ब्रेकिंग न्यूज़ 

बजट 2014: एक समीक्षा

स्मार्ट शहर चाहिए, यह सही है लेकिन शहर और गांव दोनों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी बढ़ाने की उतनी ही जरूरत है। यह भी जरूरी है कि हमारी 30 प्रतिशत जनसंख्या जो गरीबी रेखा से नीचे रहती है, उसको कमाने के पूरे अवसर मिले। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि आज के भूमंडलीकरण के इस युग में गरीबों, वंचितों, दलितों और आदिवासियों की जमीने छिन रही हैं।

यूपीए सरकार के 10 साल के लंबे शासनकाल के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले बजट से आम आदमी खासी उम्मीदें लगाकर बैठा था। नौकरी पेशा ही नहीं, अन्य लोग भी 5 लाख रूपये तक आयकर में छूट की और मंहगाई से राहत की उम्मीद, लघु उद्यमी एक्साईज टयूटी में छूट की उम्मीद, युवा रोजगार की उम्मीद, उद्योग जगत अर्थव्यवस्था में उठाव की उम्मीद, सहित देश में सभी वर्ग बजट से कुछ प्राप्ति की आस लगाये बैठा था। आखिर क्यों न हो, नरेन्द्र मोदी ने उन्हें ‘अच्छे दिन’ लाने का वायदा जो किया था।

लेकिन बजट से एक दिन पहले ही अभी आर्थिक समीक्षा ने हालांकि चालू वर्ष में 5.4 फीसदी से 5.9 फीसदी ग्रोथ की आस जगायी थी। यह भी कहा गया था कि अर्थव्यवस्था के हालात बहुत अच्छे नहीं है। हालांकि मंहगाई की दर कुछ घटी जरूर है, लेकिन मैन्यूफैक्चरिंग अभी भी मुश्किल दौर से गुजर रहा है। मानसून की कमी का कहर भी कृषि को उठाना पड़ सकता है।

रोजगार

बजट की यदि समीक्षा करनी हो तो जाहिर है कि उसे लोगों की आकांक्षाओं के संदर्भ में ही करना होगा। जनगणना 2011 के अनुसार आज 25 से 34 वर्ष की आयु के हमारे 4.7 करोड़ युवा बेरोजगार हैं। आदिवासी युवाओं में बेरोजगारी 22 प्रतिशत और दलित युवाओं में 21 प्रतिशत है। ये युवा आज की ग्रोथ के फायदों से मरहूम हैं। उन्हें रोजगार चाहिए। लेकिन बजट में रक्षा और बीमा क्षेत्र में एफडीआई, सोलर पैनल्स समेत कुछ क्षेत्रों में कर राहत, लघु कुटीर उद्योगों के लिए थोड़ी बहुत रियायतों के अलावा कुछ विशेष दिखाई नहीं देता। सब मानते हैं कि आज का विकास रोजगार विहीन विकास है, लेकिन उसे रोजगार युक्त विकास बनाने का प्रयास इस बजट में भी दिखाई नहीं देता।

मैन्यूफैक्चरिंग

पिछले लगभग दो दशकों की ग्रोथ का अनुभव यह रहा है कि जीडीपी में कृषि का हिस्सा 25 प्रतिशत से कम होकर 13.5 प्रतिशत रह गया है और सेवाओं का हिस्सा 60 प्रतिशत तक पहुंच गया है। मैन्यूफैक्चरिंग समेत औद्योगिक उत्पादन का हिस्सा अभी भी 27.5 प्रतिशत बना हुआ है। जिसमें मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 15 प्रतिशत ही है। सरकारी हलकों में बार-बार इसे 25 प्रतिशत तक ले जाने की बात कही जाती रही है।

मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा जीडीपी में स्थिर रहने का मतलब यह है कि मैन्यूफैक्चरिंग में ग्रोथ जीडीपी की ग्रोथ के लगभग बराबर रही। लेकिन पिछले 3 सालों में स्थिति बदली है। 2011-12 और 2012-13 में मैन्यूफैक्चरिंग की ग्रोथ शून्य के नजदीक रही और पिछले साल 2013-14 में तो यह घटकर ऋणात्मक 0.7 प्रतिशत तक पहुंच गयी।

