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आसान राह न तो राहुल के लिए, और न मोदी के लिए

देश की जनता ने 15वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनावों में 16 मई 2009 को यूपीए-2 को पांच साल शासन करने का जनादेश दिया था और डॉ.मनमोहन सिंह ने एक बार फिर 22 मई 2009 को देश के शासन की बागडोर संभालने के लिए राष्ट्रपति भवन में शपथ ली। जिसके अनुसार कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए-2 को 16 मई 2014 तक शासन करने का कार्यकाल मिला था। 16 मई 2014 आने में अभी एक साल से अधिक समय बाकी है लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में देश के राजनीतिक दलों को अगले संसदीय चुनावों के आने की आहट सुनाई देने लगी है।

ऐसा नहीं कि यह पहली बार हो रहा हो कि वर्तमान सरकार का कार्यकाल पूरा होने से एक साल से भी अधिक समय बाकी होने के बावजूद आम चुनावों की चर्चा शुरू हो गई। पिछली सरकारों, खासतौर पर जब

से गठबंधन की सरकारें बननी शुरू हुई हैं, तब से सरकार का गठन बाद में होता है,चर्चा पहले शुरू हो जाती है कि सरकार चलेगी कितने
दिन?
लेकिन अब जो राजनीतिक माहौल बना है उसमें हो रही चर्चा पिछले बार की चर्चाओं से भिन्न है। इस बार दिलचस्प यह है कि चर्चा के केन्द्र में यह नहीं है कि देश की जनता किस गठबंधन को शासन सौंपेगी। चर्चा के केन्द्र में यह है दिल्ली के सिंहासन पर कौन बैठेगा? इस चर्चा में दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों को चुनौती केवल अपने विपक्षी दलों से नहीं है, बल्कि अपने ही खेमे के सहयोगियों से भी है।
इसमें दिलचस्प यह भी है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र में जनादेश का इंतजार नहीं किया जा रहा। खुद ही सिंहासन के लिए खुद को पेश किया जा रहा है। ”कौन बनेगा प्रधानमंत्री? के सवाल के जवाब में जितने नाम सामने आते हैं,उनमें आज के मुख्य प्रतिपक्षी दल भाजपा के ”प्रतीक्षा में बैठे प्रधानमंत्री सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी का कोई उल्लेख नहीं आता। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन ;राजगद्ध ने पिछले चुनावों में आडवाणी को श्श्प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। आडवाणी ने अपने किसी कदम से यह संकेत नहीं दिया कि वह भावी प्रधानमंत्री की दौड़ में नहीं हैं। उनका स्वास्थ्य भी उनकी आयु के लोगों की तुलना में बहुत अच्छा है। लेकिन वह उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जब श्श्कोई जिम्मेदारी संभालने के लिए स्वास्थ्य नहीं बल्कि अन्य कई कारण गिने जाते हैं।
बहरहाल, आडवाणीजी ने देश के प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर होने का कोई संकेत न दिया होए लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब देश के भावी प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के नाम की चर्चा चलती हैए तो लोगों को फिलहाल उनके नाम का ध्यान नहीं आता। उन्हें ”चन्द्रगुप्तश्” के स्थान पर ”चाणक्य” की सम्मानजनक पदवी पर देखा जाने लगा। ”किंग” के स्थान पर ”किंगमेकर” माना जाने लगा है।

प्रधानमंत्री पद पर जिन नामों की चर्चा होती हैए उनमें वर्तमान यूपीए की ओर से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन िसंह और पार्टी के युवा नेता राहुल गांधी का नाम रहता है जबकि राजग की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदीए बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमारए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराजए राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरूण जेटलीए और कभी कभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का नाम सुनाई देता है। चर्चा को अधिक दिलचस्प बनाने के लिए जब तीसरे मोर्चे का नाम आ जाता है तो समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह और बहुजन समाज पार्टी की मायावती का नाम भी कहीं धीमे से सुनाई दे ही जाता है।

वैसे राजनीतिक चर्चाओं को गर्म करने वाले नाम नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी का रहता है। लेकिन जब इन नामों की चर्चा शुरू होती है तो उनके प्लस प्वाइंटों की बात कम बल्कि नेगेटिव प्वाइंटों से उनके सामने खड़ी चुनौतियों

की बात पहले शुरू हो जाती है। उन चुनौतियों में से भी विपक्ष की चुनौती नहींए बल्कि अंदरूनी चुनौती पहले सामने आती है।

डॉण् मनमोहन सिंह किन हालात में किस प्रकार प्रधानमंत्री पद पर पहुंचे इसे सभी जानते हैं लेकिन यह श्रेय उनके साथ जुड़ गया है कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंण् जवाहर लाल नेहरू के बाद वह पहले नेता हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री पद पर अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद दूसरी बार शपथ ली।

