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सहजता का सौरभ मानवता का उजास

मानव जीवन का मूल्यांकन सहज कार्य नहीं है। युग.युगान्तरों से इस रहस्य को समझने तथा मानव के व्यक्तित्व निर्माण में देशए कालए संस्कृति और परम्परा के साथ ही राष्ट्रीयए सामाजिकए आध्यात्मिकए धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियों का विशेष महत्व रहा हैए इन सबका सामंजस्य ह ी मानव जीवन का आधार है।

वर्तमान युग में भौतिकता के बढ़ते चरण और धन का असीमित प्रभावध्प्रहार जिसकी संज्ञा श्अर्थयुगष् दी जा सकती है। सम्पन्न और सम्पन्नता के आयाम बदल रहे हैं। हमें विरासत में मिली सांस्कृतिकए आध्यात्मिक परम्पराओं और मर्यादाओं पर धनबलए छलबल और बाहुबल अपनी प्रबलता और दुष्टता से हमारे आचार.विचारों को प्रभावित कर रहे हैं। हमारी अपनी अस्मिताध्जीवन के आधार जैसे सभी जीवों में समता बुद्धि रखनाए कैसी भी घटना हो जाये उससे अधीर न होकर वातावरण में धैर्य रखनाए करूणा भाव से मानव.मानव के प्रति प्रेमए सौहार्द और सद्भाव को विकसित करना आदि इस भौतिक अर्थ युग और भौतिकता की दौड़ में मूल्यहीन हो रहे हैं। विसंगतियों का निराकरण और स्थिरता के जीवन में सहजता को विकसित करना होगा।

सहज शब्द में जीवन की सरलताए समताए जीयो और जीने दोए सद्भावए सहिष्णुताए अपने परिणामों की निर्मलता आदि सभी भावनायें गर्भित हैं। यही जीवन की सहजता के आधार हैं।

मानव की स्थिति अन्य प्राणियों से सर्वथा भिन्न है। सृष्टा ने उसे विवेक सहित अनगनित क्षमताओं से सम्पन्न बनाया है। हम सभी अपनी शारीरिक बलिष्ठताए मानसिक दक्षताए प्रतिभा एवं आत्मिक प्रखरता के रूप को साकार करने में हर दृष्टिकोण से सक्षम हैं। अपनी स्वाभाविकता से जो कर्म सुख की अनुभूति के साथ अपनी अखण्ड प्रसन्नता से हो सके वही श्सहज्य होता है। निहित स्वार्थों के दायरे से हटकर अपनी भावना और भावों को तथा क्षणिक वस्तुओं के भोगध्उपभोग में न उलझकर विवेक और विचार द्वारा ऊपर उठ जाने पर अपने अज्ञान को नष्ट कर चेतना द्वारा स्वतन्त्र हो जाना ही सरलता है। जब यही सरलताध्सहजता आत्मीयता के रूप में विकसित होती है तब मानव दूसरे के दुरूख को अपना दुरूख और दूसरे के सुख को अपना सुख माननेध्समझने लगता है। अपने अधिकार के साथ ही मानव.मानव के प्रति कत्र्तव्यों का बोध जीवन की सहज वृत्तिध्सहजता पर ही आधारित है।

सहजता प्रकृति के प्रत्येक जीवनध्प्राणी में निहित है। पशु.पक्षीए पेड़.पौधोंए डाली.फूल सभी प्रकृति की गोद में सहजता से फलते.फूलते हैं। विभिन्न आकार.प्रकार से कोई छोटा.बड़ा तो कोई ऊपर.नीचे अपने ढंग से खिलते हैंए जिनमें कोई भेदभाव नहीं रहता।

मानवए प्रकृति की श्रेष्ठ कृति है। उसकी प्रकृति और सहजता के साथ विवेक और विचार शक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। इसी के आधार पर श्जनमानस्य के दर्शनए ज्ञानए चारित्रए प्रेमए सौहार्दए उत्थान.पतन आधारित हैं।

किसी ने ठीक ही कहा है कि हमारे विचार हमें ही लौटकर मिलते हैं.प्रेम करेंगे तो प्रेम मिलेगाए घृणा करेंगे तो घृणा मिलेगीए विश्वास करेंगे तो विश्वास मिलेगाए निन्दा करेंगे तो निन्दा मिलेगीए ईष्र्या करेंगें तो ईष्र्या मिलेगीए गाली देंगे तो गाली ही मिलेगी। जीवन के प्रति जैसा दृष्टिकोण होगा वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बनेगा। हमारा कर्म और पुरुषार्थए विवेक और विचार के साथ होने पर ही सहज रूप होना चाहिए तथा हमारे स्वभाव की अनुकूलता / प्रतिकूलता का आधार बनकर जीवन को सफल बनाता है।

गणि राजेन्द्र विजय

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