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कांग्रेस-भाजपा की अपनी-अपनी खींचतान

भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सशक्त नेतृत्व में सत्ता की बागडोर दूसरी बार संभाली है। वसुन्धरा ने लोकसभा की सभी 25 सीटों पर विजय हासिल करने के मकसद से पुराने अनुभवी सहयोगियों के साथ छोटा मंत्रिमण्डल गठित किया था तथा विधायकों को मिशन-25 की सफलता की दौड़ में लगा दिया था।

राजस्थान में पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों में कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी को मिली अप्रत्याशित हार तथा जीत ने भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से देश के सबसे बड़े इस प्रांत की राजनीति में नए आयाम जोड़ दिए हैं। लेकिन ऐतिहासिक चुनावी पराजय का बोझ ढो रहे प्रमुख प्रतिपक्ष कांग्रेस में हार का ठीकरा एक दूसरे पर फोडऩे की कवायद हो रही है, वहीं प्रचण्ड बहुमत से सत्तारूढ़ हुई भाजपा में भी सत्ता एवं सगठन में भागीदारी को लेकर खींचतान और गुटबाजी को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

पहले विपक्षी दल कांग्रेस के अंदरूनी हालात का जायजा लेते हैं। राजनीति का स्वाभाविक चरित्र ही ऐसा है कि चुनावी हार को लेकर एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपने आप को बचाने का प्रयास किया जाता है। कांग्रेस ने भी विभिन्न स्तरों पर हार के कारणों की जांच पड़ताल तथा फीडबैक लेने की कवायद की और इस प्रक्रिया में परस्पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने के साथ कुछ जिलों में हाथापाई की नौबत भी आयी। यही नहीं पार्टी कार्यकताओं ने ऐसे पर्यवेक्षकों को भी आड़े हाथों लेने में गुरेज नहीं किया जो खुद चुनाव हार गए थे और बतौर पर्यवेक्षक हार के कारणों का पता लगाने आए थे। पार्टी कार्यकताओं ने नेताओं को खरी खोटी सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राजधानी जयपुर से लेकर जिलों में भी ऐसे दृश्य दिखाई दिए। जयपुर में तो अलग-अलग बैठकें आयोजित की गईं। पार्टी के राज्य स्तरीय नेताओं की पार्टी हाईकमान के निर्देश पर दिल्ली में पेशी हुई जिसमें चुनावी हार को लेकर समीक्षा की गई। मौटे तौर पर विधानसभा चुनाव में हार का नजला तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. चन्द्रभान पर उतरा, जो स्वयं अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए थे। इसी प्रकार लोकसभा चुनाव (अजमेर संसदीय क्षेत्र) हारने वाले तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को पार्टी की पराजय का जिम्मेदार माना गया।

इस बीच केन्द्र स्तर पर कांग्रेस की शर्मनाक पराजय पर मंथन तथा पार्टी संगठन में फेरबदल की उहापोह में प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मुखर विधायक भवंरलाल शर्मा की कांग्रेस मुखिया सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी को लेकर की गई बयानबाजी और तीखे तेवर से कांग्रेसजन सकते में आ गये। यह भी सुगबुगाहट हुई कि भंवरलाल शर्मा असंतुष्ट कांग्रेस विधायकों को लेकर नया गुट बना विधानसभा में पार्टी की प्रतिपक्ष नेता की कुर्सी का अस्तित्व भी संकट में डाल सकते हैं। चुरू जिले के पार्टी कार्यकताओं से विचार-विमर्श कर अगले कदम की घोषणा के चलते शर्मा के कथित विद्रोह का तूफान फिलहाल ठंडा दिखाई दे रहा है। बहरहाल विधानसभा के बजट सत्र में भंवर लाल शर्मा और उनके समर्थकों की भूमिका पर सभी की निगाहें रहेंगी।

उधर विधानसभा, लोकसभा चुनावों के बाद राजस्थान के ग्रामीण अंचल की राजनीति में कांग्रेस की रही सही पैठ भी जिला परिषद एवं पंचायत समितियों के रिक्त हुए प्रमुखों के उपचुनावों के नतीजों से धूमिल हो गई। विधानसभा चुनाव में करारी हार तथा प्रदेश की जातीय राजनीति के समीकरणों के चलते बीकानेर अचंल के जाट नेता रामेश्वर डूडी को विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता का दर्जा दिलवाया गया। वह बीकानेर के जिला प्रमुख थे। जिला परिषद में कांग्रेस के 24 सदस्य थे इसके बावजूद उपचुनाव में दोफाड़ हुए पार्टी पार्षदों के बागी खेमे ने डूडी धड़े को पटकनी देने में झिझक महसूस नहीं की। इस शर्मनाक पराजय से डूडी के प्रतिपक्ष नेता पद पर सवालिया निशान लगाए जाने लगे हैं। वहीं बीकानेर संभाग के चुरू जिले में भंवरलाल शर्मा की पार्टी हाईकमान के खिलाफ खुली बगावत से यह बवंडर क्या रूप लेता है इसका क्यास लगाया जा रहा है।

