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दिशा परिवर्तन के संकेत

अर्थशास्त्र चयन का शास्त्र है। चयन की उपादेयता को राजनैतिक प्रगल्भता की छेनी से तराश कर वित्त मंत्री अरूण जेटली ने राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में एक ऐसी दिशा परिवर्तनकारी संरचना गढऩे का यत्न किया है, जो नए भारत में परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरेगी।

इसे ‘पैराडाइम शिफ्ट’ दर्शाने वाला बजट कहें तो उपयुक्त ही होगा। भारतीय जनता पार्टी ने आर्थिक परिवर्तन के स्पष्ट संकेत अपने मैनिफैस्टो में दिए थे। चाहे ‘रूरल-अरबन मिशन’ हो, उत्तर-पूर्व हो, कश्मीरी पंडितों की वापसी का मुद्दा हो या फिर आधारभूत संरचना व स्किल डेवलपमेंट का एजेंडा हो – मैनिफैस्टो की संकल्प रचना पूरे बजट में प्रतिध्वनित होती है। और यह भी स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित विकास का एक ‘देशीय’ मॉडल रचने की इच्छा व उमंग भारतीय जनता पार्टी की सरकार में पूरे उफान पर है। हालांकि ‘लाल’ आलोचकों ने इसे गरीबों के विरूद्ध बजट बताया है और कांग्रेसी प्रवक्ताओं ने इसे यूपीए के बजटों की प्रतिछाया बताया है, पर अर्थशास्त्र जानने-समझने वाला कोई भी समालोचक अच्छी तरह समझ सकता है कि इस बजट में विकास को आर्थिक आधारों पर पुर्नजीर्वित करने का पुरजोर प्रयास किया गया है। इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश को, विनियोग को, बंदरगाहों, नए संस्थानों की शुरूआत सभी पर लगभग डेढ़ लाख करोड़ की बात करना क्या दिशा परिवर्तन का स्पष्ट संकेत नहीं है? 7,060 करोड़ रूपए स्मार्ट सिटी पर, 100 करोड़ ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर पर, 37880 करोड़ रूपए सड़क बनवाने के लिए, 500 करोड़ रूपए हाईवे के लिए, 1,000 करोड़ संसाधनों पर और 100 करोड़ मेट्रो पर देने वाला यह बजट एक साधारण आर्थिक सिद्धांत पर आधारित है – निवेश से, आधारभूत निवेश से विकास और रोजगार दोनों बढ़ते हैं। यही कारण है कि घरेलू बचत बढ़ाने के प्रयास भी हमें इस बजट में दिखाई देते हैं। जिस देश की घरेलू बचत 36 प्रतिशत से घटकर 33 प्रतिशत फिर 30 प्रतिशत के आसपास आ गई हो उसे आर्थिक फंडामेंटल की चिंता करनी चाहिए और यही इस बजट में दिखता है। छोटे सुधारों पर ध्यान देकर बचत व निवेश बढ़ाने का पुरजोर प्रयास किया गया है। चाहे वह निवेश सीमा बढ़ाना हो या इक्विटी आधारित म्यूचुअल फंड पर अप्रत्यक्ष प्रभाव हो या टैक्स सीमा का विस्तार हो, हर हाल में बचत व निवेश छोटे से छोटे निवेशक द्वारा बढ़ेगा।


संतुलित और दूरदर्शी बजट


मोदी सरकार से जितनी बड़ी उम्मीदें लोगों ने लगा रखी थी, उसी हिसाब से सभी की निगाहें 10 जुलाई को अरुण जेटली के सूटकेस पर लगी हुयी थीं। और जब बजट आया तो विरोधियों को छोड़ सभी को यह बजट संतुलित और दूरदर्शी लगा। हमें इस बात की तारीफ करनी चाहिए कि यह बजट अगले आठ महीनों के लिए ही है और इस सरकार की असली परीक्षा तब होगी जब वित्त मंत्री 2015 – 16 के लिए बजट पेश करेंगे। हमें यह भी मानना होगा कि इस बजट में इस नयी सरकार की दिशा और मंशा साफ झलकती है। अगर फरवरी 2015 तक अगर वित्त मंत्री राजकोषीय घाटा को 4. 1 प्रतिशत तक रख पाने में सफल होते हैं तो यह कोई छोटी बात नहीं होगी। खराब मानसून की आशंका को देखते हुए और पेट्रोल की कीमतों की अनिश्चितता की वजह से वित्त मंत्री कोई खतरा मोल नहीं ले सकते थे। कुछ लोग कह रहे थे कि भारी बहुमत होने से कुछ कड़े कदम उठाये जा सकते थे, लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि ये वही लोग हैं जो ऐसे कदम उठाने के बाद यह कहने से भी नहीं चूकते कि 300 + सीटों का अहम दिखा रहे हैं वित्त मंत्री। गंगा नदी के माध्यम से मालवाहन के लिए 4200 करोड़ के बजट प्रावधानों पर कोई बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हो रही है, जबकि यह अर्थव्यस्था के साथ-साथ पर्यटन के लिए भी अच्छा होगा। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह पर्यावरण के लिए ठीक नहीं होगा, लेकिन एक बढिय़ा प्लानिंग से इस समस्या से निबटा जा सकता है। अभी के माहौल में यह बजट बहुत बढिय़ा है और आने वाले अच्छे दिनों की ओर इंगित करता है।

