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भारत के लिए खतरनाक इराकी इस्लामिक आन्दोलन

रुस का मुकाबला करने के लिये अमेरिका को जिहादी और गाजी चाहिए था, जो इस्लाम के नाम पर मारने के लिये भी तैयार रहे और मरने के लिये भी। इसलिए अमेरिका ने अफगानिस्तान पर रुस के हमले को इस्लाम पर हमले का नाम दे दिया और इसका मुकाबला करने के लिये मुसलमानों को जिहाद के लिये तैयार करना शुरु कर दिया। इस नये प्रयोग की प्रयोगस्थली अफगानिस्तान के पड़ोसी पाकिस्तान को बनाया गया।

इराक में गृहयुद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा, ऐसी चिन्ता बहुत से शान्ति प्रेमियों को सता रही है। बहुत से विद्वान इसे इस्लाम के ही भीतर के विभिन्न सम्प्रदायों के बीच की लड़ाई बता कर दुख प्रकट कर रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सारा दोष अमेरिका का है। यदि वह सद्दाम हुसैन को न मारता तो इराक में यह गृहयुद्ध न छिड़ता और न ही यह नरसंहार हो रहा होता। यह ठीक है कि इस्लाम का यह नया आन्दोलन कुछ सीमा तक उन कारणों से भी शुरु हुआ, जिसके पीछे अमेरिका के कुछ निर्णय भी जिम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन वर्तमान में इराक में जो इस्लामी आन्दोलन चल रहा है, उसके पीछे इस्लाम की प्रकृति और स्वभाव को समझ लेना भी जरुरी है। इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्मद का देहान्त हो जाने के बाद अरब कबीलों ने, जो इस्लाम के अनुयायी हो गये थे, जल्दी ही दुनिया को इस नये मत में दीक्षित करने के लिये सैनिक अभियान शुरु कर दिया था। वैसे तो विभिन्न कबीलों में भी हजरत मोहम्मद का उत्तराधिकारी कौन हो इसको लेकर जंग शुरु हो गई थी। यह जंग केवल आध्यात्मिक विरासत की जंग नहीं थी। यदि मामला केवल आध्यात्मिक मामलों का ही होता तो शायद जंग का स्वरुप कुछ और होता। यह मामला राजनैतिक सत्ता का भी था, क्योंकि हजरत मोहम्मद अपने जीवनकाल में पैगम्बर व आध्यात्मिक मार्गदर्शक होने के साथ-साथ सम्राट भी थे। यह राजनैतिक पद खलीफा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस विवाद में 632 में अबू बकर पहले खलीफा बने और 634 में उमर दूसरे। लेकिन जब मामला हजरत मोहम्मद के दामाद अली तक पहुंचा तो उनका नम्बर चौथा था। 661 में अली के बाद उनके पुत्र हसन की बारी थी। हसन ने गद्दीनशीन होने के बाद खलीफा का पद मुवैया के पक्ष में त्याग दिया। लेकिन नये मुसलमान बने अरब कबीलों ने इस मसले का एक बारगी निबटारा कर देना उचित समझा।

उधर जब अरब कबीले सत्ता के उत्तराधिकार को लेकर लड़ रहे थे, उस समय इस्लाम के नए जोश से प्रभावित होकर अरब कबीले पड़ोसी देशों पर हमले ही नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्हें जीत कर बलपूर्वक मतान्तरण के लिये विवश भी कर रहे थे। पड़ोस का इरान उनका पहला और आसान शिकार बना। वह पराजित भी हुआ और मतान्तरित भी। जिन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से इन्कार कर दिया वे भाग कर हिन्दुस्तान में आ गये। भारत भी इस आक्रामक रवैये की आंच सिन्ध की ओर से अनुभव कर रहा था, जिस पर मोहम्मद बिन कासिम ने हमला किया था।

