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धधकता पश्चिम एशिया!

यह कहना बहुत ही मुश्किल है की भविष्य में मध्य पूर्व की सामरिक स्तिथि क्या होगी लेकिन आई एस आई एल ने खुल कर कह दिया है की उसका इरादा पुराने खलीफा व्यवस्था की तरह सीरिया और इराक को मिला कर एक इस्लामिक अमीरात बनाने का है।

एशियाई वाल स्ट्रीट जर्नल के पूर्व और न्यूजवीक के संवाददाता जॉन बेरथेलसेन ने हाल ही में एक हास्यास्पद कहानी सुनाई जो कि पश्चिम एशिया के संकट के मूल कारणों की एक व्याख्या हो सकती है। एशिया सेंटिनल के लिए लिखते हुए बेरथेलसेन ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के अज्ञानता का खुलासा किया, जिसकी वजह से एक तहस-नहस इराक के राख पर इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा मिला। जहां उनके पिता जॉर्ज बुश (सीनियर) ने अपनी कुवैत की विजेता सेना को बगदाद को लूटने और बर्बाद करने से रोका था, वही उनके बेटे इतने दुरंदेश नहीं थे। सीनियर बुश समझ गए थे कि सद्दाम हुसैन को गिराने से बहुत सारे कबायली सरदार अपनी आजादी का सुर लगाते खड़े हो जाएंगे, लेकिन उनके पुत्र, बेरथेलसेन के अनुसार, को ये भी पता नहीं था कि मुसलमानों की दो जातियां होती हैं – शिया और सुन्नी। सद्दाम हुसैन पर हमला करने से पहले जब उन्हें अरब के राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने के बारे में बताया जा रहा था तो जूनियर बुश कहते हैं – मैंने तो सोचा था कि वो (इराकी) मुसलमान होते हैं।

सद्दाम हुसैन अपने कब्र में अमेरिका की इस गलती पर काफी खुश हो रहे होंगे। शायद खुद को शाबाशी भी दे रहे होंगे कि कैसे उन्होंने अपनी क्रूरता से इराक के सभी कबायलियों को एकजुट कर रखा था। पश्चिम एशियामें होने वाली सभी घटनाओं पर सद्दाम हुसैन की छाया से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि अगर वो रहते तो इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एवं लेवांत (आईएसआईएल) का ऐसा दुर्दांत आगाज नहीं हो सकता था। सद्दाम हुसैन के साथ जैसा खराब व्यवहार अमेरिका द्वारा किया गया था उसने आईएसआईएल के संस्थापक अबु बकर अल बगदादी को इतना क्रोधोन्मत्त कर दिया था कि उसे अल-कायदा का जवाब भी बचकाना लगा और उसे छोडऩा भी जरुरी लगने लगा।

बगदादी 43 साल का है और 2003 में इराक में वह एक जिहादी संगठन में अमेरिकी हमले के बाद सम्मिलित हुआ था। 2010 तक आते-आते वह के नेता के रूप में उभरा और अयमान अल जवाहिरी के अल-कायदा के काफी कैडर को अपनी तरफ आकर्षित करने लगा। कारण साफ था: बगदादी एक फील्ड-कमांडर होने के साथ-साथ कुशल रणनीतिज्ञ भी है, वही जवाहिरी एक मामूली मौलवी है। उसकी इसी विशेषता ने अल-कायदा में उसका कद बढ़ाने में मदद की। सीरिया में लडऩे वाले 80 प्रतिशत मुस्लिम लड़ाके जो इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और बाकि यूरोपियन देशों से आए हैं, बगदादी के नेतृत्व में आईएसआईएल में सम्मिलित हो चुके हैं।

यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि भविष्य में पश्चिम एशिया की सामरिक स्तिथि क्या होगी, लेकिन आईएसआईएल ने खुल कर कह दिया है कि उसका इरादा पुरानी खलीफा व्यवस्था की तरह सीरिया और इराक को मिलाकर एक इस्लामिक अमीरात बनाने का है। इसके लिए उन्होंने 1916 में सर मार्क साइक्स और फ्रांकोइस जॉर्ज पिकॉट द्वारा बनाई गई सीमाओं को गिराने की योजना बना रखी है। आईएसआईएल की स्थिति अभी तो नाजुक है पर उत्तर और मध्य इराक की सुन्नी जनसंख्या और इराकी सेना के बाथ पार्टी समर्थकों के समर्थन ने उसे इराक में एक मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया है।

आईएसआईएल के लिए शिया बहुल दक्षिणी इराक जिसे ईरान का भी समर्थन हासिल है, पर कब्जा करना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन उत्तर और पूर्वी इराक पर उनका कब्जा और महत्वपूर्ण शहरों जैसे सीरिया में रक्का और इराक के फल्लुजाह, रमादी और अंतत: मोसुल का उनकी झोली में गिरने से यह तो साफ हो गया है कि पश्चिम एशिया की राजनीति में बदलाव अवश्यंभावी है। अब जब कि इराक में कोई केंद्रीय सत्ता बची नहीं है, तुर्की ने स्वायत्तशासी कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार के साथ अपना तालमेल बैठा लिया है और अपने बंदरगाह के माध्यम से कुर्दों के क्षेत्र में पडऩे वाले तेल के कुओं से अपने लिए तेल की व्यवस्था कर ली है। अंकारा के अपने गणित है। ऐसा नहीं है कि वह किसी कुर्दिश विजय रैली से सहमति रखता हो, लेकिन उसकी सीमाओ पर जो कुर्दिश जनसंख्या है, वहां वह कोई परेशानी नहीं चाहता इराक के शिया प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी और उस क्षेत्र की सबसे अनुशासित कुर्दिश मिलिशिया पेश्मर्गा पर उत्तरी इराक की सुरक्षा के लिए निर्भरता की वजह से काफी असहाय है। अल-मलिकी ने अपने निरकुंश व्यवहार की वजह से कई सहयोगियों का साथ खोया जिनमें वो सुन्नी मिलिशिया प्रमुख भी थे जो आईएसआईएल की क्रूरता की वजह से उसका साथ नहीं देना चाहते थे। इसकी वजह से मलिकी कुर्दिश आजादी के सपने को बढऩे से रोक पाने में असमर्थ हैं। अभी के लिए तो स्वायत कुर्दिश क्षेत्र के शासकों के लिए तो किरकुक पर कब्जा ही काफी है, क्योंकि यह शहर तेल का भंडार है।

आईएसआईएल के इराक में सफलता के सीरिया के लिए बहुत मायने हैं। सीरिया की बसर अल-असद सरकार शिया मिलिशिया पर काफी हद तक निर्भर है। अब ऐसी सूचना है कि इनमें से बहुत सारी सेना इराक की तरफ निकल कूच कर चुकी है, ताकि कर्बला, नजफ और समारा जैसे पवित्र शहरों की सुरक्षा की जा सके। हिजबुल्लाह का सीरिया में अपनी सेना को घटाने का ऐसा कोई इरादा तो नहीं दिखता, लेकिन यह तो है कि उनका ध्यान तो बंटेगा ही। कुछ विशेषज्ञों का ऐसा भी मानना है कि आईएसआईएल की इराक में सफलता सीरिया के बसर अल-असद के लिए वरदान साबित होगी, क्योंकि आईएसआई -एल सीरिया में अपनी पैठ अन्य विरोधी ताकतों की कीमत पर ही बना सकती है। अब आईएसआईएल की बढ़ती ताकत उसे अन्य विरोधी समूहों से मुकाबले को मजबूर करेगी। यह उन क्षेत्रों में पहले ही हो चुका है, जहां सरकार की मामूली दखल थी।