विजय मारू


आर्थिक वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए, जिनमें मुद्रा-स्फीति व अंतर्राष्ट्रीय संकट व कमजोर मानसून मुख्य हैं, वित्तमंत्री ने आर्थिक मितव्ययिता बरतते हुए भी जहां अर्थव्यवस्था को पहुंचाना है, वहां तक जाने का रोडमैप बजट घोषणाओं के माध्यम से दिया है। 100 करोड़ की राशि को कम बताकर उनकी आलोचना की गई है, पर आधा वर्ष बीत चुका है और जिस भी प्रोजेक्ट पर व्यय होना है, उसकी डिटेल बनने तक यह वित्तीय वर्ष निकल जाएगा। अत: यह ‘संकेतक’ या ‘सिग्रल’ घोषणाएं बता रही हैं कि अर्थव्यस्था का गंतव्य क्या है। मूल्य स्थिरता आयोग द्वारा कीमतों में स्थिरता लाने का यत्न और व्यय नियंत्रण आयोग द्वारा विभिन्न सब्सिडी और सामाजिक व्ययों को विवेकीकृत करने के प्रयास भी सराहनीय रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कर एवं व्यय प्रणाली में, प्रशासन एवं डिलिवरी मैकेनिज्म में, बजटीय ढांचे में संस्थागत सुधारों की बात की गई है।

ग्रामीण क्षेत्रों का शहरी क्षेत्रों के समकक्ष सुविधाएं देने का प्रकल्प पलायन रोकेगा। सच्चा ‘सर्वोदय’ तभी है, जब गांव का आधारभूत ढांचा शहरों के समकक्ष बढ़े। इस बजट में आधारभूत सुविधाएं, पानी, बिजली, आवास व इ-क्रांति की बात की गई है। यह सबसे बड़ी ‘ग्रामीण-अर्थ प्रगति’ है। ठीक इसी तरह देशीय उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया है। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर इस बजट का सबसे महत्वपूर्ण दबाव क्षेत्र रहा है। सिंगल विंडो, ड्यूटी रचना, नए कॉरिडोर, क्लस्टर इत्यादि की रचना इस क्षेत्र में उत्पादकता, प्रतिद्वंद्विता और पूरे ढांचागत सुधार की ओर संकेत करते हैं। सारांश में यह कहें कि इस सेक्टर को विकास के इंजन की तरह बढ़ाने की एक पूरी रणनीति रची गई है।

4.1 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा भी वित्तमंत्री की राजकोषीय कॉन्सॉलिडेशन की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वित्तीय वर्ष 2015-16 और 2016-17 में यह क्रमश: 3.6 प्रतिशत और 3 प्रतिशत होगा, यह स्पष्ट करता है कि मोदी सरकार ने अपने ‘इकॉनॉमिक सर्वे’ के तथ्यों को गंभीरता से लिया है।

मनरेगा पर भी इकॉनॉमिक सर्वे में काफी विस्तार से लिखा गया। मनरेगा की उत्पादकता, उपयोगिता व प्रभाव क्षमता बढ़ाने के लिए उसे कृषि से जोड़कर परिसंपत्तियों तक ले जाना एक प्रभावी कदम है, पर साथ ही साथ कृषि इनपुट्स पर फंड बनाना, कृषि उत्पादकता के लिए प्रभावी वैज्ञानिक कदम और 8 लाख करोड़ कृषि-ऋण लक्ष्य व नए कृषि विश्वविद्यालयों की रचना व किसान टीवी कृषि क्षेत्र के लिए बड़े कदम हैं। गुजरात तो पहले ही कृषि-मेलों को अंतर्राष्ट्रीय रूप दे चुका है अब अन्य राज्य भी कृषि को उद्योग के तौर पर लेंगे, ऐसा लगता है।

रक्षा व बीमा क्षेत्र में एफडीआई 49 प्रतिशत करना बेहद बड़े कदम हैं। रक्षा से रोजगार व तकनीक क्रांति तक विदेशी निवेश को यंत्र वाहन के तौर पर लिया गया है। यह विकास के वाहन को तीव्र गति देंगे।

बजट नए नजरिए को एक सूत्र में पिरोता दिखता है। ‘स्किल इंडिया’, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, पूर्वोत्तर भारत पर पूरा ध्यान, जिसमें 100 करोड़ रूपए रेल संपर्क और 100 करोड़ ऑर्गेनिक खेती पर खर्च किए जाएंगे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के प्रकल्पों में से उभरे विचार हैं, जिनके माध्यम से युवा और पूर्वोत्तर पर संकेन्द्रण का ‘मोदी विजन’ का धरातलीय प्रयोग दर्शानें हैं।

यह बजट भले ही ‘बिग-बैंग’ बजट न हो पर यह एकीकृत विचार पर आधारित बजट है, जिसकी नींव स्पष्ट आर्थिक सिद्धांतों पर रखी हुई है।  यह बजट बताता है कि ‘मोदी-सरकार’ की सोच स्पष्ट है, निर्णय क्षमता प्रभावी है और प्रतिबद्धताएं अक्षुण्ण हैं। सबसे बड़ी बात है कि यह आधुनिकतम सोच का देशीय बजट है।

डॉ. ज्योति किरण

 

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