माना तो यह जाता है कि जिस सौहार्द और श्श्मजबूरीश् में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद पर उन्हें बैठा कर श्श्त्याग की प्रेरक मूर्तिश् बनींए उसको ध्यान में रख कर मनमोहन िसंह को जब भी संकेत दिया जाएगाए वह कांग्रेस हाईकमान का आदेश मान कर राहुल के लिए श्श्स्वयं रास्ता छोड़ देंगे।

लेकिन हाल ही में कांग्रेस के दो कद्दावर महासचिवों से जो स्पष्ट संकेत मिले उनसे लगता नहीं कि राहुल के लिए कांग्रेस में सब कुछ मखमली कालीन जैसा है। एक महासचिव ने सरकार और पार्टी के बीच दो ”शक्तिकेन्द्रो” के सिद्धान्त की वकालत की तो दूसरे ने उसी का खंडन कर दिया।

दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी की बात करें तो बेशक उनकी अपनी पार्टी से खुलकर अभी ऐसे संकेत उन्हें नहीं मिले हों लेकिन राजग से तो बहुत पहले से ये संकेत मिल रहे हैं।

आज के वक्त में कोई राजनीतिक दल यह दावा करे कि देश पर शासन करने वाले जादुई आंकड़े तक वह अकेले दम पहुंच सकता हैए तो उसके लिए तो यही कहना उचित होगा कि वह मूर्खों केे स्वर्ग में रह रहा है। देश का राजनीतिक परिदृश्य आज ऐसा है कि गठबंधन की राजनीति ही सच्चाई है। भाजपा नेता प्रमोद महाजन तो यहां तक कहा करते थेए 2025 तक तो गठबंधन की राजनीति ही देश पर शासन की सच्चाई रहेगी। यह नहीं समझ आया कि प्रमोद महाजन ने 2025 तक की समय सीमा किस आकलन से तय की थी लेकिन आज वास्तविकता यही है कि कोई चुनावी आंधी तो अकेले दम किसी राजनीतिक दल को सत्ता के श्श्जादुई आंकड़ेश् तक पहुंचा सकती है लेकिन संसद में जितने राजनीतिक दल हैंए वे एक दल को तो सत्ता नहीं सौंप सकते।

ऐसे में प्रधानमंत्री बनने का स्वपन केवल उसी को लेना चाहिए जो गठबंधन में अन्य घटक दलों को भी स्वीकार्य हो। हालांकि मोदी को लेकर जनता उत्साहित दिखाई देती हैए लेकिन उनके अपने घर राजग में ही घटक दलों की स्वीकार्यता पर बड़ा सा प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। यहां तक कि राजग के संचालक जनता दल ;यूद्ध ही मोदी के नाम से बिदक रही।

दिलचस्प यह है कि जनता दल ;यूद्ध बिहार में मोदी के दल.भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर सरकार चला रही है लेकिन गुड़ खाएए गुलगुलों से परहेज की तरह मुख्यमंत्री नीतिश कुमार मोदी के नाम से ही बिदक जाते हैं। बिहार में विधानसभा चुनावों में तो उन्होंने मोदी को जैसे बिहार आने के लिए अमेरिका की तरह श्श्वीजाश् देने से इंकार ही कर दिया था। यहां तक कि 2010 में पटना में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान रखे गए प्रीति भोज को नीतिश कुमार ने इस लिए रद्द कर दिया कि उन्हें मोदी के आने की सरसराहट सुनाई दे गई थी।

जनता दल ;यूद्ध ने तो अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान भाजपा को इस बारे में सतर्क भी कर दिया। उसकी तरफ से लगातार संकेत दिए जा रहे हैं कि यदि मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो जनता दल ;यूद्ध राजग से अपने संबंध तोड़ सकती है।

नीतिश कुमार गुजरात की प्रगति की तुलना में बिहार में विकास की गति को कहीं तेज सिद्ध कर रहे हैं। उन्हें मोदी के नाम से एलर्जी कम हैए बल्कि अपने मुस्लिम वोटों की चिन्ता अधिक है। वह खुद भी प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार दिखाई दे रहे हैं।

मोदी और नीतिश के बीच चल रही इस कुश्ती को भाजपा के अपने नेता भी मूक दर्शक बने देख रहे हैं। मोदी ने कब खुद को प्रधानमंत्री की दौड़ में खड़ा कर दिया उन्हें पता ही नहीं चला। अब उनके लिए स्थिति उनसे न तो निगलते ही बन रही हैए और न ही उगलते ही बन रही है।

श्रीकान्त शर्मा

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