अब जबकि इराक में यह देखा जा चूका है कि आईएसआईएल दुश्मनों के हथियारों पर कब्जा कर लेती है, अमेरिका और बाकि पश्चिमी देश सीरिया में बागियों को हथियार देने में कतरा रही है। पिछले एक साल से आईएसआईएल और बागी दलों के बीच चले आ रहे खुनी संघर्ष में न जाने कितनी मौतें हुईं हैं। ऐसा माना जा रहा है कि यह सब अल-कायदा के अयमान अल-जवाहिरी और आईएसआईएल के अबु बकर अल-बगदादी के बीच के अहम के टकराव का नतीजा है। शुरुआती दौर में बगदादी अपने संगठन को अल-कायदा के सीरीआई चेहरे जबात अल-नुसरा को साथ मिलाना चाहता था, लेकिन जवाहिरी ने आईएसआईएल को इराक पर ध्यान देने को कहा और सीरिया को अल-नुसरा पर ही छोड़ देने को कहा। बगदादी ने इंकार कर दिया और वहां जातीय संघर्ष शुरू हो गए।

आईएसआईएल के सिर्फ 1200 लड़ाकों के द्वारा मोसुल पर कब्जा कर लेना, यह साफ दिखाता है कि आईएसआईएल को सऊदी अरब और कुवैत समर्थित उत्तर और मध्य इराक के सुन्नी कबीलों का समर्थन प्राप्त है। अब उस क्षेत्र में नेतृत्व के लिए रियाध और तेहरान के बीच संघर्ष है। अमेरिका की बाकि खाड़ी देशों के साथ-साथ ईरान के साथ बढ़ती नजदीकियां भी सऊदी अरब के लिए चिंता के विषय हैं, लेकिन इस सम्बन्ध में वह कुछ खास नहीं कर सकता। जैसे ही नूरी अल मलिकी गठबंधन ने बगदाद पर अपना दावा किया, वैसे ही ईरान ने खुले दिल से इसका स्वागत किया था।

अब तक तो ईरान और अमेरिका के बीच इराक मुद्दे पर कोई सीधी बात नहीं हुई है, पर भविष्य में ऐसी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ईरान निश्चय ही इस मुद्दे पर लाभप्रद स्तिथि में है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा अपने ही देश में मुसीबतों में घिरे हैं और अल-मलिकी से मोल-भाव करने की स्तिथि में नहीं हैं। तेहरान ने उत्तरी इराक खासकर तुर्की से लगती सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। अब जबकि इराक और सीरिया के बीच सीमा न के बराबर है, ईरान समर्थित शिया आतंकवादी अपने योजना के हिसाब से दोनों देशों में घटना को अंजाम दे वापस आ जाते हैं। यहां पर असेबहल अल- हक और मुक्तदल-सदर की शांति सेना का जिक्र करना जरुरी है। इसके अलावा इराक के सबसे बड़े धर्मगुरु अयातुल्ला अली सिस्तानी ने भी आईएसआईएल के खिलाफ फतवा जारी किया है।

क्या इस्लामी कट्टरपंथी पश्चिम एशिया में एक नया मानचित्र बना पाएंगे? इस वक्त तो ऐसा कहना मुमकिन नहीं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की अपनी पूरी सेना को इराक से हटाने के जल्दबाजी में किए निर्णय ने ऐसी संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। ऐसी आशंका भी जताई जा रही है कि आईएसआईएल का अगला निशाना जॉर्डन है और इसके बचाव के लिए हाशिम साम्राज्य ने सीरिया के साथ लगी सीमा पर फौजों का भारी जमावड़ा कर लिया है।

जहां तक पश्चिम एशिया की राजनीति का सवाल है, ईरान एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के तौर पर उभरा है। लेकिन सऊदी अरब भी परदे के पीछे से खेल रहा है। सिर्फ आईएसआईएल ही इराक में अकेला खिलाड़ी नहीं है, नक्शबंदिया वय, जैश अल-मुजाहिदीन, जैश अंसार अल सुन्नाह जैसे दूसरे सुन्नी संगठन भी हैं, जिन्होंने अपने संसाधन भी इकट्ठे कर रखे है। यह सभी संगठन मजलिस थूवर अल अनवर, जो कि सऊदी खुफिया विभाग से नियंत्रित है, के जरिए आईएसआईएल से संपर्क बनाये हुए हैं।

अमिताव मुखर्जी

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