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आज गौए गंगाए गौरी और गीता पर सोचने का समय

आप लंबे समय से श्याम बाबा के भक्ति गीतों की रचना कर रहे हैं। आपको इसकी प्रेरणा कहां से मिली?
1984 से मैंने भजन-कीर्तन शुरू किया था। मेरा जन्म राजस्थान के नवलगढ़ए जिला झूंझनू में हुआ। जब मैं 6 महिने का था तो मेरे माता-पिता बिहार के जिला दरभंगा जाकर बस गए। फिर मेरा सारा पालन-पोषण और शिक्षण बिहार में ही हुआ। मैने बोटनी में बी.एस.सी ओनर्स की। श्याम बाबा मेरे कुल के देव हैं। जब 1972 में मेरे पिताजी को हार्ट अटैक आया। उस समय वह जयपुर में थे। वह आषाड़ शुक्ल पक्ष द्वादशी का दिन था। जब ये खबर आई उस दौरान मैं दरभंगा में था। इस खबर से मैं विचलित हो गया। मैने अपने कुलदेव श्याम बाबा से प्रार्थना की, हालांकि मेरा उनकी ओर कोई झुकाव नहीं था क्योंकि मैं शंकर भगवान का भक्त हूं और वह मेरे इष्ट भी हैं। लेकिन उस दिन मैने श्याम बाबा से अपने पिता के लिए प्रार्थना की। मैने कहा कि मैं आपकी सत्ता को तब मानूंगा, जब मेरे पिताजी ठीक होकर घर आएं। दरअसल उन दिनों इलाज भी इतना सुलभ नहीं था। बाबा ने मेरी विनती सुन ली और उन्हें 10 साल का और जीवन दान मिला। आसाड़ शुक्लपक्ष द्वादशी के दिन 1982 को बाबा की जोत के बाद।
पिताजी इस लोक से चले गए। फिर जब भी मैं अपने कमरे में जाता था तो मुझे कृष्ण की छवि महसूस होती,मुझे ऐसा लगता कोई मुझे बार-बार स्पर्श करके जा रहा हो। कोई सर-सराहट सी हो रही है। मैं समझ नहीं पाता था कि यह क्या हो रहा है। दो-तीन महीनों के बाद जब भी मैं पिताजी की तस्वीर को देखता था तो मुझे कुछ ऐसा लगता कि कोई मेरी आत्मा से पूछ रहा है कि मैंने तुम्हारे कहने पर तुम्हारे पिता को पूरे 10 वर्ष का जीवन दान दिया है। आखिर में मैंने प्रभु से ही कहा कि हे प्रभु! तुमने मेरे पिता को दस वर्ष का जीवन दान दिया। इसलिए एक पुत्र के नाते मैं अपना सम्पूर्ण जीवन आपको अर्पण करता हूं। इस जीवन से आपको जो भी सेवा लेनी होए आप ले सकते हो। उसके बाद मैंने 1982 से बाबू जी की याद में, हमने हर रविवार दो घंटे का ग्यारह भजन करने का नियम बनाया। मैं चाहे रहूं या न रहूं मेरी पत्नी हर रविवार को यह भजन करती है। विज्ञान का छात्र होने के बावजूद आज मैं अपने हाथों से भजन लिखने लगा हूं। जब संत इन्हें पढ़ते हैं तो वे मुझसे पूछते हैं कि आपने क्या लिखाए यह कैसे लिखा है। मैं कहता हूं कि मुझे कुछ नहीं मालूम! केवल कलम ही मेरे हाथ में होती है, मेरा जरा भी प्रयत्न इसको लिखने में नहीं लगता और मेरे श्याम बाबा ही मुझसे सब कुछ लिखवाता हैं
भजन कीर्तन के साथ आपके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन की यात्रा किस प्रकार चलती रही?
उसके बाद जहां कहीं भी कीर्तन आदि होता था, लोग मुझे ले जाने लगे। लोगों को मेरे कीर्तन पसंद आने लगे। मैं अपने जिले से बाहर जाने लगा। धीरे-धीरे राज्य से बाहर जाने लगा। 1984 से मैं जगह-जगह कीर्तन करने लगा। हालांकि मेरी पृष्ठभूमि व्यापारिक है लेकिन मुझे भजनों का पैसा लेना बिलकुल गवारा नहीं था। मैं रेदास और कबीरदास जी को अपना आदर्श मानता हूँ। जैसे कि रैदास चमड़े आदि काम करते थेए चप्पल जूते बनाते थे। कबीरदास जी वस्त्र आदि बुनते थे। मैने भी अपने लिए एक छोटा सा व्यवसाय शुरू किया। उस व्यवसाय से ही जो आमदनी होती थी, केवल उसी से ही अपने गृहस्थ जीवन का पालन किया। अगर कोई भजनों के बदले में दुनिया का ऐश्वर्य भी दे दे तो वो मुझे स्वीकार नहीं है।
जिसके पास हरि की पूंजी, वो नर तो बड़भागी है।
जितनी होती खर्च ये पगले उतनी बढ़ती जाती है।
वाह री मेरी किस्मत तूने कैसा काम पटाया है।
तीन लोक के सर्वेश्वर से तूने मुझे मिलाया है।
नंदू फिर क्या कमी रहे जब नारायण तुझे मिल गया रे।

