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धर्म निरपेक्षता बनाम सर्वधर्म समभाव

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी की हिम्मत की दाद देनी चाहिए कि उन्होंने माना कि सेकुलरवाद को लेकर कांग्रेस को अपना रास्ता ठीक करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि लोग समझते हैं कि कांग्रेस एक तरफ बहुत झुक गई है। बात सही और खरी है। वैसे ये तो उसी दिन साफ हो गया था जिस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री डॅा. मनमोहन सिंह ने कहा था कि ‘देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है।’ मगर देर आयद, दुरुस्त आयद। अब भी अगर कांग्रेस बेबाकी से इसकी परख करेगी तो ये पार्टी के साथ-साथ देश के लिए भी अच्छा होगा। कांग्रेस देश की बड़ी पार्टी है। उसकी सोच और चिंतन में विकृति देश के लिए घातक है। इसलिए एंटनी का ये बयान महत्वपूर्ण है।

दरससल ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द ही सही नहीं है। पश्चिमी देशों में चर्च को राज्य और शासन से अलग करने के संदर्भ में ‘सेकुलरवाद’ की सोच आई। मगर उसे ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहकर पश्चिम प्रेरित भारतीय बुद्धिजीवियों ने उसका अनर्थ ही कर डाला। जिसकी व्याख्या राजनेताओं ने अवसर के अनुसार अल्पसंख्यकों को भरमाने के लिए की। और यह वोट की राजनीति का एक बड़ा औजार बन गया। जिसने इस शब्द या सोच पर बहस की बात की उसे ‘सांप्रदायिक’ लेबल चिपकाकर एक तरह से बहिष्कृत कर दिया गया। नेहरुवादियों और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने ऐसी सोच रखने वालों को देश के अकादमिक, सांस्कृतिक और चिंतन-मनन के सभी उपक्रमों से बाहर रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जीवित व्यक्तियों की बात तो अलग इन लोगों ने देश के संत कवियों और साहित्यकारों का भी वर्गीकरण कर दिया और इनके अनुसार कबीर सेकुलरवादी और तुलसी सांप्रदायिक हो गए! भारतीय मनीषा में ऐसी सोच कभी नहीं रही। राजनीतिक और अकादमिक अश्पृश्यता का यह खेल खूब चला। लेकिन इसकी परिणति हुई 2014 के चुनाव में जब देश ने इन सबको नकार दिया।

जिस देश की परम्पराएं, शिक्षा-संस्कार, नैतिक मूल्य, समाज व्यवहार, सांस्कृतिक कार्यक्रम और यहां तक कि लोगों की दिनचर्या धर्म से प्रेरित होती हो; जो देश दुनिया के ज्यादातर धर्मों का जनक हो; जहां अन्तरिक्ष में रॉकेट छोडऩे से पहले नारियल तोड़ा जाता हो यानि तकरीबन सब कुछ धर्म आधारित हो वहां राजनीति और राजकाज क्या धर्म से निरपेक्ष हो सकता है? इस सोच और शब्द ने हमारे जीवन और व्यवहार में एक तरह का दोहरापन पैदा कर दिया है। एक तरफ धर्म में गहरी आस्था है तो दूसरी तरफ उन सब संस्कारों और रिवाजों को आडंबर मानने का उपक्रम है, जो धार्मिक अस्थाओं से पैदा होते हैं।

आप मानें या न मानें भारत में खुली सोच, बहुलवादी विचारों को मान्यता, लोकतान्त्रिकता – ये सब बहुसंख्यक हिन्दू विचार, जीवन शैली और तात्विक दर्शन से ही निकलते हैं। ये देखना जरूरी है कि क्या हिन्दू सोच में धर्म पूजा-पद्धति का प्रतीक है? नहीं। यह जीवन दर्शन और मूल्यों का प्रतीक है। गीता में कृष्ण अर्जुन को एक योद्धा का धर्म समझाते हैं न कि पूजा-पाठ का तरीका। गांधी ने इसे सही पहचाना था। सोचने की बात है कि जब वे रामराज्य की बात करते थे क्या वह बहुसंख्यकों का शासन चाहते थे? इसलिए भारत में धर्म से अलग न तो कुछ है, न हो सकता है, क्योंकि धर्म का मतलब है जीवन शैली। इसलिए यहां सबकुछ धार्मिक है। पूजा पद्धतियों को धर्म से अलग कर के देखने की जरूरत है।

और अगर आप सहूलियत के लिए मोटे तौर पर धर्म को भी हिन्दू, इस्लाम और ईसाईयत के नजरिये से देखना चाहते हैं तो भी धर्मनिरपेक्षता एक सही विचार नहीं है। इसकी जगह होना चाहिए ‘सर्व धर्म सम भाव’ यानि राजा का कर्तव्य या धर्म है कि वे अलग-अलग मजहबों में यकीन करने वाले नागरिकों को एक समान भाव से देखें। इसके आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव न हो। सबको समान अवसर मिले। कोई ईश्वर को किस रूप में देखता है और पूजता है, इसके आधार पर सरकार उससे अलग व्यवहार न करे।

सोचिए, अल्पसंख्यकों को सिर्फ और सिर्फ एक वोट समूह मानकर उनके साथ सबसे बड़ा छल और धोखा ही किया गया। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, सेकुलरवादी तमगा लगाए अनेक दलों ने ऐसा ही किया। अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों को एक तरफ तो एक झुनझुना दिखाया जाता रहा और दूसरी तरफ उन्हें डराया जाता रहा। ‘हमें वोट दो नहीं तो… (मोदी) आ जाएगा।’ इसका ताजा उदाहरण हैं महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुसलमानों को आरक्षण का झुनझुना। सब जानते हैं कि देश के कानून और संविधान के अनुसार ये नहीं हो सकता। मगर हर दल दूसरे से ज्यादा धर्मनिरपेक्ष दिखने के लिए एक ओर ज्यादा से ज्यादा झुका दिखना चाहता है। एंटनी की राय इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है।

जरूरत है कि इस पर देश में एक खुली और बेबाक बहस हो। हमें पश्चिम से ली गई बनावटी धर्मनिरपेक्षता चाहिए या सहज और स्वाभाविक तौर पर हमारी सोच में बसा विचार – सर्व धर्म समभाव – यानि सबके साथ समान व्यवहार। सबको आगे बढऩे के समान अवसर। तरक्की सबके साथ और इसमें सबका साथ और सहभागिता। संसाधनों पर किसी का पहला हक नहीं बल्कि साझा हक। चूंकि कांग्रेस के एक अल्पसंख्यक नेता ने ये बात कही है तो इस पर बहस हो भी सकती है। नहीं तो अब तक ना जाने कितना हो हल्ला हो गया होता। कांग्रेस से इसकी शुरुआत होगी यह भी उचित है क्योंकि देश भर में 44 सीटें मिलने के बाद उसे आत्मविश्लेषण की बेहद जरूरत है।

उमेश उपाध्याय

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