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भाजपा का मोदीकरण

गुजरात के एक व्यापारी के घर 1964 में पैदा हुए शाह की नरेन्द्र मोदी से पहली मुलाकात 1982 में हुई थी। तब मोदी संघ के कनिष्ठ प्रचारक थे। अहमदाबाद में बायो कैमेस्ट्री में स्नातक की पढ़ाई कर रहे शाह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े थे। शाह की संगठन क्षमता से प्रभावित मोदी ने उन्हें 1997 में सरखेज चुनाव क्षेत्र से उपचुनाव लडऩे के लिए प्रेरित किया। बाद में शाह इसी विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विजयी भी रहे।

अमित शाह अब भाजपा के अध्यक्ष हैं। यह वही अमित शाह हैं जिनकी राजनीतिक सूझ-बूझ पर चलकर भाजपा उत्तर प्रदेश में 71 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही। यह सफलता ऐतिहासिक है और पार्टी ने उन्हें इसका ईनाम देते हुए अपना अध्यक्ष चुना है। यह आश्चर्य इसलिए नहीं, क्योंकि अमित शाह नरेन्द्र मोदी के सबसे विश्वसनीय सहयोगी हैं, हनुमान हैं और राजनीतिक गलियारा इसे लेकर उनपर तंज भी कसता है। खैर शाह की ताजपोशी पर संघ पहले ही मुहर लगा चुका है। मोदी ने शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए उम्मीद जताई कि ‘उनके नेतृत्व में निश्चित ही पार्टी का विस्तार होगा और पार्टी अधिक मजबूत बनेगी।’

शाह की अद्भुत संगठन क्षमता और युवा जोश

पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के केन्द्रीय गृहमंत्री बन जाने के बाद ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के सिद्धान्त के तहत सत्तारूढ़ पार्टी की कमान संभालने की दौड़ में कई नाम चले भी, लेकिन अमित शाह के सामने उनमें से किसी में ऐसा दम नहीं था कि वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुंच पाते। पार्टी की कमान संभालने की दौड़ में शामिल नेताओं में पार्टी के महासचिव जे.पी. नड्डा और संघ के नजदीकी नेता ओम माथुर का नाम भी लिया जा रहा था। नड्डा की संगठन क्षमता और मिलनसार होने के गुण के कारण उन्हें इस पद के लिए सबसे योग्य भी माना जा रहा था, लेकिन संगठन क्षमता के साथ चुनाव प्रबंधन के कौशल का अनुभव और मोदी के साथ उनकी निकटता और विश्वासपात्रता शाह को सबसे आगे ले गई। पार्टी के अध्यक्ष बनने वालों में शाह सबसे कम आयु के नेता हैं। किसी भी सशक्त प्रधानमंत्री की तरह मोदी भी शाह के अतिरिक्त किसी अन्य को अध्यक्ष बनने दे कर सत्ता के दो केन्द्र बनने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे। यूपीए सरकार का उदाहरण देश के सामने है। मोदी पार्टी में मौजूद उस खेमे से पूरी तरह गाफि ल भी नहीं हैं, जो उनके रोडमैप में किसी भी समय रोड़ा अटका सकता हो। यदि मोदी विरोधी खेमे से सहानुभूति रखने वाला कोई नेता पार्टी की कमान संभालता तो और कुछ नहीं तो, बयानबाजी से सरकार की छिछालेदर करने का खतरा तो हो ही सकता था। संसदीय बोर्ड की बैठक में निवर्तमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह का त्यागपत्र मंजूर करने के बाद जब पार्टी की कमान संभालने के लिए अमित शाह का नाम आया तो यह मुद्दा उठा कि प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, दोनों ही गुजरात से हो जाएंगे। लेकिन दबी जुबान से उठा यह विरोधी स्वर बोर्ड के सदस्यों के कानों तक नहीं पहुंच पाया।

अटल-आडवाणी छाया से बाहर

शाह के कमान संभालने के बाद साफ हो गया है कि भाजपा पूरी तरह से अटल-आडवाणी की छाया से बाहर होकर नए दौर में पंहुच रही है। इसका पार्टी के अंदरूनी समीकरणों पर भी असर पड़ेगा। इससे एक ओर जहां पार्टी और देश की केन्द्रीय सत्ता केवल दो लोगों के हाथों तक सीमित हो जाएगी, वहीं दूसरी ओर जल्द फैसले लिए जाने की उम्मीदें बढेंगी। इसके विपरीत तानाशाही हावी होने के खतरे भी कम नहीं होंगे और अन्य पार्टियों की तरह भाजपा के लिए भी विकेंद्रीकरण की बजाय केन्द्रीकरण की ओर बढऩे की आशंका पैदा हो सकती है।

