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शंकराचार्य को सम्मान दें

आजकल देश में भारी-भरकम धार्मिक हड़कम्प मचा हुआ है। विश्वप्रसिद्ध जगन्ननाथ रथ यात्रा के लिए पुरी की गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती का मानना था कि ‘भगवान् जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा’ के रथों पर भक्तों का चढऩा ‘महापाप’ है और इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। भगवान् जगन्नाथ के मुख्य सेवक पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव जी ने भी शंकराचार्य के इस विचार का समर्थन किया है। भगवान् जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों पर भक्तों को चढ़ाकर अपनी जेबें भरने वाले दैतपतियों, पंडों और पुजारियों को यह अच्छा नहीं लगा। यह भी आरोप है कि लालची पंडों के दुव्र्यवहार, मारपीट और भारी धन प्राप्त करने के लिए और भगवान को बेचने की कोशिशों में प्रत्येक वर्ष अप्रिय घटनाएं होती रहती हैं।

इस घटनाक्रम के तहत सत्तारूढ़ बीजद सरकार को मजबूरन कड़ा कदम उठाना पड़ा, लेकिन उसे जल्दी ही पता चल गया कि ऐसे उभरते हुए अशांत माहौल को रोकना आसान नहीं है। इसलिए उसे सर्वदलीय बैठक बुलानी पड़ी। लेकिन उस सर्वदलीय बैठक का परिणाम भी शून्य रहा। इसी बीच उड़ीसा उच्च न्यायालय ने एक लम्बित मामले में अपना फैसला सुनाते हुए शंकराचार्य की याचिका को लागू करने के आदेश दे दिए।

इस निर्णय की वजह से संबंधित दैतपतियों को शर्मिन्दगी उठानी पड़ी। उन्होंने थोड़ा सा शोर जरूर मचाया, लेकिन अन्त में बात उनकी समझ में आ गई और उन्हें शंकराचार्य के निर्देशों का पालन करने के लिए सहमत होना पड़ा। इसी बीच मन्दिर प्रशासन ने शंकराचार्य को उनके पारम्परिक आगमन के लिए आमन्त्रित करते हुए एक पत्र लिख कर उन्हें रथ पर अकेले ही विराजमान होने का अनुरोध किया। परम्परा के अनुसार शंकराचार्य गोवर्धनपीठ का एक छोटा-सा दल बनाकर अपने भक्तों के साथ रथों पर चढ़कर पूजा-अर्चना करते हैं। परंतु इस साल मन्दिर प्रशासन ने अपने पत्र में शंकराचार्य को यह स्पष्ट किया था कि रथ पर उनके साथ कोई भी नहीं चढ़ सकेगा। इस प्रतिबंध ने शंकराचार्य को क्रोधित कर दिया। मन्दिर प्रशासन के इस निर्णय का विरोध करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि वह रथों पर चढ़कर पारम्परिक पूजा-अर्चना नहीं करेंगे और इस आयोजन से दूर रहेंगे। उन्होंने खुद को इस पूरे आयोजन से दूर रखा। मन्दिर प्रशासन ने सफ ाई देते हुए कहा कि उड़ीसा उच्च न्यायालय के आदेशों के मुताबिक ही शंकराचार्य को वह पत्र भेजा गया था, जबकि विपक्षी भाजपा ने फैसले को अनावश्यक करार दिया। पुरी के शंकराचार्य ने राज्य की नवीन पटनायक सरकार पर संवेदनशील मुद्दों को ठीक से हल न करने के आरोप लगाए हैं। उनके आरोप हैं कि सरकार कुछ असामाजिक तत्वों के हाथों की कठपुतली बन गई है। उनका यह भी आरोप है कि राज्य प्रशासन निहित स्वार्थी तत्वों के हाथों का खिलौना बन गया है। वे लोग सेवकों के एक वर्ग को लाभ पंहुचाना चाहते हैं भले ही ऐसा करने से हिन्दू संस्थानों और शंकराचार्य की छवि को नुकसान ही क्यों न पंहुच रहा हो। यह आश्चर्यजनक है कि हिन्दू धर्म की शीर्ष पीठ के प्रमुख शंकराचार्य को प्रशासन के रहमो-करम पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

इस संदर्भ में सभी दलों के राजनेता पुरी के शंकराचार्य के आश्रम में एकत्र हुए। केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान और जुएल ओराम ने भी उनसे भेंट की। विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मन्दिर प्रशासन के रवैये की जबर्दस्त निंदा की।

