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प्राचीन भारत में कर एवं दण्ड विधान

वर्तमान कर एवं दण्ड विधान के निर्धारण में हमारी प्राचीन अर्थव्यवस्था किस रूप में, किस तरह से और कैसे सहयोगी हो सकती है, इसी बात को आधार बनाकर डॉ. नागेन्द्र प्रसाद ने आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ‘प्राचीन’ भारत में कर एवं दण्ड विधान्य पुस्तक लिखी है। इस कृति में भारत में राजस्व प्रणाली की जो प्राचीन व्यवस्था थी उसका समग्रता से विभिन्न संदर्भों में प्रभावी ढंग से प्रस्तुतीकरण किया गया है। प्राचीन राजस्व प्रणाली को परिभाषित, व्याख्यायित और विश्लेषित करने वाले अनुभव प्रवण विचार इस कृति में सहेजे गए हैं। आज के आर्थिक-युग में यह पुस्तक वर्तमान राजस्व प्रणाली की सशक्त भूमिका तैयार करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकती है। आठ अध्यायों में विभक्त इस ग्रंथ में विभिन्न संदर्भों में राजस्व प्रणाली का अवलोकनए प्राचीन भारत की राजस्व प्रणालीए राजकीय आय का स्रोत एवं स्वरूपए राजकीय व्यय का स्वरूपए राजस्व प्रणाली की रूप-रेखाए राजस्व प्रणाली में शासन की विभेदकारी नीति एवं राजस्व वंचना की स्थिति एवं दण्ड व्यवस्था और उनके संबंध में व्याप्त भ्रांतियों का निराकरण तथा मौलिक चिंतन के साथ-साथ सार्थक उद्भावनाएं प्रस्तुत की गई है।

इस ग्रंथ के माध्यम से राजस्व प्रणाली को आर्थिक समृद्धि एवं संतुलित शासन व्यवस्था की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक शांतिपूर्ण एवं प्रगतिमूलक शासन व्यवस्था में राजस्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है और इसका सशक्त धरातल तैयार करने में इस पुस्तक की सार्थक भूमिका है। इस पुस्तक में संकलित विचारों से वर्तमान राजस्व प्रणाली को नया आलोक प्राप्त होगा और अर्थशास्त्राए इतिहास और समाजविज्ञान के अध्येता और पाठकों को निस्संदेह इससे लाभ प्राप्त होगा। डॉ. नागेन्द्र का प्रस्तुत सृजन मौलिक प्रतिभा का एक निदर्शन है। नवीन और प्राचीन राजस्व प्रणाली का यह सजीव चित्रण है जो देता है नया प्रकाशए प्रबल आश्वासन और नया विश्वास।

लेखक ने प्रस्तुत पुस्तक में विस्तार ने अनेक प्राचीन व अर्वाचीन धार्मिक ग्रंथों, शास्त्रों, नीतिसार व स्मृतियों से उदाहरण लेकर यह सिद्ध किया गया है कि भारत में राजस्व प्रणाली की व्यवस्था जो प्राचीन समय में थी उसी का विस्तार रूप वर्तमान राजस्व प्रणाली है। उस व्यवस्था को कब क्यों, कैसे, कितना, कहां और किस तरह बनाया व लागू किया गया इसका सम्यक विश्लेषण विस्तार से किया गया है। प्राचीन राजस्व प्रणाली में कितनी ईमानदारी थी इसका भी आकलन किया गया है।

प्रस्तुत पुस्तक आधुनिक कर प्रणाली को समग्र परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने के लिए एक सार्थक हस्तक्षेप है जो प्राचीन मूल्यों को युगानुरूप नयी दिशा देने में सपफल है। डॉ. नागेन्द्र की यह एक महत्वपूर्ण कृति है जिसमें उन्होंने राजस्व प्रणाली की व्यक्ति के संदर्भ में समग्र विवेचना की है।सचमुच प्रस्तुत कृति का प्रकाशन सरकार के आधुनिक कर नीति-निर्धारण मूल्य मानकों को बदलने की नई दृष्टि एवं दिव्य दृष्टि प्रदत्त करती है। कर प्रणाली राष्ट्र और व्यक्ति के लिए खतरा न बनेए इसकी चेतावनी देती है।

ललित गर्ग

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