लोकसभा चुनाव से ऐन पहले पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभालने वाले सचिन पायलट ने अधिकतर दिल्ली में रहकर यह जिम्मेदारी निभाने की औपचारिकता पूरी की। वह अभी तक प्रदेश के कांग्रेसजनों से पूरी तरह परिचित नहीं हो पाए हैं। हालात यहां तक हो गए हैं कि प्रदेश मुख्यालय पर उनके आगमन पर कांग्रेस की गुटबाजी परस्पर नारेबाजी के रूप में उभर कर आयी। महगांई के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन एवं धरने की तैयारी को लेकर आयोजित बैठकों में जयपुर के कांग्रेसजन आमने-सामने हो गये तथा नगर निगम में कांग्रेस पार्षदों की गुटीय राजनीति बैठक का केन्द्र बिंदु बन गई। पूर्व सांसद महेश जोशी तथा पूर्व विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास ने जैसे-तैसे मामले को शांत किया तथा धरने की औपचारिकता निभाने के लिये माहौल बनाने का प्रयास किया। फिलहाल राजधानी में कांग्रेसजन प्रदर्शन करने की स्थिति में नहीं हैं। इसका खुलासा हो गया है। उधर अति उत्साह से लबरेज भाजपा में सत्ता एवं संगठन में बेहतर तालमेल की मशक्कत जारी है।

दो सौ सदस्यीय विधानसभा में पहली बार 163 सीटों के प्रचंड बहुमत से जीत हासिल कर भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सशक्त नेतृत्व में सत्ता की बागडोर दूसरी बार संभाली। वसुन्धरा ने लोकसभा की सभी 25 सीटों पर विजय हासिल करने के मकसद से पुराने अनुभवी सहयोगियों के साथ छोटा मंत्रिमण्डल गठित किया तथा विधायकों को मिशन-25 की सफलता की दौड़ में लगा दिया। स्वयं वसुंधरा ने राज्य के संसदीय क्षेत्रों को नापने में कोई कसर नहीं रखी तथा भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह की बाड़मेर सीट पर खुली बगावत के बावजूद सभी 25 सीटें पार्टी की झोली में डालने में सफल रही।

सत्ता के विकेन्द्रीकरण की तर्ज पर अपने पहले शासनकाल में संभाग मुख्यालयों पर कैबिनेट एवं जनसुनवाई के साथ राज्यस्तरीय स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के आयोजन की अनूठी पहल की थी। कांग्रेस की खुली आलोचना के बावजूद वसुंधरा राजे ने इसे जारी रखा तथा अब दूसरी मर्तबा इसमें नया अध्याय जोड़ दिया। पिछली बार उपेक्षित रहे भरतपुर संभाग से वसुंधरा राजे ने ‘सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम की शुरूआत की। चार फरवरी से अठारह फरवरी तक समूचा शासन-प्रशासन भरतपुर संभाग के चारों जिलों में सिमट गया। पहली बार मंत्रीगण तथा मुख्य सचिव से लेकर सचिव स्तर तक के वरिष्ठ नौकरशाह सुदूर गांवों तक गए। मौके पर हालात और जनसमस्याओं का जायजा लेते हुए ग्रामीणों की जनसुनवाई कर उन्हें राहत देने का प्रयास किया और अंत में कैबिनेट की बैठक में क्षेत्रीय जनता को सौगातें देने के साथ प्रदेश व्यापी निर्णय भी लिए गए। जून माह में भीषण गर्मी तथा लपलपाती लू के थपेड़ों में यही क्रम बीकानेर संभाग में दोहराया गया। अगस्त माह में झीलों की नगरी तथा आदिवासी अंचल को समेटे उदयपुर संभाग का नम्बर है। फिर कोटा, जोधपुर, अजमेर संभाग की बारी आएगी।

इन दौरों में शामिल सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. अरूण चतुर्वेदी ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि सरकार आपके द्वार कार्यक्रम का अनुभव अच्छा रहा। आम-जनता की वर्षों से छोटी-मोटी समस्याओं का हाथों हाथ समाधान हुआ। चतुर्वेदी का कहना था कि ऐसा लगा कि नीचले स्तर पर प्रशासनतंत्र का सिस्टम ही कोलेप्स हो गया है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जन्म या जाति प्रमाण-पत्र इत्यादि लेने के लिए ग्रामीणजन चक्कर काटते-काटते लाचार हो गये थे, जनसुनवाई में वह काम हाथों-हाथ हुआ तथा प्राप्त आवेदन पत्रों को वर्गीकरण कर उनके समाधान का फॉलोअप किया जा रहा है। भविष्य में प्रशासन तंत्र को पुख्ता तथा जनता के प्रति संवेदनशील बनाने के प्रयास भी किए जाएंगे। राज्य के मुख्य सचिव राजीव महर्षि का भी यह मानना है कि संभाग के सुदूरवर्ती गांवों में जाने तथा लोगों की परेशानियों को प्रत्यक्ष समझने का अवसर मिला है। इससे कुछ नया सीखने का भी मौका मिला है।