जोड़ी नम्बर-वन

मोदी और शाह को जोड़ी नम्बर वन माना जा रहा है। लेकिन दोनों के मिजाज और जीवन शैली बिल्कुल विपरीत है। मोदी जहां इतने विशेष कपड़े पहनते हैं कि उनके हाफ-बाजू के कुर्ते को भी मोदी कुर्ते की संज्ञा दे दी गई है, वहीं शाह पूरी तरह से रफ-टफ अंदाज में रहते हैं। शाह को होटलों की बजाय पार्टी और संघ के कार्यकर्ताओं के घर ठहरना, उनकी परेशानियों में शामिल होना ज्यादा भला लगता है। वह कार्यकर्ताओं के साथ हर मुद्दे पर रूचि के साथ विचार करने का आनन्द लेते हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं के सुझाव वह अपने रोडमैप के सूत्र बनाते चलते हैं। उत्तर प्रदेश में मोदी को 71 सीटें दिलाने में उनका अपना कौशल रहा। संगठन और चुनाव प्रबंधन में कुशल शाह को प्रदेश की सभी सीटों के नाम, वहां खड़े उम्मीदवार, उनकी कमियां, खूबियां आदि सभी महत्वपूर्ण बातें बखूबी पता थीं।

शाह और मोदी की मुलाकात

गुजरात के एक व्यापारी के घर 1964 में पैदा हुए शाह की नरेन्द्र मोदी से पहली मुलाकात 1982 में हुई थी। तब मोदी संघ के कनिष्ठ प्रचारक थे। अहमदाबाद में बायो कैमेस्ट्री में स्नातक की पढ़ाई कर रहे शाह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े थे। शाह की संगठन क्षमता से प्रभावित मोदी ने उन्हें 1997 में सरखेज चुनाव क्षेत्र से उपचुनाव लडऩे के लिए प्रेरित किया। बाद में शाह इसी विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विजयी भी रहे। बाद में उन्होंने नरनपुर से चुनाव लड़ा। गुजरात में शाह ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के चुनावों के प्रबंधन की कमान भी संभाली।

शाह की तुलना होगी पिछले अध्यक्षों से

शाह के समक्ष दिल्ली सहित हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्य होंगे, जहां के चुनाव उनके लिए परीक्षा से कम नहीं होंगे। शाह से पूर्व पार्टी के अब तक जितने अध्यक्ष हुए हैं, उनका कद राष्ट्रीय स्तर का था। आडवाणी, वाजपेयी मुरली मनोहर जोशी, या फिर जना कृष्णमूर्ति, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण सबका राष्ट्रीय राजनीति में एक स्तर था। वेंकैया नायडू भी अध्यक्ष की कुर्सी पर जब बैठे तो देश का मतदाता उन्हें जानने लगा था। हांलाकि नितिन गडकरी जरूर प्रदेश की राजनीति से सीधे भाजपा अध्यक्ष बने थे। अमित शाह की राष्ट्रीय स्तर पर अभी अपनी कोई राजनीतिक पहचान नहीं बनी है। मोदी के प्रभाव के कारण ही उन्हें पार्टी के केन्द्रीय पदाधिकारियों की टीम में महासचिव पद देकर शामिल किया गया था। मोदी की ताकत साफ दिख रही है। उनके सामने फिलहाल तो सरकार या पार्टी में से कोई सीना तान के खड़ा होने की हिम्मत नहीं दिखा सकता। वैसे इसका कोई कारण भी नजर नहीं आता, लेकिन मोदी जानते हैं कि पार्टी आधारित व्यवस्था के भारतीय संसदीय लोकतन्त्र में सरकार के समक्ष पार्टियां कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसलिए किसी प्रकार के राजनीतिक खतरे के बीज का अस्तित्व ही रहने न देना मोदीकरण का पहला सिद्धान्त दिखाई देता है।

व्यवहार में पार्टी की नीतियों पर चुनावी घोषणा पत्र में पार्टियां अपने शासन का रोडमैप देश के समक्ष रखती हैं। लेकिन उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार की होती है, क्योंकि पार्टी का नेता ही सरकार का मुखिया बन कर निर्णय लेने का अधिकारी बनता है। ऐसे में चिन्तनशील और आत्मविश्वासी पार्टी अध्यक्ष यदि शक्ति संपन्न हो जाए तो सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। राज्यों की सरकारों के मुखियाओं के सिर पर इसीलिए तलवार लटकी रहती है। संगठन का मुखिया सरकार को पार्टी के सिद्धान्तों के मुताबिक मार्ग दिखा सकता है। एक प्रकार से मजबूत और विचारशील अध्यक्ष सरकार पर पार्टी का अंकुश बना सकता है, लेकिन उसी मार्गदर्शन को सरकार का मुखिया अपने मार्ग का रोड़ा मानने लगता है। अब तक मोदी के लिए अमित शाह पूरक बने दिखाई देते रहे हैं। लेकिन अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नई भूमिका में उनकी कार्यशैली क्या रहती है!

श्रीकान्त शर्मा

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