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स्वयं की पहचान

परम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी कहते थे कि हे प्रभु! मैं तुझे भूलूं नहीं, अगर मैं तुझे भूल गया तो मेरे जीवन का क्या औचित्य रह जाएगा और उस शरीर का क्या जिसकी आत्मा ही ये पात्रता खो दे कि तुझे विस्मृत कर दे! जीव ऐसी साधना करने की पात्रता अपने अन्दर बनाए, ऐसी यात्रा की शुरुआत करे, जो बहिर्मुखी नहीं अपितु अंतर्मुखी हो।

महात्मा बुद्ध ने जब अपना महल छोड़ा, तब उनके सारथी ने उन्हें बहुत समझाया कि कुछ नहीं रखा है उन जंगलों में, मैं वृद्ध हो चुका हूं इतना सब देखा है मैंने, आप मालिक हैं, राजा हैं, आपका परिवार है, कैसे आप ये सब कर पाएंगे? जीवन बहुत कठिन है। बुद्ध ने कहा- तुझे क्या पता, मैं इस महल को जलते हुए देख रहा हूं। तेरे पास ये देखने की आंख ही नहीं है। मेरे से पहले मेरे पूर्वज भी इस महल में रहते आए हैं। काल की गर्त में जीए। क्या किया जीवन में? अनमोल जीवन व्यर्थ ही गया। मुझे जागना है, कुछ पाना है जीवन में। 6 वर्ष की सतत् साधना की बुद्ध ने और बहुत से गुरुओं के साथ समय बिताया। गुरु कहते 15 दिन की साधना करनी है, तो वे 45 दिन की करते। गुरु भी थक जाते और अंत में उन गुरुओं के शिष्य बुद्ध के ही शिष्य हो जाते थे। आखिरी गुरु थे उदात कलाम। जब वो भी बुद्ध को निर्वाण का मार्ग बता नहीं पाए तो उनके 4 शिष्य भी बुद्ध के ही अनुयायी हो गये।

उस समय बुद्ध इतने कृशकाय हो गये थे कि एक तृण लेते थे 24 घंटे में, उनके पेट और पीठ एक हो गये, चला भी नहीं जाता था। उन्होंने सोचा कि ऐसे अपने आप को गला कर क्या मैं परम को प्राप्त कर सकता हूं, शायद नहीं। यही सोचते हुए एक वृक्ष के नीचे बैठे थे जहां कोई नीच जाति की महिला खीर का थाल चढ़ा रही थी वृक्ष देवता को। बुद्ध उसे ग्रहण करके तृप्त हुए, और रात को ही परम को पा लिया उन्होंने।

एक दिन एक राजा ने मुनादी करवाई कि मैं अपने राज्य को जिसकी सीमाओं का कोई छोर नहीं है, उसे बांटना चाहता हूं। जो कोई भी 24 घंटो में जाकर वापस आएगा, जितनी दूर वह जाएगा उतना राज्य उसका। बहुत से लोग चले। अनुभव पर आशा भरी थी, लालच था। वह चलता गया,

कई नगर पार कर गया, भूखा-प्यासा दौड़ता गया, जब वापस मुड़कर चलने का मन बनाया, 19 घंटे बीत चुके थे। वापस राज्य कैसे पहुंचे? कुछ नहीं मिला उसे। खाली हाथ था पहले भी, अब भी।

आदमी अपनी बाहर की यात्रा में इतना बहिर्मुखी हो जाता है कि वो वापस उस अंतर्मुखी यात्रा में आ ही नहीं पाता। उसका परिचय खो जाता है स्वयं से। ठग लेता है उसका मोह, उसके जीवन को।

एक बार एक महात्मा ने एक आदमी से पूछा – आपका पता क्या है? उसने शेखी बखारते हुए कहा – मेरे घर का ये पता, मेरी फैक्ट्री का ये पता, ये मेरे दूसरे घर का पता और ये बड़े कारखाने का पता। उन महात्मा ने कहा मुझे समझ नहीं आया। तब हैरान होकर उस आदमी ने कहा, क्यों? महात्मा बोले – इन सबका नहीं, मुझे तेरा पता जानना है। ये तेरा नहीं, तेरी दुनिया का पता है। तू खुद अपना ही पता भूल गया है। ऐसा ही होता है बाहर की यात्रा में।

इतना डूबो उसमें कि मोती मिले कंकड़ नहीं, इतना उतरो कि जो है तू, वो तू नहीं मैं बन जाए। और अब मैं और तू नहीं, मेरी लौ समा जाए तेरी उस परम लौ में। जैसे बूंद सागर में मिलकर सागर हो जाती है।

कैसे होगा ये सब सरल नहीं है, इन सब में पात्रता जरुरी है। अपने हृदय को बुद्ध के हृदय की तरह निर्मल करना होगा। सब बाहरी आवरणों को छोड़ के अंतर्मुखी होना होगा। पात्रता को हमेशा बना के रखना है। ध्यान रहे हमारे चित्त में हमेशा विकार आते जाते हैं पर हमें निर्मल और निर्दोष रहना होगा। इतना निर्मल कि आंखे भर आए उसे याद करके। छोड़ दो अपने आप को उसके सहारे। जियो वर्तमान में हमेशा उसको याद करते हुए की हमारा रोम रोम ये कह उठे –

नजर में अब कोई ठहरता नहीं,

ये क्या कर दिया तूने नजर मिला के।।।

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