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चीन की कथनी-करनी भरोसे के लायक नहीं

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक तरफ तो चीन अपनी राजधानी पेइचिंग में भारत के उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी के स्वागत की तैयारी कर रहा था और दूसरी तरफ उसके सैनिक भारतीय इलाके में घुसपैठ कर रहे थे।

जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घुसपैठ रोकने का दावा कर रहे हैं, वहीं चीन अपनी हरकतों से बाज आता नहीं दिख रहा है। भारत में सरकार बदलने के बाद भी चीन की नीयत नहीं बदली है। वह बार-बार भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ कर इन क्षेत्रों पर अपना दावा पेश करता रहा है। इतना ही नहीं, चीन ने विवादास्पद नक्शा भी जारी किया है, जिसमें उसने कश्मीर के कुछ हिस्से और अरूणाचल प्रदेश को अपने नक्शे में दिखाया है। एक तरफ चीन अपने देश में भारत के उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी का स्वागत कर रहा है, दूसरी तरफ उसके सैनिक भारतीय इलाके में घुसपैठ कर रहे हैं। गौरतलब है कि इसी हफ्ते चीनी सैनिकों ने पूर्वी लद्दाख में पंगोंग झील के भारतीय इलाके में घुसकर उस पर अपना दावा जताया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चीनी सेना नाव पर सवार होकर खारे पानी की इस झील के भारतीय हिस्से में साढ़े पांच किलोमीटर अंदर तक घुस आई थी। यह घटना 24 जून की है। चीनी सैनिक हाई स्पीड इंटरसेप्टर बोट्स में सवार होकर आए थे। बाद में अमेरिका निर्मित इंटरसेप्टर बोट्स में सवार भारतीय सेना की टुकड़ी ने उन्हें पीछे धकेला। इस झील का ज्यादातर हिस्सा तिब्बत में पड़ता है, जो चीन के नियंत्रण में है। बताया गया है कि चीनी सेना लगभग दो घंटे तक भारतीय क्षेत्र में रही। यह पहला मौका नहीं है, जब चीनी सैनिकों इस झील में घुसपैठ की। इस झील में अभी तक 12 बार चीनी और भारतीय सैनिक आमने-सामने आ चुके हैं। नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के वक्त से ही चीनी सरकार दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ते बनाने की बात करती रही है। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन की ऐसी हरकतें दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी पैदा कर सकती है। मौजूदा हालातों को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि चीन की कथनी और करनी भरोसे के लायक नहीं है।

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक तरफ तो चीन अपनी राजधानी पेइचिंग में भारत के उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी के स्वागत की तैयारी कर रहा था और दूसरी तरफ उसके सैनिक भारतीय इलाके में घुसपैठ कर रहे थे। इसी हफ्ते चीनी सैनिकों ने पूर्वी लद्दाख में पंगोंग झील के भारतीय इलाके में घुसकर उस पर अपना दावा जताया था। यह झील समुद्र तल से करीब 4,350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी लंबाई 134 किलोमीटर है और अधिकतम चौड़ाई 5 किलोमीटर है। विवादित पंगोंग झील पर कब्जे को लेकर चीन और भारत के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही है। 1962 की लड़ाई में भी इस झील को लेकर उठे विवाद की बड़ी भूमिका थी। चीन चाहता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसके यहां यात्रा पर आएं, मगर इस तरह की घटनाएं दिखा रही हैं कि चीन के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। वह लंबे अर्से से भारतीय इलाके में घुसपैठ करके उस पर दावा जताता रहा है। बीते साल भी कई मौकों पर चीनी सैनिकों ने लद्दाख में घुसपैठ की थी। इसके अलावा चीन ने अपना एक ताजा मानचित्र जारी कर अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताया ही है, जम्मू-कश्मीर के एक बड़े हिस्से को भी अपना अंग बताया है। भारत ने चीन के इस मानचित्र पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा है कि नक्शा जारी करने से जमीनी सच्चाई नहीं बदल जाती। अरुणाचल प्रदेश भारत का अंतरंग हिस्सा है जिसे कभी अलग नहीं किया जा सकता। इस मसले को चीन के साथ सर्वोच्च स्तर पर उठाया जाता है। उल्लेखनीय है कि एक अमेरिकी अंग्रेजी अखबार ने चीन द्वारा जारी नए मानचित्र को प्रकाशित किया है, जिसमें दक्षिण चीन सागर के अधिकांश इलाके को चीन में दिखाया गया है। इससे दक्षिण-पूर्व एशिया के तटीय देशों में खासी नाराजगी है। अखबार ने इसी नक्शे की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा है कि नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से को चीन का हिस्सा बताया गया है। अखबार की रपट में यह पूछा गया है कि क्या चीन का यह नक्शा युद्ध शुरू कर सकता है?

यह भी उल्लेखनीय है कि दो साल पहले चीन ने अपने नागरिकों को जारी किए नए पासपोर्ट के पन्नों पर चीन का मानचित्र छापा था, जिसमें अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताया गया था। अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किलोमीटर और जम्मू-कश्मीर के अक्साईचीन के 32 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर चीन अपना दावा पिछले छह-सात दशकों से करता आया है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीरी इलाके में एक नई रेल लाइन बिछाने और सड़क मार्ग तैयार करने की योजना पर भी चीन ने अमल शुरू कर दिया है, जो भारत के लिए चिंता की बात है। कश्मीर के इस इलाके से चीन अपने शिनच्यांग प्रांत के काशगर शहर को कराची बंदरगाह से जोडऩे की नई महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। भारत ने चीन की इस योजना पर भी ऐतराज जताया है। दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि चीन चाहे जितना शक्तिशाली क्यों न हो जाए, पर वह कभी भी अपनी इच्छा दूसरों पर थोपने की कोशिश नहीं करेगा। जिनपिंग ने बीजिंग में भारत और म्यांमार (बर्मा) के नेताओं की मेजबानी करते हुए यह बात कही थी। भारत और म्यांमार के नेता पंचशील की 60वीं वर्षगांठ के मौके पर बीजिंग पहुंचे थे। 60 साल पहले चीन ने भारत और बर्मा के साथ आक्रमण और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का समझौता किया था। चीन के कई पड़ोसी देश उसके साथ सीमा विवाद में उलझे हैं। वो चीन के बढ़ते सैन्य खर्च से चिंतित हैं और कुछ इसे उसकी हठधर्मिता मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आधिपत्य या सैन्यीकरण चीन के जींस में नहीं है। चीन शांतिपूर्ण विकास के लिए दृढ़ रहेगा क्योंकि यह चीन के लिए, एशिया के लिए और दुनिया के लिए अच्छा है। चीनी राष्ट्रपति के भाषण का मकसद साफ था। वह पड़ोसी देशों को भरोसा दिलाना चाहते थे, पर यह संदेश का कितना असर होगा, यह अलग बात है। कहा तो यह भी जा रहा है कि चाहे चीन के राष्ट्रपति कितनी भी मीठी-मीठी बातें कर लें, लेकिन मौजूदा हालात यह कतई नहीं कहता कि भारत को उस पर भरोसा करना चाहिए।

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