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भज गोविन्दम भज गोविन्दम…

ईश्वर जब संसार में किसी को मनुष्य योनी देकर भेजता है, उससे पहले उसे गर्भ में नौ महीने तक मल-मूत्र और मां की सांस के सहारे रहना पड़ता है। उस अवस्था में जीव हमेशा प्रभु से यही कहता है कि मुझे इस नरक से निकाल। मैं अपने जीवन का सारा समय तेरा स्मरण करूंगा। तेरा शुक्रिया करूंगा। तब प्रभु उसकी इस पुकार पर उसको उस अवस्था से निकाल कर इस धरती पर भेजते हैं। लेकिन जो वादा वह करके आया था, कि 24 घंटों में 24 घंटे तेरा स्मरण करूंगा, क्या वह 24 मिनट भी पूरे मन से उसका स्मरण करता है? संसार में आते ही समाज उसे अपने हिसाब से बनाता है जीवन की हर अवस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था, सब अवस्थाओं में। प्रभु ने उसे क्या बना कर भेजा था और वह क्या बन गया है। क्या उसका पूरा जीवन ही एक झूठ का पुलिंदा बन के रह गया है! इसका एहसास उसे तब होता है जब वह अपने जीवन के आखिरी मुकाम पर होता है। पर अब क्या हो सकता है? अब तो उम्र गई। हर समय डरा डरा सा रहता है। यदि उसने अपने जीवन में उस प्रभु को भज लिया होता, उसका मन से स्मरण किया होता तो उसका जीवन ऐसा नहीं होता। अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर वह इतना अकेला नहीं होता और उसे इस बात का एहसास और भरोसा रहता कि प्रभु उसके साथ है। अगर हम प्रभु की तरफ एक कदम बढ़ाते हैं तो प्रभु हमारी तरफ 7 कदम बढ़ाता है। वह परम कृपालु है।
जब यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि इस संसार में सबसे अलग, सबसे जुदा क्या है? तब युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि मनुष्य जान कर भी जानता नहीं, देखकर भी देखता नहीं, सुन कर भी सुनता नहीं। सोया-सोया पूरा जीवन निकाल देता है। अपने विवेक को जगाता ही नहीं। सही क्या है, गलत क्या है, ये जानने के लिए उसके पास वक्त है ही नहीं।
आज जब हम पूजा में बैठते हैं, हमारा ध्यान 5 मिनट भी प्रभु की तरफ नहीं होता। क्यों न हम सही और गलत का फर्क जानकर प्रभु को भजें। हमेशा उसे भजो और जियो। हे मूढ़मति, जीवन अनमोल है। सदगुरु कह गए हैं-
स्वांसा दी माला नाल सिमरा मैं तेरा नाम
बन जावा बन्दा मैं तेरा हे कृपा निधान!!

ललित अग्रवाल

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