सुराज संकल्प यात्रा से विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान का आगाज करने वाली तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के बाद जयपुर के महापौर रहे तथा आदर्श नगर के विधायक अशोक परनामी की प्रदेश अध्यक्ष पद पर नियुक्ति कराकर सत्ता एवं संगठन स्तर पर बेहतर तालमेल बिठाने का प्रयास किया। वसुंधरा मंत्रिमण्डल के विस्तार को लेकर विधायक अधीर हो उठे हैं। भरतपुर संभाग के दौरे के बाद विस्तार की अटकलें लगी तथा राजभवन में शपथ समारोह की तैयारियों की खबरें भी फूटीं। फिर बीकानेर संभाग का दौरा भी हो गया। ग्यारह जुलाई से आरम्भ विधानसभा के बजट सत्र से मंत्रिमण्डल विस्तार को लेकर फिर प्रश्न चिन्ह लग गया है। हालात यह है कि अजमेर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित सिंचाई एवं जल संसाधन मंत्री सांवरलाल जाट को मंत्रिमण्डल की न्यूनतम संख्या के चलते मुक्त नहीं किया गया है। वह सदन के सदस्य नहीं रहे, लेकिन मंत्री के नाते कार्यवाही का हिस्सा बनेंगे। संम्भवत: ऐसा पहली बार हो रहा है।

विधानसभा के बजट सत्र में अपनी छाप छोडऩे के मकसद से वसुंधरा राजे ने बीकानेर से सीधे दिल्ली कूच कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर करीब एक दर्जन मंत्रियों से मुलाकात कर विभिन्न क्षेत्रों में राज्य के लिए अधिकाधिक सहायता दिलाने संबंधी चर्चा की है। यह आशा की जानी चाहिये कि केन्द्र से मिले आश्वासनों तथा आम बजट के आधार पर मुख्यमंत्री अपने बजट भाषण में प्रदेशवासियों को नई सौगाते देंगी। इस बीच राज्य में सात नए मेडिकल कॉलेज खोलने तथा प्रत्येक के लिए केन्द्र से 189 करोड़ रूपये की सहायता मिलने की बात तय हो गई है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने कॉलेजों के लिए जमीन आवंटन सहित दो साल में कॉलेज भवन एवं अस्पताल का निर्माण कार्य पूरा करने के लिए अलग-अलग टास्क फोर्स गठित करने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी है।

पार्टी विधायक, पदाधिकारी तथा वरिष्ठ नेता एवं कार्यकर्ता भी बोर्डों, निगमों में नियुक्ति तथा लालबत्ती पाने की लाईन में हैं। कुछ वरिष्ठ नेताओं के नाम राज्यपालों की नियुक्ति को लेकर भी चर्चा में हैं। लेकिन अब लगता यही है कि बजट सत्र में विधायकों की परफॉर्मेंस के मद्देनजर मंत्रिमंडल का विस्तार तथा नियुक्तियों का सिलसिला शुरू हो पाएगा। यह भी कयास है कि बजट सत्र से पहले मंत्रिमंडल का छोटा विस्तार कर लिया जाए। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि वसुंधरा राजे की कार्यशैली से कुछ भी संभव है।

चुनावों की श्रृंखला में नवम्बर माह से पहले जयपुर नगर निगम सहित स्थानीय निकायों तथा पंचायतराज संस्थाओं के चुनाव भी सरकार एवं पार्टी की लोकप्रियता के लिए अग्निपरीक्षा होंगे। इसके लिए पार्टीजनों को विश्वास में लेकर सत्ता संगठन में भागीदार बनाना भी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने बीकानेर संभाग तथा दिल्ली के दौरे से लौटते ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक एवं परनामी से संगठन के बारे में लम्बी चर्चा की है। परनामी ने जुलाई माह में ही जिलाध्यक्षों की निुयक्ति तथा प्रदेश कार्यकारिणी के गठन की बात कही है। अन्यथा बजट सत्र के बाद यह कार्य होगा। सुराज संकल्प यात्रा से लेकर विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नये चेहरों को विभिन्न स्तरों पर पार्टी संगठन से जोडऩे की कवायद की जा रही है। चुनाव की अपेक्षा जिलाध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर पार्टी में गुटबाजी भी उभरने लगी है। राजधानी जयपुर में पिछली बार शहर अध्यक्ष के चुनाव को लेकर विधायकों तथा पदाधिकारियों की गुटबाजी खुले में आ गई और यह दरार अभी तक कायम है। सूचना के अनुसार करीब एक दर्जन कार्यकर्ता शहर अध्यक्ष बनने के दावेदार हैं और अपने पक्ष में लॉबिंग में जुट गये हैं। एक पक्ष अभी भी चुनाव के आधार पर जिलाध्यक्ष बनाने का समर्थक है। कमोबेश हर जिले में यही हालात हैं। अब देखना है कि भाजपा और कांग्रेस दलीय संगठन के पुनर्गठन की कवायद को किस सलीके से अंजाम देते हुए भावी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने की तैयारी करती हैं।

गुलाब बत्रा

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