उधर हजरत मोहम्मद के उत्तराधिकार की लड़ाई अपनी चरम सीमा तक पहुंच चुकी थी। अरब के मुसलमानों ने हजरत मोहम्मद के दोहित्र हुसैन को कर्बला के मैदान में समस्त परिवार सहित 10 अक्तूबर 680 को मार दिया। सत्ता के लालच में किये जा रहे इस अमानवीय कार्य का विरोध भारत ने भी किया। मोहियाल ब्राह्मणों ने हिम्मत के साथ हुसैन को अन्यायपूर्ण तरीके से मार रही मुसलमान सेनाओं से लोहा लिया और उसमें अनेक भारतीय शहीद भी हुए। इरान ने भी अरब के मुसलमानों के हाथों हुई करारी हार और उसके बाद मतान्तरण के कारण हुये अपमान का बदला लेने का सुनहरी अवसर समझा। इरानी सैन्यबल में तो अरब के मुसलमानों से पराजित हो गये थे, लेकिन अरबों के सांस्कृतिक आक्रमण को पराजित करने का उन्हें सुनहरी अवसर मिल गया था। इरानी लोग मुसलमानों के विरोध में हुसैन की परम्परा के पक्ष में खड़े हो गये और शिया कहलाने लगे। यह मतान्तरण से अपमान भोग रहे इरान का इस्लाम के प्रति विद्रोह था और अरब के मुसलमानों के हाथों हुई अपमानजनक पराजय का एक प्रकार से परोक्ष बदला था। शिया समाज मुसलमानों के हाथों हुसैन की अमानुषिक हत्या की स्मृति में हर साल ताजिया निकालता था। पर मुसलमानों की दृष्टि में यह मूर्ति पूजा थी, जिसे तुरन्त बंद किया जाना चाहिए, लेकिन शिया समाज भला यह मूर्ति पूजा बन्द क्यों करता? बाद के इतिहास में अनेक परिवर्तन हुए। मुसलमानों ने अपने आसपास के देशों को ही नहीं, बल्कि यूरोप तक में धावे मार कर उनको जीता और मतान्तरित किया। तुर्क, अफगान और मध्य एशिया के लगभग सभी कबीले इसके शिकार हुए, लेकिन इस बीच खलीफा का पद भी अनेक स्थानों से गुजरता हुआ अन्त में तुर्की के पास आ गया। अरबों के पास बचा केवल मक्का। इसाईयों और मुसलमानों के बीच हुए भयंकर युद्धों में ही मुसलमानों ने विशाल आटोमन साम्राज्य खड़ा कर लिया। इरान और वर्तमान में इराक के नाम से जाना जाने वाला शिया समाज मुसलमानों का मुकाबला नहीं कर सका और एक प्रकार से अप्रासंगिक हो गया। परन्तु प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों ने पूरी स्थिति ही बदल दी। विशाल आटोमन साम्राज्य छिन्न-भिन्न ही नहीं हुआ, बल्कि खलीफा का मुकुट धारण करने वाले तुर्की में ही लोगों ने बगावत कर दी और वहां के महान स्वतंत्रता सेनानी कमाल पाशा अता तुर्क के नेतृत्व में सत्ता पलट दी। कमाल पाशा ने खलीफा के पद को तो समाप्त किया ही, अरबों के अधिनायकत्व से त्रस्त तुर्की के लोगों ने तुर्की भाषा को रोमन लिपि में लिखना स्वीकार कर अरबी लिपि को तुरन्त अलविदा कह दिया। आटोमन साम्राज्य के समाप्त हो जाने के बाद मुसलमानों की ताकत क्षीण हो गई। यूरोपीय ताकतों का दबदबा बढ़ा। लेकिन भारत पर हुये तुर्कों, मुगलों, अफगानों के हमलों के कारण हुए मतान्तरण का कुछ दंश तो भारत को भी झेलना ही पड़ा। इस्लाम के नाम पर देश का एक भूभाग पाकिस्तान के नाम से अलग हो गया और दूसरा बंग्लादेश के नाम से अलग हुआ।

