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खलनायकी के शिखर पुरुष प्राण

इस इलाके में नये आये हो साहब?…वरना शेर खान को कौन नहीं जानता। शेर खान के इस प्रसिद्ध डॉयलॉग से प्रकाश मेहरा की सुपरहिट एक्शन फिल्म जंजीर से अमिताभ बच्चन ने एक नये अवतार के रूप में अपनी सफलता की शुरुआत की थी वरना इससे पहले वे फ्लॉप अभिनेता थे।हिन्दी सिनेमा के सर्वोच्च विलेन या खलनायक प्राण की पूर्व पहचान प्राण किशन सिकंद के रूप में थी। लेकिन प्राण के रूप में उन्होंने हिन्दी सिनेमा में सुपर खलनायिकी की और उन्हें हिन्दी सिनेमा का पहला और आखिरी सुपर स्टार विलेन कहा जा सकता है। इसी सुपर विलेन को 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा में भारत सरकार द्वारा उनके फिल्मों में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। 3 मई 2013 को बॉलीवुड के शिखर ‘खलनायक’ को भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान दिया जायेगा जिसे हम फिल्म उद्योग में उनके लाइफ टाइम कार्य के रूप में देखते हैं।इससे पूर्व दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित होने वाले शीर्षस्थ फिल्मी हस्तियों में शामिल थे- पृथ्वीराज कपूर, देवानंद, सत्यजीत रॉय, राज कपूर, अशोक कुमार, लता मंगशेकर, यश चोपड़ा। ये कुछ नाम हैं लेकिन इसकी शृंखला में 44वें पायदान पर प्राण सम्मानित हो रहे हैं जिन्हें दस लाख रुपये की नगद राशि एवं प्रशस्ति पत्र प्रदत्त किया जायेगा। देविका रानी इस सर्वोच्च सम्मान को पाने वाली पहली फिल्म अभिनेत्री थी।
1940 से अपनी फिल्मी कैरियर की शुरुआत करने वाले प्राण ने 1960 के दशक में अपनी खलनायिकी के ऐसे प्रतिमान गढ़े कि प्राण नाम से ही लोग भयभीत हो जाते थे। उस समय के दर्शकों में प्राण की खलनायिकी को लेकर जबर्दस्त भय व्याप्त था। जनजीवन में उनकी खलनायिकी के तेवर बहुत चर्चित रहे और इसकी मिसाल है कि कोई भी भारतीय परिवार अपने यहां पैदा होने किसी बच्चे का नाम प्राण भूलकर भी नहीं रखना चाहते थे।पुरानी दिल्ली की गलियों में पैदा हुए प्राण एक धनाढ्य पंजाबी परिवार से थे। फोटोग्राफर बनने की चाहत रखने वाले प्राण की जीवन दिशा को एक दुकान ने बदल दिया।लेखक वली मुहम्मद वली से उनकी पहली मुलाकात ने ही उन्हें उनके द्वारा निर्मित होने वाली पंजाबी फिल्म यमला जाट (1940) में उन्होंने पहली भूमिका की। उसके बाद उन्होंने पहली हिन्दी फिल्म खानदान (1942) में काम किया। इस फिल्म में उन्होंने एक रोमांटिक हीरो का रौल अदा किया था और इस फिल्म में हीरोइन नूरजहां थी।

लाहौर में प्राण ने 1942 से 1946 के बीच में 22 फिल्मों में काम किया और उसके पश्चात भारत विभाजन के समय वे बम्बई आ गए। खलनायक के रूप में जिद्दी और बड़ी बहन(1949) जैसी फिल्मों से उन्हें प्रारंभिक सफलता मिली, उसके बाद खलनायक की भूमिका में उन्हें अपार सफलता मिली।

दिलीप कुमार के साथ आजाद (1955) ,देवदास (1955), मधुमति (1958), दिल दिया दर्द लिया (1966), राम और श्याम (1967), और आदमी (1968)। देवानंद के साथ जिद्दी (1948), मुनीमजी (1955), अमरदीप (1958), जब प्यार किसी से होता है (1961) और राजकपूर के साथ आह (1953), चोरी चोरी (1956), जागते रहो (1956), छलिया (1960), जिस देश में गंगा बहती है (1960), दिल ही तो है (1963) जैसी फिल्मों में 1950-60 के दशक में लीड रौल की भूमिका की।

प्राण ने 1968 से 1982 के बीच अभिनेताओं से भी अधिक कीमत लेकर 70 के दशक में छोटे प्रोड्यूसरों के साथ कार्य किया। वे नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रकार की भूमिकाओं में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी। 50 के दशक में प्राण ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा को सबके सामने साबित कर दिया। वे जितने सकारात्मक भूमिकाओं में अपना प्रभाव स्थापित करते थे उतना ही उनका नकारात्मक रौल भी यादगार होता था। प्राण फिल्मी दुनिया की एक सुविख्यात फिल्मी हस्ती हैं जो सदैव अपने उत्कृष्ट और यादगार अभिनय के कारण से चर्चित रहे हैं। बरखुरदार हमारा भी जमाना था, कहने वाले प्राण एक समृद्ध और शक्तिशाली फिल्म अभिनेता से अधिक सच्चे इंसान हैं। ‘बरखुरदार फिल्मों में उनकी पहचान का पसंदीदा तकियाकलाम है। पदमभूषण सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने पर उनके चाहने वालों में खुशी का माहौल है।

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