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महंगाई: औरों को नसीहत, खुद मियां फजीहत

महंगाई की मार तो सब को पिछले एक दशक से सहनी पड़ ही रही थी। पर अन्तर केवल इतना था कि तब विपक्ष मुखर था और तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस के मुंह पर ताला लगा था। वह इस समस्या के हल के लिए न कुछ कर रही थी और न कुछ करना चाहती थी। पर सत्ता लुट जाने के उपरान्त चालू बजट सत्र के पहले ही दिन कांग्रेस ने एक तिलस्म खड़ा करने की कोशिश की कि मानो उसके दस वर्ष के कार्यकाल में कभी कीमतें बढ़ी ही नहीं थीं। उसने पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, रेल भाड़ा आदि कभी बढ़ाया ही नहीं और भाजपा नीत राजग की मोदी सरकार ने तो इस बारे में सुनामी ही ला दी। हैरानी की बात तो यह है कि दशकों शासन में रहने वाली कांग्रेस इतनी अनभिज्ञ है कि अभी तक किसी ऐसे बटन का आविष्कार नहीं हुआ है कि जिसके दबा देने मात्र से ही महंगाई उसी क्षण छूमन्तर हो जाएगी। वह महंगाई जो बढ़ी है या बढ़ रही है तो वह मोदी सरकार के केवल पांच सप्ताह के कार्यकाल के कारण नहीं, अपितु कांग्रेस सरकार ही की अकर्मण्यता व निर्णय पक्षाघात के कमाल से।

संसद के दोनों सदनों में पहले ही दिन पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार ही कांग्रेस ने संसद न चलने देने की रणनीति बना ली लगती थी। महंगाई तो कांग्रेस कार्यकाल सदा दिन दुगनी रात चौगुनी छलांग लगाती जा रही थी पर उसने अपने कार्यकाल में इस ज्वलन्त प्रश्न पर संसद में कभी स्थगन प्रस्ताव न स्वीकारा ही और न प्रश्नकाल ही स्थगित होने दिया। मोदी सरकार ने तो शुरू में ही स्पष्ट कर दिया कि वह हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। राज्य सभा में तो चर्चा शुरू भी हो गई पर लोकसभा में भी अध्यक्ष ने प्रश्नकाल के बाद तुरन्त चर्चा का प्रस्ताव मान लिया। पर कांग्रेस ने अड़ंगा लगा दिया कि चर्चा नियम 193 के अधीन हो। उसके बाद चर्चा के लिए अध्यक्ष ने ढ़ाई घंटे का समय भी निर्धारित कर दिया। पर लोकसभा फिर भी न चलने दी गई और सारे दिन के लिए स्थगित हो गई।

महंगाई कांग्रेस के लिए कितना महत्वपूर्ण मुद्दा है यह तो इस बात से ही पता चल गया कि असल मुद्दे की अनदेखी करते हुए श्रीमती सोनिया गांधी नेता विपक्ष की कुर्सी पाने की बात उठाना न भूलीं।

16 मई को जब चुनाव परिणाम आए तो श्रीमती गांधी ने जनता के फतवे को नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया था। पर वह अब भूल गईं कि जिस जनता ने भाजपा व राजग को इतने बहुमत से सत्तासीन किया है उसी ने तो कांग्रेस को मात्र 44 सीटों पर ही विजय देकर नेता विपक्ष का पद प्राप्त करने से भी वंचित कर दिया था। कांग्रेस को तो जनादेश का पालन करना ही होगा।

संसद में हंगामें से कांग्रेस के आदर्शों का भी जनाजा निकल गया। यह वही कांग्रेस व उसकी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी व उसके प्रधानमंत्री ही थे जो जब सत्ता में थे तो विपक्ष को सकारात्मक व उत्तरदायी रोल निभाने का सबक पढ़ाते थे पर सत्ता खोने के मात्र पांच सप्ताह में ही अपने सभी महान् आदर्शों व उपदेशों को भूल गए और स्वयं वही कुछ करने लगे जिसे वह विपक्ष द्वारा किया गया जनता के साथ पाप व विश्वासघात बताते थे।

पिछले वर्ष संसद में हंगामें पर तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि ऐसी घटनाओं से ‘उनका दिल लहू-लुहान हो जाता है।’ यह अलग बात है कि उसी दिन तेलंगाना के मुद्दे पर उनकी ही कांग्रेस के सदस्यों ने लोकसभा में हंगामा कर दिया था। तब श्रीमती सोनिया गांधी विपक्ष को विघटनकारी व गैर-जिम्मेदाराना आचरण का आरोप लगाती फिरती थीं।

यही नहीं, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जो अभी-अभी विदेश में दो-तीन सप्ताह की छुट्टियां मना कर लौटे हैं और जिन्होंने पिछले दशक में महंगाई पर ‘एक चुप्प और सौ सुख’ का सहारा लिया उन्हें भी बढ़ती हुई कीमतों का सेंक महसूस हुआ और वह भी इस शोरगुल में शरीक हो गए।

वित्त मंत्री अरूण जेटली ने अपने जोरदार उत्तर में कहा कि अभी तो राजग सरकार को बने केवल 41 दिन हुए हैं। उसने तो अभी अपनी आर्थिक नीति की भी घोषणा नहीं की है, फिर भी उसे महंगाई के लिए उत्तरदायी बनाना गलत है। उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति कांग्रेस नीत संप्रग सरकार की गलत नीतियों का ही परिणाम है।

अम्बा चरण वशिष्ठ

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