लेकिन अफगानिस्तान पर हुए रुस के हमले के बाद इस्लामी इतिहास का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। रुस का मुकाबला करने के लिए अमेरिका को जिहादी और गाजी इस्लाम चाहिए था जो इस्लाम के नाम पर मारने के लिये भी तैयार रहे और मरने के लिये भी। इसलिए अमेरिका ने अफगानिस्तान पर रुस के हमले को इस्लाम पर हमले का नाम दे दिया और इसका मुकाबला करने के लिए मुसलमानों को जिहाद के लिए तैयार करना शुरु कर दिया। इस नए प्रयोग की प्रयोगस्थली अफगानिस्तान के पड़ोसी पाकिस्तान को बनाया गया। पाकिस्तान इसके लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गया, क्योंकि उसे लगता था कि इस्लाम की यही जिहादी सेना बाद में जम्मू-कश्मीर में भी प्रयोग की जा सकती थी। अपने इस प्रयोग में अमेरिका को इतनी सफलता तो मिली कि उसकी जिहादी सेना ने अफगानिस्तान में रुसी सेना को नाकों चने चबा दिये। लेकिन रुस के पतन के बाद जब रूसी सेना ने अफगानिस्तान से चले जाने का निर्णय कर लिया तो वहां लोकतांत्रिक या राजशाही की प्रतिष्ठा के स्थान पर जिहादी सेना तालिबान का कब्जा हो गया और इस नई इस्लामी आक्रामकता ने अमेरिका को भी अपना शिकार बना लिया। जैसा कि खतरा था भारत में जम्मू-कश्मीर भी किसी सीमा तक इस आक्रामकता की चपेट में आ गया।

इस हालत में अमेरिका ने कुछ यूरोपीय देशों को साथ लेकर इस्लाम के इस जिहाद को रोकने का निर्णय किया। लेकिन सदा की भांति इस निर्णय को क्रियान्वित करते समय उसने लगे हाथों अपने व्यवसायिक हितों का संवर्धन करने का प्रयास भी किया। अमेरिका अपनी ऐतिहासिक परम्परा के अनुकूल ही एक तीर से दो शिकार करना चाहता था। उसने अफगानिस्तान पर तो अपनी सेना भेजी ही लेकिन कुछ अरसे बाद सद्दाम हुसैन को मारने के बहाने उसने इराक में भी अपनी सेनाएं भेज दीं। इतना ही नहीं पश्चिमी एशिया के कुछ देशों में स्थापित सरकारों को उखाड़ कर नई सरकार बनाने के जन आन्दोलनों को भी हवा देना शुरु कर दिया। जबकि स्पष्ट ही दिखाई दे रहा था कि इन देशों में स्थापित सरकारों को उखाडऩे का आन्दोलन चलाने वाली ताकतें दरअसल कट्टर इस्लामी ताकतें हैं।

इस पूरी पृष्ठभूमि में मुसलमानों के मन में एक बार फिर विश्व में इस्लामी राज्य स्थापित करने का सपना पैदा हुआ, ताकि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद समाप्त हो चुके खलीफा और खिलाफत को फिर जिंदा किया जा सके। वैसे तो इसका अंकुर ओसामा बिन लादेन के वक्त ही पैदा हो चुका था। इसकी मार में यूरोपीय देश तो आयेंगे ही, खासकर वे देश जो कभी आटोमन साम्राज्य का हिस्सा रह चुके हैं, लेकिन सबसे ज्यादा खतरा उन देशों को हो सकता है, जिन पर कभी विदेशी इस्लामी सेनाओं ने कब्जा भी कर लिया था, उन देशों को इस्लाम में मतान्तरित करने के प्रयास भी किए, लेकिन उन्हें आधी-अधूरी सफलता ही हासिल हुई। इस लिहाज से इन नई जिहादी इस्लामी ताकतों से खतरा भारत को ही है । वैसे केवल रिकार्ड के लिये अबू बकर अल बगदादी ने जो नई घोषणा की है, जिसे इराक की आधिकारिक सरकार ने नकारा है, उसमें अगला निशाना भारत को ही बताया गया है।

जिस प्रकार ओसामा बिन लादेन ने अफगानिस्तान को केन्द्र मानकर, जिहाद के माध्यम से विश्व इस्लामी राज्य की कल्पना की थी उसी प्रकार अब पश्चिम एशिया में एक ऐसे देश की कल्पना की जा रही है जिसे आधार बना कर विश्व भर में इस्लाम का जिहादी आन्दोलन छेड़ा जा सके और नये कब्जाए क्षेत्र को इस्लाम का वेटिकन बनाया जा सके। इराक में आई.एस.आई.एस. यानि इस्लामी स्टेट आफ इराक एंड सीरिया की स्थापना के प्रयास इस्लाम की जिहादी सेनाओं की इसी व्यापक योजना का हिस्सा है। इन जिहादी मुसलमानों ने इराक के काफी हिस्से पर कब्जा कर लिया है। ऐसे समाचार भी मिल रहे हैं कि इन्होंने इराक सरकार के रासायनिक हथियारों के भंडारों पर भी कब्जा कर लिया है। सद्दाम हुसैन की हत्या कर अमेरिका ने उस क्षेत्र में जो अस्थिरता पैदा की थी उस के दुष्परिणाम अब आने शुरु हुए हैं।

