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शर्म करो स्मृति ईरानी के मंत्री पद पर शंका करने वालो!

सभी संशय करने वालों को, मंत्री जी को ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ द्वारा प्रायोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला उद्यमी : सामंजस्य और प्रवीणता का विकासक्रम’ पर आयोजित गोष्ठी में बोलते हुए सुनना चाहिए था। गोष्ठी की विषय-वस्तु थी अस्मिता की खोज करते देश को चाहिए कल्पना, योजना और तर्क। स्मृति ईरानी से गोष्ठी के आरम्भ होने से पहले ही किसी महिला ने कहा था कि औरतों के लिए सबसे मुश्किल काम बोलना और अपनी आवाज उठाना है। अन्य महिलाओं ने भी अपने विचार उनके सामने रखे। कुछ और महिलाएं जिन्होंने महिला सशक्तिकरण के लिए काफी काम किये थे, ने भी ईरानी के सामने अपने पक्ष रखे। इसके बाद उन्होंने सभा को सम्बोधित किया। उनका बोलना उनके आत्मविश्वास को प्रतिम्बिम्बित कर रहा था। वो बिना किसी तैयारी के बोलीं और सीधे उठाये गए मुद्दों पर ही ध्यान केंद्रित रखा। मंत्री जी के एक घंटे से भी कम के भाषण में उनकी अंग्रेजी पर पकड़, सामान्य ज्ञान की गहराई और वाक्पटुता की झलक दिख गई। कितने शोधार्थी इस विश्वास के साथ बोल सकते हैं, लेकिन शंकालु फिर भी उनका मजाक उडाऩे से बाज नहीं आएंगे। उन्होंने अपनी निंदा करने वालों को बिना किसी का मजाक उड़ाए जवाब दे दिया। ‘लेडीज एंड सेलेक्ट जेंटलमैन’ से उन्होंने शुरुआत की। उनकी अगली लाइन शोरगुल में खो कर रह गयी। उन्होंने कहा ‘महिलाओं को बोलने में समस्या नहीं है, उनकी समस्या उन्हें सुने जाने की है’ और लोगों ने इसका काफी स्वागत किया। उनके भाषण की सबसे उल्लेखनीय बात रामायण में कही भारतीय संस्कृति और उसके मूल्यों पर जोर देना थी। अपने भाषण का अंत करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें आशा है कि अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान करने के लिए भारत की ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ वाली भावना का अनुसरण हो। उनके भाषण का देश-दुनिया से आये पढ़े-लिखे लोगों पर असर काफी दिलचस्प बात रही। देखने वाली बात तो यह है कि ये सारे पढ़े-लिखे लोग जो मानव विकास विभाग संभाल सकते हैं, वो वहां थे कि नहीं। किस में हिम्मत है जो यह कह सके कि स्मृति में मानव विकास विभाग संभालने की क्षमता नहीं है? मुझे शक है, क्योंकि उनके भाषण की शैली, तर्क और उनका सामान्य ज्ञान, इतिहास सभी ने उनकी समझ की गहराई को दिखाया और सबसे ऊपर उनकी वाक्पटुता रही, जिसने उनके दृढ़ विश्वास को दिखलाया।

आपदा प्रबंधन के लिए ‘उपयुक्त’ आदमी

पूर्व गृह सचिव और बिहार के आरा से भाजपा सांसद आर.के. सिंह को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के उपाध्यक्ष के तौर पर चयन का सभी की ओर से स्वागत किया गया है। वैसे तो उनके चयन की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन दिल्ली के सत्ता की गलियारों की अफवाहें और अटकलबाजी अधिकतर सच का रूप ले लेती हैं। एनडीएमए की पिछली टीम, जो यूपीए-2 द्वारा चुनी गयी थी, को इस्तीफा दिलवा दिया गया है। एनडीएमए की संकल्पना जब हुई थी तब सिंह संयुक्त सचिव हुआ करते थे। तो आपदा प्रबंधन के बारे में उन्हें सब शुरू से ही पता है। साथ ही सिंह जब पटना में थे तो आपदा प्रबंधन का प्रभार भी उन्हीं के पास था। कोसी में आई भयंकर बाढ़ के समय उनके द्वारा किये काम आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। एनडीएमए की बाकी टीम का चयन तो प्रधानमंत्री करेंगे, लेकिन सिंह की अनुशंषाओं का भी ध्यान रखेंगे। ‘एक सांसद किसी लाभ के पद पर नहीं रह सकता’ का नियम उनके चयन की आधिकारिक पुष्टि के आड़े आ रहा है। सूत्र बताते हैं कि लोकसभा के इस सत्र में सरकार सिंह के अनुभवों का हवाला दे नियमों में बदलाव करवा सकती है।

