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जैसे उडि़ जहाज कौ पंछी…

‘जैसे उडि़ जहाज कौ पंछी फिरि जहाज पै आवे’ संत कवि सूरदास की इन पंक्तियों को भारत की अर्थव्यवस्था पर लागू करने का मन करता है। क्या मोदी सरकार का पहला बजट भारतीय अर्थव्यवस्था को फिर से विकास के जहाज पर लेकर जा पाएगा? ये बड़ा सवाल है। वैसे तो पूरा बजट आंकड़ों का खेल होता है। जैसा कि कहा जाता है कि ‘आंकड़े दिखाते कम और छुपाते ज्यादा हैं।’ तो हमें मालूम नहीं है कि जो आंकड़े संसद में पेश किए गए उनमें वित्त मंत्रालय के अफसरों ने क्या दिखाया और क्या नहीं।

असल में इस बजट से ज्यादा उम्मीदें लगाना ठीक भी नहीं था। अभी तो हमारी अर्थव्यवस्था उस कार की तरह है जो बिना ईंधन, गीयर ऑयल, कूलैंट और ब्रेक ऑयल के गैराज में खड़ी है। अभी काम उसकी मरम्मत शुरू करने का है। इस बजट में सिर्फ यह देखना चाहिए कि क्या इसमें उस मरम्मत शुरू करने के स्पष्ट संकेत हैं या नहीं। इस पैमाने पर अरूण जेटली के बजट भाषण की मीमांसा करना ज्यादा ठीक होगा। अरूण जेटली के भाषण को ध्यान से सुना या पढ़ा जाए तो कुछ संकेत साफ हैं। यह कोई ‘क्लासिकल’ बजट भाषण नहीं था बल्कि इस नई सरकार का ‘संकेत’ भाषण था, जिसमें सरकार क्या करना चाहती है यह दर्शाया गया था। हालांकि संसद में राष्ट्रपति के भाषण में मोदी सरकार ने कुछ संकेत दिए थे मगर बजट में उन संकेतों की तरफ कदम उठाने की इच्छाशक्ति दिखाने की बात भी थी। आइए देखते हैं कि क्या दिखाया इस सरकार ने?

अपने देश की मूल समस्याएं क्या हैं: पहली, आर्थिक सुरक्षा, दूसरी सामरिक सुरक्षा, तीसरी है सामाजिक उन्नयन, चौथी है पर्यावरण और पांचवीं है साधनों का सही वितरण। देश की तकरीबन बाकि समस्याओं को इन मुद्दों में समेटा जा सकता है। चाहे वो मंहगाई हो, गरीबी, रोजगार अथवा घाटे की अर्थव्यवस्था। मोदी सरकार के इस बजट में एक संकेत तो बिल्कुल साफ था कि इसमें कोशिश की गई है कि यह सिर्फ शहरी वर्ग का बजट ना हो और कहा जा सकता है कि इस कोशिश में वित्तमंत्री कामयाब रहे। सारी बातों की चर्चा करना यहां संभव नहीं है उनका विश्लेषण अर्थशास्त्री ही कर सकते हैं। देश की सामरिक सुरक्षा वह चाहे आंतरिक हो अथवा बाहरी, देश का सबसे बड़ा सिरदर्द है। अफगानिस्तान से अमेरिका के जाने के बाद यह समस्या और बढ़ जाने वाली है। दुनिया देख ही चुकी है कि इराक में क्या हो रहा है। यह कुछ इतमिनान की बात है कि सरकार ने इस बारे में कुछ सोचा है। वित्तमंत्री खुद रक्षामंत्री भी हैं इसलिए रक्षा का बजट उन्होंने बढ़ा दिया है। मगर प्रधानमंत्री के उस बयान की तरफ कोई साफ कदम नहीं दिखाई दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत को छोटे हथियारों का निर्यातक देश बनाने की जरूरत है। इस ओर देश ‘ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों’ के आधुनिकीकरण की पहल तुरंत होनी चाहिए थी।

देश की सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए वित्तमंत्री ने रक्षा क्षेत्र में 49 प्रतिशत विदेशी निवेश की घोषणा की है। यह एक सही कदम है। हालांकि कई लोगों ने इसकी आलोचना की है। कई लोगों ने इसे देश की सुरक्षा के साथ समझौता बताया है। उन्हें शायद यह बताना जरूरी है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदने वाला देश है। यह सब हथियार दूसरे देशों से ही आते हैं। सब जानते हैं कि ये हथियार हमें औने-पौने दामों में मिलते हैं। अब सोचिए हम विदेशों से तो हथियार खरीदने को तैयार हैं मगर विदेशी पूंजी लेकर हथियार बनाने के काम की आलोचना करते हैं।

इसलिए 49 प्रतिशत निवेश रक्षा क्षेत्र में हो सकता है ये फैसला दूरगामी है इससे देश की हथियार बनाने की क्षमता तो बढ़ेगी ही, हमें बेहतर टेक्नॅालाजी भी मिलेगी। विदेशों पर हमारी निर्भरता भी खत्म होगी साथ ही हम हथियारों के निर्यातक भी बन सकें गे। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी। जैसा कि हमने पहले कहा कि मोदी सरकार से लोग एक मजबूती की अपेक्षा करते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा पर चाहते हैं कि वे सिर्फ बातें न करें बल्कि ऐसा करें कि कोई हमारी तरफ आंख उठा कर न देख सके। ये कदम देश को उसी तरफ ले जाता दिखाई देता है।

देश शांति की बात भी तभी कर सकता है जबकि उसके पास ताकत हो, आर्थिक भी और सामरिक भी। ये ताकत उनके पास रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से न कि खोखली बातों से। कविवर रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं:

क्षमा शोभती उस भुजंग को,

जिसके पास गरल हो।

उसको क्या जो दंतहीन,

विषहीन विनीत सरल हो।

इस देश को विकास के ‘जहाज’ पर चढ़ कर आर्थिक और सामरिक सुरक्षा के दांत और नाखुनों की जरूरत है। और यही अपेक्षा इस सरकार से है। उम्मीद है कि रक्षा क्षेत्र में स्वावलंबन के लिए उठाया वित्तमंत्री का ये कदम हमें उस ओर ले जाएगा।

 उमेश उपाध्याय

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