ब्रेकिंग न्यूज़ 

सत्य और ज्ञान की खोज

आदि काल से सत्य और ज्ञान की खोज के तीन ही मार्ग उपलब्ध रहे हैं। धर्म, दर्शन और विज्ञान। इन तीनों की खोज मूलत: एक ही दिशा में रही है। ये तीनों उसी परम तत्व की तलाश में तत्पर रहे हैं, जो अटल हैं और जिसे चाहे जिस काल में या जिस भी कोण से देखें, वह सदा स्थिर ही दिखा है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो उस अटल सत्य पर समय और स्थान के परिवर्तन का कोई असर नहीं पड़ता है। ऋषि-मुनियों की भांति आज के विज्ञानी भी मानने लगे हैं कि इस दृष्टिगोचर विश्व की उत्पत्ति अवं अस्तित्व का एक ही मूल स्रोत है तथा इस कौतुकपूर्ण उत्कृष्ट सृष्टि के संचालक नियमों एवं क्रियाकलापों का भी एक ही सूत्रधार है। लगता है दर्शन और विज्ञान अपनी अलग-अलग शब्दावली में जैसे एक ही सत्य को उजागर कर रहे हों। ऐसी स्थिति में धर्म, दर्शन और विज्ञान के पारस्परिक सम्बन्धों को जानने की हमारी उत्सुकता नितांत स्वाभाविक बन जाती है। यह धारणा केवल भ्रम है की विज्ञान धर्म विरोधी है और वैज्ञानिक अनिर्वायत: अनीश्वरवादी होते हैं। वास्तविकता यह है कि प्रगाढ़ माटी विज्ञानियों में शायद ही ऐसा कोई मिले जिसकी निजी धार्मिक भावनाएं न हो और जिसने ईश्वर के अस्तित्व को दो-टूक अस्वीकार कर दिया हो। यह जरूर है की ईश्वर के सम्बन्ध में इन लोगों की धारणा आम लोगों से भिन्न होती है। ईश्वर का प्रयोजन उनके लिए निजी लाभ-हानि से हट कर विराट-विश्व के रहस्यों से जुड़ा है।

देवतुल्य नास्तिक

लेखक : अरुण भोले

प्रकाशक : राजकमल

मूल्य: 350 रु.

पृष्ठ: 192

धर्म, दर्शन और विज्ञान अपने अपने तरीके से सत्य की खोज करते रहते है। स्थूल रूप से इनकी चेष्टायें विरोधी प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन गहरे मंतव्यों में लक्ष्य एक ही है। आस्तिक और नास्तिक केवल व्यवहारिक विभाजन है -प्रक्रिया की भिन्नता के कारण। ‘देवतुल्य नास्तिक’ पुस्तक में लेखक अरुण भोले कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के माध्यम से जीवन के रहस्यों को जानने का प्रयास करते है। अरुण भोले धर्म, दर्शन, विश्व इतिहास और राजनीति के गंभीर अध्येता और विचारक है। उनकी लेखनी से ‘राजनीति मेरी प्रेयसि’ और ‘धर्मो की कतार में इस्लाम’ जैसे ख्यातिलब्ध किताबें प्रस्तुत हो चुकी है। ‘ज्ञानपिपासू गौतम’, ‘अंतर्मुखी विज्ञान’, संदेह और श्रद्धा के संगम’, संवाद और सहयोग’, जले दीप से दीप ‘,तथा ‘विज्ञान और नियति’ शिक्षकों के अंतर्गत लेखक ने सत्य और ज्ञान की खोज करने वाले विश्वविख्यात व्यक्तियों का विश्लेषण किया है। लेखक का उद्देश्य स्पष्ट है। वह चाहता है कि शक्तियों में समन्वय हो।

लेखक के ही शब्दों में : अपने अन्वेषण और प्रयोगों से विज्ञान ने जो तथ्य बटोरे हैं , उन सबके आत्यंतिक अर्थ क्या है तथा लोकमंगल की दृष्टि से उनका परम उपयोग क्या होगा , इसी को बोध ज्ञान माना जायेगा। वैसे ज्ञान के आभाव में अमर्यादित वैज्ञानिक जानकारियां हमें सर्वनाश की और ले जा सकती है। यही वह स्थल है जहां हमें धर्म और दर्शन की सहायता लेनी पड़ेगी; क्योंकि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि जीवन को संवारने और मानवीय भावनाओं को प्रभावित करने का अधिक अभ्यास और अनुभव दर्शन और धर्म को ही है। अंतत: यह कहा जा सकता है कि ‘देवतुल्य नास्तिक ‘विश्व संस्कृति की अंतर्धाराओं का प्रवाहपूर्ण प्रामाणिक और सतर्क विश्लेषण है।

नीलाभ कृष्ण

ratingfxcrack

Leave a Reply

Your email address will not be published.