गोवर्धनपीठ की स्थापना जगदगुरू आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। यह पवित्र स्थान 2492 वर्ष प्राचीन है। ऋग्वेद से संबंधित होने के कारण यह पीठ चारों पीठों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह गलतफ हमी है कि जगन्नाथ मन्दिर चार धामों में से एक है। वास्तव में धाम तो ‘गोवर्धन मठ’ है। जगन्नाथ मन्दिर वर्ष 1174 ईस्वी में बना था, जब अनंग भीमदेव ने मन्दिर का पुनर्रुद्धार कराया था। जहां तक अधिकारों की बात है, अभिलेखों के अनुसार श्री जगन्नाथ मन्दिर के सभी धार्मिक मामलों में शंकराचार्य धर्मगुरू, मुख्य सलाहकार और निरीक्षक की भूमिका निभाते हैं।

पुरी के शंकराचार्य को सहायकों के बगैर रथों पर अकेले चढ़ कर पूजा-अर्चना करने के लिए कहना मन्दिर प्रशासन का गैर-जिम्मेदाराना और धृष्टतापूर्ण काम है जिसके लिए मन्दिर प्रशासन को जल्दी से जल्दी शंकराचार्य से माफी मांगनी चाहिए।

रथ यात्रा के दौरान रथों पर पारम्परिक ढंग से मौजूद रहने पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश मन्दिर प्रशासन का अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करना है। इस विवाद में अन्य संगठन भी शामिल हो गए हैं। शंकराचार्य के अधिकारों को चुनौती देती एक जनहित याचिका भी उड़ीसा उच्च न्यायालय में दायर की गई है। इस याचिका में कहा गया है कि रथ यात्रा के दौरान शंकराचार्य का रथों पर चढऩे का कोई प्रामाणिक दस्तावेज मन्दिर के रिकॉर्ड में नहीं है। याचिका दायर करने वाले का मानना है कि पूजा या रथों पर चढऩे की परम्परा में शंकराचार्य की कोई भूमिका नहीं है।

मेरा यह मानना है कि धर्म का राजनीति के साथ घालमेल करना एक खतरनाक प्रवृत्ति है, क्योंकि धार्मिक रुझान लोकतान्त्रिक भावनाओं के बिल्कुल विपरीत है। राजनीति शासक वर्ग की आचार संहिता है। राजनीति हमेशा मनुस्मृति या यज्ञवाल्कव्यस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों का हिस्सा रही है। धर्मशास्त्र ऋषि-मुनियों द्वारा लिखी गई पुस्तकें हैं जो विभिन्न वर्गों और वर्णों के अनुसार नागरिकों को उनके कर्तव्यों का निरूपण करती है। धर्म बुनियादी रूप से समाज के कल्याण के लिए है जबकि राजनीति उसका एक हिस्सा भर है।

धर्म और राजनीति, दोनों ही ज्वलनशील विषय हैं। उन्हें परस्पर मिला देना निश्चित रूप से अग्नि को प्रज्जवलित करना है। अदालतें धार्मिक मामलों के फैसलों को लटकाए नहीं रख सकतीं। इन या अन्य कारणों से लगभग प्रत्येक राष्ट्र ने ईश्वर को संविधान के दायरे से बाहर रखने के लिए दीवार खड़ी की हुई है। लेकिन लगता है भारत में वह दीवार छीजने लगी है। जब राजनीति की गर्मी बढ़ती है तो धार्मिक विश्वास की अनदेखी करना मुश्किल हो जाता है। करोड़ों लोगों के लिए ईश्वर की आवाज किसी अन्य आवाज से ऊंची होती है। ईश्वर और राजनीति वास्तव में मानवीय व्यवहार और मानवीय आकांक्षाओं के बीच का संघर्ष है। हम सब उस संघर्ष का हिस्सा हैं और एक बार जब हम इस तथ्य को महसूस कर लेते हैं तो संकट समाप्त होने लगता है, कम से कम तब के लिए तो समाप्त हो जाता है। मन्दिर प्रशासन माफी मांगने के मुद्दे पर शोर मचा रहा है। वह दोहरा रहा है कि शंकराचार्य का वह पूरा सम्मान करता है। ब्रह्मांड का निर्माता अपने चक्ररूपी नेत्रों से इस सारे प्रकरण को निहार रहा है। जय जगन्नाथ!

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