3 जनवरी को इस जिहादी सेना ने इस्लामी राज्य के नाम से नये राज्य की घोषणा कर दी, जिसकी राजधानी मोसुल को बनाया गया और   29 जून 2014 को अबू बकर अल बगदादी ने अपने आप को इस्लामी राज्य का खलीफा घोषित कर दिया। नये खलीफा इराक के अतिरिक्त सीरिया को भी इस नये राज्य में शामिल करना चाहते हैं। इस नये इस्लामी राज्य के मुसलमान शायद इतिहास को उसी मरहले से दोबारा उठाना चाहते हैं जहां हुसैन को 10 अक्तूबर 680 को परिवार समेत मार कर कर्बला के मैदान में छोड़ा था। यही कारण है कि इस नए इस्लामी राज्य के नए तथाकथित खलीफा द्वारा अमानुषिक तरीके से शिया समाज का कत्ल किया जा रहा है। इतना ही नहीं नए खलीफा के बन जाने के जोश में मुसलमानों ने जम्मू-कश्मीर में भी शिया समाज पर हमले तेज कर दिए हैं। पाकिस्तान में तो मुसलमानों द्वारा एक प्रकार से शिया समाज का सफाया ही किया जा रहा है। बगदादी का नया इस्लामी राज्य कब्जाए गए क्षेत्र से शिया समाज का तो सफाया कर ही रहा है उसके साथ ही उनके सभी तीर्थस्थानों को भी मटियामेट कर रहा है। इतना ही नहीं वह इस्लाम के आने से पूर्व के इतिहास को उसी प्रकार मटियामेट कर रहा है जिस प्रकार कभी अफगानिस्तान में तालिबान ने बामियान में भगवान बुद्ध की मूर्तियों को नष्ट करके किया था।

अनेक मुसलमान देशों में बगदादी की तर्ज पर ही इस्लामी आतंकवादी समूह अलग-अलग नामों से संगठित हो रहे हैं जो बहाबी बहाव में बहकर विश्व को दारुल इस्लाम बनाने के सपने को सार्थक करने के लिए क्रियाशील भी हो गए हैं। भारत में भी इसके प्रमाण मिल रहे हैं। अब बगदादी इन सभी में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा ही। उधर पश्चिमी एशिया में शिया समाज के बाद कुर्द कबीले के लोग मुसलमानों के क्रोध का शिकार हो सकते हैं, क्योंकि इस कबीले के लोगों ने इस्लाम को स्वीकार कर लेने के बाद भी कुछ सीमा तक अपनी इस्लाम पूर्व कबीला संस्कृति को छोड़ा नहीं है। भारत को अभी से मुसलमानों के देशों में हो रहे इन नए परिवर्तनों को देखते हुए सचेत होना चाहिए और इस नए आक्रमण का मुकाबला करने की रणनीति बनानी चाहिए। सबसे बड़ी चिन्ता की बात तो यह है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान इन नए इस्लामी आक्रामक सपनों को पंख लगाने की कोशिश कर रहा है और इसका लाभ उठा कर कश्मीर घाटी में जिहादियों को भेज रहा है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के चले जाने के बाद भारत पर यह खतरा और बढ़ेगा। पाकिस्तान यह भूल रहा है कि यदि खिलाफत को पुनस्र्थापित करने के लिए मुसलमानों की ताकतें इकट्ठा होती हैं तो वे उसे इस आन्दोलन का कभी भी हरावल दस्ता नहीं बनने देंगी क्योंकि उनकी नजर में पाकिस्तान के लोग हिन्दुओं की विरासत का ही हिस्सा हैं जो अभी तक अपने पूर्वजों की विरासत और इतिहास को छोडऩे की छटपटाहट में घिरा हुआ है। अरबों, तुर्कों इत्यादि का हिस्सा बनने की उतावलेपन में वह चाहे जितने मर्जी रसूल निन्दा के विरोध में कानून बना ले और उसका उल्लंघन करने वालों को गोलियों से उड़ा दें, शिया समाज को चुन-चुन कर मार मिटा दे, लेकिन उनकी नजर में वह दोयम दर्जे का पिछलग्गू ही रहेगा, नेता नहीं।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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