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अच्छे दिन का अर्थशास्त्र

 

विख्यात अंग्रेज-अमेरिकी राजनैतिक कार्यकर्ता, दार्शनिक और राजनैतिक विचारक थॉमस पेन ने कहा था: ”हमारे अन्दर इतनी शक्ति है कि हम विश्व को पुन: आरम्भ कर सकते हैं।’’ लेकिन यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकारों को कदाचित ऐसा नहीं लगा। उन्होंने कुछ चुटकी भर कदम उठाकर यह उम्मीद कर ली कि इससे क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा। जहां उन्हें निर्भीक होना चाहिए था, वहां वे विनम्र हो गए। जहां उन्हें भविष्य को नई निगाहों से देखना चाहिए था, वहां वे भूतकाल के पन्ने पलटते रहे। जहां उन्हें आर्थिक नीतियों के वर्गीकृत सतहों को तोडऩा चाहिए था, वहां वे ऊपरी मृत सतह को चिपकाते रहे। लेकिन राजग सरकार द्वारा पिछले सप्ताह संसद में प्रस्तुत किए गए रेलवे और आम बजटों ने देश की जनता के हृदयों में आशा की उम्मीदें जागृत की हैं, क्योंकि वाइब्रेंट भारत बनाने के लिए वे कोई कसर उठा न रखेंगे।

रेलवे बजट खुद के लिए और देश के लिए चुनौतियों भरी रूपरेखा दर्शाता है। यह खुशी की बात है कि सरकार ने राष्ट्र की प्रगति में रेलवे के महत्व को पहचाना है। जहां बड़े शहरों में मौजूदा रेल टर्मिनल की जीवनरेखा समाप्ति की ओर है, वहीं रेलवे अब सेटेलाइट टर्मिनलों की ओर अग्रसर हो रही है। द्रुतगति की बुलेट टे्रनें, स्टेशनों और चुनी गई ट्रेनों में वाई-फाई कनेक्टिविटी, खाद्य सामग्री के गुणवत्ता से परिपूर्ण पैकेट, शुद्ध जल, मौजूदा मार्गों पर नई ट्रेनों की शुरूआत आदि जैसी बहुत सारी योजनाओं और प्रस्तावों से बजट भरा पड़ा है। भारत का बुनियादी ढांचा बहुत खराब है जबकि देश की भारी जनसंख्या की मांग है कि भारत में व्यापक, कुशल, पर्यावरण-मैत्री, एकीकृत सड़क, रेल, समुद्र और नदी जल एवं वायु परिवहन का बुनियादी ढांचा हो। इसके बगैर वित्तीय और पारिस्थितिक लागत बहुत अधिक आएगी।