सुबह की गोल्फ

हम सभी उस समय आश्चर्यचकित रह गए जब यह सुनने को मिला कि भारत सरकार के सचिवों ने अपना सबसे प्यारा खेल गोल्फ खेलना बंद कर दिया है। ये नौकरशाह, जो 32-34 साल की नौकरी के बाद सचिव बनते हैं, उनका प्रिय खेल गोल्फ बन जाता है। यह खेल श्रेष्ठता का प्रतीक है। कुछ सचिव जो फाइल पढऩे से बचकर जिमखाना क्लब, गोल्फ क्लब या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वोडका और टॉनिक के घूंट के साथ दिख जाते थे, और कुछ जो कार्यावधि में ताज के हाउस ऑफ मिंग या आईटीसी के बुखारा या फिर मौर्या के दम पोख्त में जाने से बचते थे, उन्होंने भी गोल्फ से तौबा कर ली है। ये सारे त्याग इसलिए नहीं किये गए हैं कि मोदी जी ने गोल्फ खेलने पर पाबन्दी लगाई है, बल्कि इसलिए क्योंकि इन सभी को सुबह 9 बजने से पहले ऑफिस पहुंचने की जल्दी होती है। गोल्फ और शाही भोजन रहित पिछले कुछ हफ्ते इन बाबुओं के लिए निश्चय ही बहुत नागवार गुजरे होंगे। लेकिन इन सचिवों के दिमाग का भी क्या कहना। अब इन्होंने नयी तरकीब आजमाई है। सुबह पौ फटते ही ये गोल्फ के मैदान पहुंच जाते हैं और खेलना शुरू कर देते हैं। इस तरह न पीएमओ को दिक्कत होती है और न इन बाबुओं को।

भारत की ‘रीढ़’ का नव-निर्माण

अनुभवी नरेंद्र मोदी लगता है नेहरू की इस बात का मतलब समझ गए हैं कि नौकरशाही भारत की रीढ़ है। तभी तो, जैसा की सभी जानते हैं, उन्होंने सभी सचिवों के साथ सीधे मुलाकात की। हालांकि मोदी उनसे मिल के बहुत खुश तो नहीं हुए, लेकिन उन्हें विश्वास दिलाया कि वे जब हो सके तब फैसले लें और सरकार उनके फैसलों का सम्मान करेगी। एक सशक्त और अनुशासित नौकरशाही ने विकास के फैसले लेने शुरू कर दिए हैं और सभी परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई जा रही है। इसके नतीजे भी दिखने शुरू हो गए हैं। पिछले तीस दिनों में करीब 40 हजार करोड़ की सड़क परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई गयी है। इसमें 2016 से प्रतिदिन 30 किलोमीटर की सड़क बनाने की बात है और इसके लिए अगले 3 महीनों में 60 हजार करोड़ के लगभग की 250 परियोजनाएं चिन्हित की गयी हैं। नौकरशाहों ने कारवार, कर्नाटक में बनने वाले एशिया के सबसे बड़े नौसैनिक अड्डा के सीबर्ड परियोजना के 2 बिलियन डॉलर के द्वितीय चरण की भी स्वीकृति दे दी है। औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग ने स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने, साथ ही सुरक्षा क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और स्वदेशी उद्योगों द्वारा निर्मित उपकरणों की लिस्ट को बड़ा करने के लिए एक औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति तैयार की है। इन फैसलों से वैश्विक बाजार में उत्साह का माहौल है। निवेश बढ़ा है और पिछली 1 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भविष्यवाणी की कि भारत अगले वित्तीय वर्ष तक 5. 5 प्रतिशत की दर से विकास करेगा और 2016 तक बढ़ कर यह 6.5 प्रतिशत हो जाएगी। वर्तमान में यह दर 4.4 प्रतिशत है।

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