बजट से यह स्वभाविक अपेक्षा थी कि इससे मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ावा दिया जायेगा। यह सही है कि इस बजट में विशेष आर्थिक क्षेत्रों को बढ़ावा देने, 8 राष्ट्रीय निवेश एवं मैन्यूफैक्चरिंग जोन बनाने दिल्ली, मुंबई, इंडस्ट्रीयल कॉरीडोर समेत 4 इंडस्ट्रीयल कॉरीडोरों का निर्माण, मुख्य मैन्यूफैक्चरिंग उद्योगों में अतिरिक्त क्षमता के निर्माण समेत कई उपाय बताए गए हैं। लेकिन विडम्बना का विषय यह है कि मैन्यूफैक्चरिंग में गिरावट के मुख्य कारणों की बात नहीं की गई है। वास्तव में यदि मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है तो उसके लिए मंहगाई को थामकर ब्याज दरों को घटाना होगा और आयातों पर रोक लगाते हुए उन्हें कम करना होगा। रूपए को मजबूत करके भी हम उद्योगों की लागतों को कम कर सकते हैं और उत्पादन को बढ़ावा दे सकते हैं। इन उपायों का लगभग अभाव बजट में दिखाई देता है।

मंहगाई

मंहगाई के मुद्दे पर बजट में एक अच्छी बात यह है कि नए कर लगाकर बोझ बढ़ाने का प्रयास नहीं हुआ और साथ ही साथ खर्चों को थामते हुए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.1 प्रतिशत तक सीमित रखने का संकल्प लिया गया है। दीर्घकाल में सरकारी खर्चों को थामकर और सब्सिडी को युक्ति संगत बनाकर ही मंहगाई को रोका जा सकता है। पूर्व की भांति कृषि को इस बार भी उपेक्षित रखा गया है। गौरतलब है कि कृषि पर बजट का 1 प्रतिशत भी आवंटित नहीं किया गया।

सामाजिक क्षेत्र

शिक्षा और स्वास्थ्य हो अथवा महिला या बाल विकास, पेयजल उपलब्धता हो अथवा पिछड़े दलितों के उत्थान के लिए प्रयास, ये सभी सामाजिक क्षेत्र के खर्च हमेशा की भंति इस बजट में भी उपेक्षित रहे हैं। सामाजिक सेवाओं पर खर्च बढ़ाने की हर बार बात ही जाती है, लेकिन विडम्बना का विषय यह है कि इन सभी प्रकार की मदों पर कुल मिलाकर खर्च 9 प्रतिशत के आसपास ही रहता है। पिछले 10 सालों में यह कभी भी 10 प्रतिशत से उपर नहीं जा सका। यदि हम अपनी युवा शक्ति का सही उपयोग करना चाहते हैं तो इन मदों पर खर्च बढ़ाने की जरूरत है।

विदेशी भुगतान संकट और कमजोर रूपया

पिछले काफी समय से हमारा विदेशी भुगतान का घाटा ज्यादा होने के कारण रूपए पर दबाव बनता रहा है। रूपए के कमजोर होने से देश में मंहगाई तो बढ़ती ही है, हमारे उद्योगों की लागतें भी बढ़ती हैं। रूपया मजबूत होने से हमारी उद्योगों की लागत कम होगी, क्योंकि विदेशों से आने वाला कच्चा माल और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला अन्य साजो सामान सस्ता हो जायेगा। इसके अलावा कंपनियों ने जो विदेशों से ऋण उठा रखे हैं उनकी अदायगी भी घटेगी। इसके लिए जरूरी है कि हम अपने आयातों को थामे। इसका एक अन्य लाभ यह भी होगा कि इससे हमारे देश में औद्योगिक उत्पादन बढ़ेगा।

स्मार्ट शहर चाहिए, यह सही है लेकिन शहर और गांव दोनों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी बढ़ाने की उतनी ही जरूरत है। यह भी जरूरी है कि हमारी 30 प्रतिशत जनसंख्या जो गरीबी रेखा से नीचे रहती है, उसको कमाने के पूरे अवसर मिले। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि आज के भूमंडलीकरण के इस युग में गरीबों, वंचितों, दलितों और आदिवासियों की जमीने छिन रही हैं। इस प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत है, इसके लिए आज के विकास का मॉडल बदला जाए। एफडीआई और बड़े कॉरपोरेट घरानों पर आश्रित विकास, रोजगार विहीन विकास है, गरीबी को बढ़ाने वाला है और वंचितों को उनके बचे खुचे संसाधनों से भी च्युत करने वाला है। लेकिन दुर्भाग्य का विषय यह है कि यह बजट भी पूर्व बजटों की भांति उसी ढर्रे पर दिखाई देता है।

डॉ. अश्विनी महाजन

legal translationяхтинг обувь

Leave a Reply

Your email address will not be published.