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नरेन्द्र मोदी का लंबी दौड़ का ‘गौड़ा’

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अच्छे दिन लाने के लिए कड़वी दवा की बात कही थी और बाद में वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कड़े निर्णय लिए जाने की जरूरत बताकर उनका समर्थन किया था, तभी यह आभास हो गया था कि भारत में लोक-लुभावन वादों का दौर खत्म होने जा रहा है। आमतौर पर भारत में चुनावी लफ्फाजी और राजनीतिक महत्वकांक्षाओं से वशीभूत होकर ‘मुफ्त के उपहार बांटने’ से सत्तारूढ़ दलों को कभी परहेज नहीं रहा। लेकिन इस बार के रेल बजट पर गौर किया जाय तो इसमें बांटने की अपेक्षा संस्थागत सुधार को तरजीह दी गई है। रेलमंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा द्वारा पेश किया गया रेल बजट कई मायनों में अहम है। भारतीय रेल की सेहत को सुधारने और उसे विश्वस्तरीय बनाने के लिए इस बार के बजट में कई अहम फैसले लिए गए हैं।

बजट भाषण के दौरान रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने कहा – ”सबको लगता है कि रेलवे की समस्या का समाधान उसके पास है। जब मैं सरकार में नहीं था, तब मैं भी ऐसा ही सोचता था।’’ रेलमंत्री का यह बयान भारतीय रेल की बिगड़ी सेहत और उसके सुधार की जटिलता को उजागर करता है। रेल बजट से पहले ही कड़वी दवा वाला मोदी के बयान ने सुधार के अपने प्रयासों के बीच आने वाली अड़चनों से समझौता नहीं करने के संकेत दे दिए थे। प्रधानमंत्री मोदी के बयान के कुछ दिनों के भीतर ही रेल यात्री किराया में 14.2 प्रतिशत और माल भाड़ा में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा कर दी गई। इस घोषणा को मोदी के ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ के चुनावी नारों की खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज में विरोधियों ने अच्छे दिन की शुरूआत कहा, लेकिन जानकारों का कहना है कि ऐसे निर्णयों को बहुत अधिक दिन तक टाला नहीं जा सकता था।

रेल बजट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन को विस्तार दिया गया है। बुलेट ट्रेन की उनकी महत्वकांक्षी परियोजना को इस बजट में विशेष स्थान दिया गया है। बजट से पहले ही दिल्ली-आगरा हाईस्पीड ट्रेन का परीक्षण किया जा चुका है। अब मुंबई-अहमदाबाद के बीच पहली बुलेट ट्रेन चलाने की संभावनाओं के अध्ययन को परखा जा रहा है। हाईस्पीड ट्रेनों के लिए 9 लाख करोड़ रूपए की लागत वाली ‘हीरक चतुर्भुज रेल परियोजना’ के लिए इस बजट में प्रारंभिक रूप से 100 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं।

पहले से ही 26 हजार करोड़ रूपए की नकदी का संकट झेल रही भारतीय रेल के लिए बुलेट ट्रेन के सपने को साकार करना असंभव नहीं तो आसान भी नहीं है। एक बुलेट ट्रेन की लागत 60 हजार करोड़ रूपए आएगी, जिसके लिए फंड की व्यवस्था करना वर्तमान में लगभग टेढ़ी खीर है। रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने कहा – ”इसके लिए सिर्फ रेल किरायों में वृद्धि पर आश्रित नहीं रहा जा सकता, अन्य विकल्पों की तलाश भी आवश्यक है।’’ विकल्प के रूप में रेलमंत्री ने रेलवे में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को 100 प्रतिशत तक करने और निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पब्लिक-प्राईवेट पार्टनरशिप – पीपीपी) को बढ़ावा देने की बात कही है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी सिर्फ रेलवे की आधारभूत संरचना के विकास में दी जाएगी, जबकि उसके परिचालन में एफडीआई की अनुमति नहीं होगी। गृहमंत्रालय के अनुसार, संवेदनशील क्षेत्रों में रेलवे की किसी भी परियोजना में एफडीआई की इजाजत नहीं होगी। विश्वस्तरीय बनाने के लिए रेलवे को 1100 करोड़ रूपए पूंजी के रूप में और 273 करोड़ रूपए ‘रेलवे शेयर’ के रूप में अतिरिक्त सहायता दी जाएगी।

