चाहिए या उप राजधानी की व्यवस्था होनी चाहिए।
  18. देश के पूर्वोत्तर राज्यों में डेयरी और बागवानी केंद्रों का विकास करना चाहिए। बदकिस्मती से ये राज्य आज तक देश की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सके। इसके लिए नई पहल की आवश्यकता है।
  19. अफ्रीकी देशों में चीनी पहल के आधार पर उनकी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनना।
  20. वर्धा और यवतमाल जैसे महाराष्ट्र के जिलों में, जहां किसानों के आत्महत्या के मामले सामने आते रहे हैं, सिंचाई और कृषि विकास के कार्यक्रम चलाने चाहिए।
  21. माओवादी क्षेत्रों में विकास के विशेष कार्यक्रम चलाने चाहिए। आधारभूत संरचनाओं का विकास से ही माओवादिओं के बढ़ते कदम रुक सकेंगे।

रुचिर शर्मा ने अपनी किताब ‘ब्रेकआउट नेशन’ में साफ-साफ लिखा है कि वित्तीय व्यवस्था सिर्फ उन्हीं देशों में गिरी है जो देश इन तीन मापदंडों : राजकोषीय घाटा, चालू खाता घाटा, तथा कर्ज और जीडीपी अनुपात पर नियंत्रण नहीं रख सके। इन मापदंडों का उल्लंघन उन अर्थव्यवस्थाओं में किया गया है जहां पैसे का उपयोग आधारभूत संरचनाओं को मजबूत करने के बदले कल्याणकारी योजनाओं में लगाया गया है। इसलिए यह समय है देश के जागने का और समयानुरूप अपने आर्थिक सुरक्षा के लिए काम करने का। इस 22 सूत्रीय प्रोग्राम में आर्थिक विकास, जीडीपी वृद्धि और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है। अत: सरकार को चाहिए कि इन सभी कार्यक्रमों को लागू करे और चीन को 2025 तक पीछे छोडऩे के अपने लक्ष्य को प्राप्त करे। इस देश में यह करने की क्षमता है और इसमें कोई शक भी नहीं है।

 रामनिवास मलिक

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