वह वास्तव में बहुत ही अच्छी कृपा कर रही है। गुजरात में ग्वालीया स्वीट्स प्राइवेट लिमिटेड को दोनों बच्चे देखते हैं और उसे एक कारपोरेट आफिस की तरह चला रहे हैं।

व्यवसाय से समय निकाल कर आपकी जो भक्तियात्रा चल रही है, उसमें और कौन-कौन-से पड़ाव आपने पार किए?
मैने करीब 15 सौ भजन लिखे हैं। बाबा मुझे लिखाते हैं और मैं गाता हूं। इसके बाद इसी क्रम में 1995 मैं मुझे आदेश हुआ कि मुझे बाबा का प्रचार करना है। श्याम गुणगान यात्रा के रूप में। मुझे कुछ नहीं पता कि यह गुणगान यात्रा क्या होती है। पर यह यात्रा निकली औऱ मैंने इसके तहत 38 हजार किलोमीटर की यात्रा की। 589 जगह मैंने कीर्तन किया। दक्षिण छोड़ पूरे भारत के 16 प्रांतों में मैंने कीर्तन किया। नेपाल में भी कई बड़े शहरों में मैने बाबा का प्रचार-प्रसार किया। इसके बाद बाबा की ध्वजा लेकर वर्ष 2005 और 2007 में मैं कैलाश मानसरोवर गया। और अब तीसरी बार इस वर्ष मैं फिर इस यात्रा के लिए जा रहा हूं। 2007 में सिंगापुर, बैंकॉक की यात्रा की। फिर 2012 में यूरोप गया और अब 2014 में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जाने की योजना बन रही है। मैं भाग्यशाली हूं और यह बाबा का प्यार है जिस कारण आज मुझे करोड़ो लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष जानते हैं। लोगों के प्यार के कारण ही मैं 65 वर्ष की उम्र में भी वर्षभर में 150 से 200 कीर्तन करता हूं।

आपकी आगे की क्या योजनाएं हैं?
मैं तब तक कीर्तन करूंगा जब तक भगवान मुझे ऊर्जा देंगे। लेकिन अब मैं यह सब गाय की सेवा के लिए करूगा। मैंने निश्चय किया है कि जहां जाऊंगा वह वहां का पैसा होगा और वह पैसा वहीं की गोशालाओं को दिया जाएगा। न मैं कोई ट्रस्ट बनाऊंगा न पैसा अपने पास रखूंगा। मेरा काम केवल यह निरीक्षण करने का है कि जिस गोशाला को पैसा दिया जा रहा है वह उसके उपयुक्त है भी कि नहीं। यह राशि किसी कमरे में न देकर के मंच पर लोगों के बीच घोषणा करके दी जाएगी। अब जब तक मेरी सांस में सांस है मैंने गोशालाओं को अपना जीवन समर्पित कर दिया है। आज गौ, गंगाए गौरी और गीता पर सोचने का समय आ गया है।

आपके इस सामाजिक कार्यों से आपके परिवार को कोई तकलीफ या आपत्ति नहीं होती?
नहीं, इसके उलटे मेरा परिवार काफी सुख-शांति से जीवन व्यतीत कर रहा है। मेरे इस कार्य के लिए सबसे अधिक श्रेय मैं अपनी पत्नी को देता हूं क्योंकि उसके त्याग के बिना मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता था। मैं महिनों बाहर रहता था। लेकिन उसने इस पर कभी कोई एतराज नहीं किया। इस सेवा का श्रेय मैं केवल अपनी पत्नी को ही दूंगा। वहीं मेरे दोनों पुत्र हैं जो मेरी भावना का इतना आदर करते हैं कि मेरी किसी बात को वे एक भगवान का आदेश मानते हैं। मैंने कभी भगवान से कुछ नहीं मांगा है मांगा है तो बस केवल इतना कि

फूल बिखरे हैं इनको समेटो प्रभु,
डोर की कमी है,डोर दे दो प्रभु
नंदू देखू मैं ऐसा सवेरा कि तेरे सबके लब मुस्कुराए हुए।

मैं तो हर इंसान के होंठों पर मुस्कान देखना चाहाता हूं प्रभु। हे नारायण तुम जन-जन पर इतनी कृपा करो कि हर इंसान इतना प्रसन्न हो की वह हमेशा मुस्कुराता हुआ रहे। मैंने श्याम बाबा से अपने लिए कभी कुछ मांगा ही नहीं। फिर भी उन्होंने मुझे बहत कुछ दिया है। मैं उस योग्य नहीं हूं जीतनी लोगों ने मुझ पर कृपा की है। मैं समझता हूं कि मेरे पास कोई योग्यता नहीं है। जब मैं अकेला बैठता हूं तो देखता हूं कि मैं तो अवगुणों की खान है। फिर भी मेरे सरकार मेरे इन अवगुणों को भूल कर के मुझे इतना प्यार करते हैं। मुझे अपने सीने से लगा कर रखते हैं कि मैं तो धन्य हो गया।

उदय इंडिया के पाठकों को कुछ कहना चाहेंगे?
उदय इंडिया के माध्यम से यह लेख लाखों लोग पढ़ेंगे। जो इसे पढ़ेंगे और जो नहीं भी पढ़ेंगे, सभी पाठकों के सुखद जीवन की मंगलकामना बाबा श्याम से करता हूं।

अंजु गुप्ता

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