इस रेल बजट को कांग्रेस उपाध्यक्ष

राहुल गांधी ने निराश करने वाला बजट बताया है, तो दूसरी तरफ पूर्व रेलमंत्री पवन बंसल ने नरेन्द्र मोदी की नेतृत्व वाली राजग सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि रेल में ढ़ांचागत सुधार और विश्वस्तरीय बनाने के लिए जब हम एफडीआई की बात कहते थे, तो यही लोग एफडीआई को राक्षस कहकर सदन से वॉक आउट कर जाते थे।

लगभग 1.16 लाख किलोमीटर की दूरी तय करने वाली भारतीय रेल दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेलवे नेटवर्क है, जिसमें 13.1 लाख कर्मचारी अपनी सेवाएं देते हैं। देश के कुल 7,172 रेलवे स्टेशनों के जरिए प्रतिदिन 9 हजार गाडिय़ों का संचालन करने वाली रेलवे प्रतिदिन 2 करोड़ 30 लाख लोगों को उनके गंतव्य स्थानों तक पहुंचाती है।  बावजूद इसके, इन लोगों को यात्रा के दौरान मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है। रेल में साफ पानी

की बात तो दूर, तीन-तीन दिनों तक लगातार यात्रा करने वाली ट्रेनों में पानी की व्यवस्था तक नहीं होती। महीने में लगभग 20 दिन यात्रा में रहने वाले मसाला व्यवसायी हरीश चंद्र का कहना है कि व्यवसाय को चलाने के लिए यात्रा करना हमारी मजबूरी है, वर्ना जो स्थिति भारतीय रेल की है, उसमें सफर करना किसी सजा से कम नहीं है।

हरीश जैसे सैकड़ों लोग हैं, जिन्हें यात्रा करना उनकी मजबूरियों में से एक है। अलीगढ़ से प्रतिदिन दिल्ली आकर नौकरी करने वाले राजेश कुमार का कहना है कि जाड़े के दिनों में तो यात्रा फिर भी आसान बन जाती है, लेकिन गर्मी में प्रतिदिन ट्रेन से दिल्ली आना भयानक अनुभव होता है। एक तो भीड़, उपर से ट्रेन में न पानी की किल्लत और गंदगी का अंबार मन को खिन्न कर देता है। टॉयलेट की तरफ देखने की तो इच्छा तक नहीं होती।

समय-समय पर रेलवे में खान-पान और साफ-सफाई को लेकर उठती नाराजगी के लिए इस बार बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार स्वच्छता पर निगरानी रखने के लिए स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना है।  साथ ही स्वच्छता को सुनिश्चित करने के लिए पिछले वित्त वर्ष में आवंटित की गई राशि में इस वर्ष 40 प्रतिशत का इजाफा किया गया है। हर स्टेशन पर एक सफाई विंग तैनात की जाएगी, जो स्वच्छता के प्रति जवाबदेह होगी। इसका जिम्मा प्रोफेशनल एजेंसियों को सौंपा जाएगा। पारदर्शिता बनाए रखने के लिए तीसरे पक्ष से ऑडिट कराने की बात कही गई है।