दूसरी ओर, वित्त मंत्री अरूण जेटली ने हजारों करोड़ रूपयों का प्रावधान 100 स्मार्ट शहरों, गंगा नदी परियोजना, खेल विश्वविद्यालय, पूर्ण स्वच्छता, ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत सप्लाई बढ़ाने के लिए दीन दयाल ग्राम ज्योति योजना, एम्स, आईआईएम, कृषि के लिए बुनियादे ढांचे के लिए कोष, मदरसों का आधुनिकीकरण, तकनीकी विकास कोष, मौसम सुधार के बुनियादी ढांचा, युद्ध स्मारक और युद्ध संग्राहलय, मथुरा और आगरा जैसे शहरों की विरासत सुरक्षित रखने और नदियों को जोडऩे आदि के लिए किया है। यहां इस बात का उल्लेख करना उचित होगा कि एनडीए सरकार को देश की अर्थवव्यस्था बेहद खराब हाल में मिली है। यद्यपि सरकार सख्त कदम उठाने के लिए तैयार है, लेकिन इस बात की संभावना है कि मौजूदा आर्थिक हालात और खराब मानसून नई सरकार को ऐसा करने की अनुमति न दे। इस परिदृश्य में भी नई सरकार अगले तीन-चार वर्षों में 7-8 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर का लक्ष्य प्राप्त करने का संकल्प रखती है, जिसके लिए अधिक संसाधनों को पैदा करने की जरूरत है। यद्यपि 4.1 प्रतिशत के राजस्व घाटे का लक्ष्य चुनौतिपूर्ण है, लेकिन सरकार ने इस चुनौति को स्वीकार कर लिया है। इस परिप्रेक्ष्य में खर्चों पर नजर रखने के लिए व्यय प्रबंधन आयोग का गठन किया जाएगा और सब्सिडी की पूरी तरह समीक्षा की जाएगी। खासतौर पर खाद्य और तेल सब्सिडी की समीक्षा होगी। कश्मीरी शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए 500 करोड़ रूपयों का प्रावधान बजट में किया गया है। इन कदमों की प्रशंसा की जानी चाहिए। ये फिलहाल प्रारंभिक कदम हैं और दिशापूर्ण भी हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलेगा। बजट में रक्षा के लिए 2.29 लाख करोड़ रूपए का प्रावधान है और बीमा तथा रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश को 49 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा गया है। अरूण जेटली का यह पहला बजट है जो पूरी तरह से संतुलित है। उसका फोकस 100 स्मार्ट शहरों, विदेशी निवेश, सब्सिडी प्रबंधन आदि पर है। यह प्रशंसनीय है। आने वाले दिनों में हम उम्मीद कर सकते हैं कि वित्तीय अनुशासनहीनता की बुराईयां देश की अर्थव्यवस्था से समाप्त होंगी और समाज के सभी वर्गों, खासतौर पर भारत के गरीब से गरीब व्यक्ति के जीवनस्तर में सुधार सुनिश्चित होगा। यद्यपि वित्त मंत्री ने अमीरों पर टैक्स बढ़ाने, दायरा चौड़ा करने के साथ ही सम्पति कर का सरलीकरण करने, और एस्टेट ड्यूटी या विरासत ड्यूटी पुन: शुरू कर संसाधन बढ़ाने के अवसर खो दिए। इसके अतिरिक्त पीपीपी प्रणाली पर अधिक भरोसा करने के अपने नुकसान हैं, क्योंकि अन्तिम उपभोक्ता को इसमें खराबियां ही मिलती हैं। अपने संसाधनों के साथ सही साझेदार तलाश करना भी आसान नहीं है।

विचारों और सामग्री से भरा यह एक मिलाजुला बजट है, जिसमें एनडीए सरकार की मंशा और दिशा अच्छी दिखाई देती है। यह उम्मीदों से भरा बजट है। करों की दरें नीचे करने और टैक्स का दायरा बढ़ाना राजस्व एकत्र करने के लिए प्रगतिशील कदम है, जिससे उद्योगों के विकास के लिए टैक्स प्रेरक माहौल बनेगा। अब समय आ गया है कि बाह्य दबावों से अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से बचा कर पिछले दो सालों के विपरीत भारत के विकास दर को गति दी जाए, यद्यपि कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने के लिए भविष्य के बजटों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत होगी। राज्यों को ई-प्रणाली स्थापित करने और उसे बनाए रखने में सहायता करने के साथ ही ई-गर्वनेंस को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। लेकिन भाजपा की नई सरकार से यह उम्मीद करना कि वह एक ही महीने में ठोस योजनाओं के साथ आगे आ जाए या सभी समस्याओं को तुरन्त हल कर दे तो यह खुद को भुलावे में रखने जैसा होगा। बेकार की कांग्रेस सरकार को देश ने दस साल तक झेला है। यदि निवेशकों (घरेलू या विदेशी) का विश्वास भी बहाल हो जाए तो आधी समस्या तो यूं ही हल हो जाएगी। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि यह बजट सरकार में समाज के सभी वर्गों का विश्वास बहाल करेगा।

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