रेल बजट : एक नजर में…


  • नेक्स्ट जेनरेशन टिकट रिजर्वेशन सिस्टम
  • प्लेटफॉर्म टिकट और अनारक्षित टिकट ऑनलाईन
  • प्रति मिनट 2,000 ऑनलाईन टिकट बुकिंग को बढ़ाकर 7,200 टिकट प्रति मिनट करने की योजना
  • डिजिटल बेस्ड रिजर्वेशन चार्ट (बंगलुरू मॉडल)
  • आगमन-प्रस्थान की मोबाईल बेस्ड अलर्ट
  • सभी स्पेशल ट्रेन और बड़े स्टेशनों पर वाई-फाई की सुविधा
  • ट्रेन की रियल टाईम ट्रैकिंग
  • कंप्यूटराईज्ड पार्सल मैनेजमेंट सिस्टम का विस्तार
  • स्टेशन की साफ-सफाई के लिए सीसीटीवी कैमरे का प्रयोग
  • रेडी टू मील का इंतजाम
  • सभी बड़े स्टेशनों पर फूड कोर्ट
  • स्थानीय खाने को ईमेल, एसएमएस और स्मार्टफोन से मंगाने की सुविधा
  • अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानदंड का इस्तेमाल
  • दुर्घटना अध्ययन करने के लिए सिम्यूलेशन सेंटर
  • महिला कोचों के लिए 4,000 महिला आरपीएफ कॉन्स्टेबल की भर्ती।
  • अगले चरण में 17,000 आरपीएफ कंस्टेबलों की भर्ती।

21वीं सदी की शुरूआत में चीन से आर्थिक प्रतिस्पद्र्धा करने की एनडीए सरकार के ख्वाब की झलक भी रेलवे बजट में मिल रही है। आज से लगभग 20 साल पहले भारतीय रेलवे से 15 साल पीछे रही चीनी रेलवे का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। चीन की रेलवे आज विश्व की आधुनिक रेल सेवाओं में से एक है। रेल के माध्यम से आर्थिक विकास को गति देने के लिए कई क्षेत्रों को चिह्नित करने की कोशिश की गई है। इसमें पर्यटन उद्योग एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। रेलवे को सीधे-सीधे तीर्थस्थानों से जोडऩे की पहल को पर्यटन उद्योग के विकास के साथ भी देखा जा सकता है। भारत में धार्मिक यात्रा लगभग सालों भर जारी रहती है, जिसमें करोड़ों लोग रेलवे का प्रयोग करते हैं। अगर इन स्थानों को सीधे-सीधे रेलवे से जोड़ दिया जाता है तो इससे न सिर्फ रेलवे की सेहत में सुधार होगी, बल्कि तीर्थयात्री के रूप में इन स्थानों को पर्यटक भी मिल जाएंगे, जो स्थानीय स्तर पर रोजगार को बढ़ाने के साथ-साथ सरकार के लिए राजस्व जुटाने में भी मददगार होगा। रेल बजट में इसके लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। पहले चरण में महाराष्ट्र और कर्नाटक में तीर्थयात्रा स्पेशल ट्रेन का परिचालन प्रारंभ किया जाएगा, उसके बाद बंगलुरू, चेन्नई, अयोध्या, वाराणसी और हरिद्वार तक इन सेवाओं को विस्तार किया जाएगा। बजट में अन्य धार्मिक स्थलों की पहचान करने की बात भी कही गई है। ईसाई, मुस्लिम, सिख, सूफी और बौद्ध तीर्थस्थलों की पहचान कर उनके लिए भी इस तरह की ट्रेनों का परिचालन शुरू करने की योजना है। स्वामी विवेकानंद के जीवन और कार्यों पर आधारित विशेष ट्रेन का परिचालन भी किया जाएगा।

रेल बजट में उत्तर-पूर्व के राज्यों पर विशेष जोर दिया गया है। कुल 58 नई ट्रेनों में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए 7 ट्रेनें दी गई हैं। साथ ही वहां के लिए इको-ट्यूरिज्म और एजुकेशन ट्यूरिज्म की व्यवस्था की बात भी कही गई है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में रेल की कुल 23 परियोजनाएं संचालित हैं, जिसमें 11 राष्ट्रीय परियोजना है। इसके लिए 5,116 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वित्त वर्ष में आवंटित राशि से 54 प्रतिशत अधिक है। इस तरह मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सीमावर्ती राज्यों के विकास पर जोर देते हुए देश की सीमाओं को मजबूत करने का प्रारूप बनाया है।

पूर्व रेलमंत्री पवन बंसल के बजट परिपत्र से 10 पेज कम और दिनेश त्रिवेदी के बजट परिपत्र से 24 पेज कम अपने रेल बजट परिपत्र के जरिए रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने देश को कुल 58 नई ट्रेनों के साथ-साथ देश को कई परियोजनाओं का तोहफा दिया है। इसमें 5 जनसाधारण, 5 प्रीमियम ट्रेनें, 6 एसी, 27 एक्सप्रेस, 8 पैसेंजर, 5 डीएमयू और 2 ईएमयू गाडिय़ां शामिल हैं।  पिछले 30 सालों में 676 रेल परियोजनाओं को मंजूरी मिली है, जिसमें 359 परियोजनाएं अभी भी अधूरी हैं। इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए 1 लाख 82 हजार करोड़ रूपए की जरूरत होगी। जबकि पिछले 10 सालों में नई रेल लाईन बिछाने की 99 परियोजनाओं को मंजूरी मिली है, जिनकी कुल लागत 60 हजार करोड़ रूपए है। इनमें से अभी तक सिर्फ एक परियोजना पूरी हुई है। यूपीए सरकार की इस नाकामी के पीछे प्रशासन का ढीला-ढाला रवैया और राजनेताओं का विकास के प्रति कम दिलचस्पी महत्वपूर्ण कारक रही है।

वित्तीय वर्ष 2008 में रेलवे का सरप्लस 11,754 करोड़ रूपए था, जो 2014 में घटकर 3,783 करोड़ रूपए रह गया। वर्तमान वित्त वर्ष में यह सरप्लस सिर्फ 602 करोड़ रूपए रह जाने का अनुमान है। अपने कमाए हुए हर 1 रूपए में से रेलवे 94 पैसे खर्च कर देती है। उसके पास बचत के रूप में सिर्फ 6 पैसे बचते हैं। इससे रेलवे के पास नकदी की किल्लत लगातार बढ़ती जा रही है। इसमें सुधार लाने के लिए और रेलवे की आय में वृद्धि करने के लिए स्पेशल मालवाहक कॉरीडोर की स्थापना करने की बात कही गई है। इसके माध्यम से 50 मिलियन टन की वर्तमान ढुलाई की क्षमता को बढ़ाकर 1,101 मिलियन टन तक करने का लक्ष्य रखा गया है। बंदरगाहों को जोडऩे पर विशेष रूप से बल दिया गया है। इससे निवेशकों को प्रोत्साहन मिलने के साथ-साथ रेलवे को पूंजी जुटाने में मदद मिलेगी और समय पर मालों की ढुलाई संभव हो पाएगी। आपूर्तिकर्ताओं को बढ़ावा देने के लिए बजट में रेल के ईंधन के कुल इस्तेमाल का 5 प्रतिशत बायो-डीजल प्रयोग करने की बात कही गई है।

रेल मंत्रालय परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए रेलवे बोर्ड का पुनगर्ठन करने की तैयारी कर रहा है। समय बीतने के साथ परियोजनाओं की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि होती जाती है, जिससे अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेलवे को प्रभावी बनाने के लिए हाल ही में रेल के पूर्व अधिकारियों और विशेषज्ञों के साथ बैठक कर उसमें सुधार के लिए उठाए जाने वाले आवश्यक कदमों पर चर्चा की है। रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने हर 6 महीने पर रेल किराए को संशोधित करने के यूपीए सरकार के निर्णय को जारी रखने का भी निर्णय लिया है। साथ ही रेल गाडिय़ों की लेट-लतीफी पर लगाम कसने के लिए हॉल्ट और ठहराव स्थलों को कम करने के लिए 3 महीने का समय निर्धारित किया है। पिछली यूपीए सरकार में रेल गाडिय़ों के ठहराव स्थलों को 3 हजार तक लाने की प्रायोगिक सहमति बनी थी। भारत में रेल गाडिय़ों के ठहराव की मांग राजनीतिक मुद्दा होता है। हर विधायक या सांसद चाहता है कि उसके क्षेत्र में महत्वपूर्ण गाडिय़ों का ठहराव हो। इसके कारण रेलवे की परिचालन और प्रभावी नतीजे देने की क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है। विभागीय वर्चस्व में उलझकर अपनी कार्यकुशलता को लगभग पूरी तरह खो चुकी भारतीय रेलवे के अच्छे दिन आने की उम्मीद हर भारतीय को है।

सुधीर गहलोत

 

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