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दिल्ली का सिंहासन किसका दावा भारी

राष्ट्रीय राजनीति में छत्रप की जंग जारी है। कांग्रेस पार्टी का एक बड़ा धड़ा अब राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप देखना चाहता है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवासए दस जनपथ से लेकर पार्टी मुख्यालय 24 अकबर रोड तक इसे लेकर बड़ी हलचल है। 2014 में होने वाले अगले आम चुनावों के लिए इससे कहीं कम अकुलाहट भाजपा मुख्यालय और नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय की भी नहीं है। लेकिन न ही कांग्रेस और न भाजपा इसे लेकर साफ तौर पर अपने कोई पत्ते खोलना चाहती है। देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बिना खारिज किए कांग्रेसी राहुल गांधी ;रागाद्ध कोए और वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की श्पीएम इन वेटिंगश् की दावेदारी पर बिना विराम लगाए भाजपा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ;नमोद्ध के विकल्प को आगे कर दिया है। नरेन्द्र मोदी सबको साधने की कला और अनुभव के चलते सब पर भारी हैं।

दरअसलए मोदी अब नरेन्द्र भाई मोदी से ऊपर उठ चुके हैं। वह अब एक ऐसे नेता के प्रतीक बन चुके हैं जिसके ऊपर कट्टर हिन्दुत्व के साथ.साथ विकास को वरीयता देने वाले अच्छे नेता की छाप भी है। उन्होंने तमाम कठिनाइयों के बावजूद गुजरात में एक अच्छा शासक होने का परिचय दिया है। संघ के लिए हिन्दुत्व उसकी अस्मिता से जुड़ा है। भाजपा श्राम मंदिर आंदोलन्य को धार देना मुनासिब नहीं समझ रही। इस आंदोलन के नायक के तौर पर उभरे पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी काफी उम्रदराज हो चले हैं। यद्यपि आडवाणी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास नहीं लिया है और उन्होंने पार्टी के एक निष्ठावान कार्यकर्ता की तरह कार्य करने की इच्छा जताकर नेतृत्व की अपनी संभावनाओं को जीवित रखा है। वहीं मोदी न केवल उम्र में उनसे काफी कमए शरीर से सुडौल और स्वस्थ हैं बल्कि युवाओं को रिझाने की कला भी उन्हें आती है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी संघ और भाजपा के एक बड़े धड़े के लिए उपयुक्त लग रहे हैं।

नरेन्द्र मोदी के नाम पर कांग्रेस में भी घबड़ाहट दिखती है। अक्तूबर 2001 से गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को अब तक आर्थिक घोटाले के मोर्चे पर नहीं घेरा जा सका है। उनके नेतृत्व में पार्टी दिसंबर 2002 और दिसंबर 2007 तथा 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत पाने में सफल रही है। गुजरात दंगों में भी मोदी की भूमिका को लेकर एसआईटी ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है। कोई व्यक्तिगत आरोप साबित नहीं हो पाया। ढेरों विरोधियों से घिरे मोदी समय के साथ मजबूत होकर उभरे हैं। अब उनके पास गुजरात में राज करने का अनुभव है। वह एक अच्छे प्रशासक के तौर पर जाने जा रहे हैं। उनके राज में गुजरात आर्थिक विकास के पैमाने पर लगातार आगे बढ़ा है। देश के नामी उद्योगपतियों के बीच भी मोदी ने विश्वसनीयता बनाए रखी है। वह देश में जितना चर्चा में रहते हैं उतना ही विदेश में उन्हें लेकर बहस.मुबाहिसा और चर्चा तेज रहती है। वह वीडियो कॉफ्रेंसिंग के जरिए अमेरिका में बैठे लोगों को न केवल संबोधित करते हैं बल्कि वाइब्रैंट गुजरात के माध्यम से अहमदाबाद को अंतरराष्ट्रीय पटल पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं। हालांकि कांग्रेस के नेता मोदी को गुजरात के बाहर का नेता नहीं मानते। मोदी को लेकर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंहए जनार्दन द्विवेदीए गुजरात के प्रभारी मोहन प्रकाश ऐसा दिखाते हैं जैसे उन्हें मोदी को लेकर कोई चिंता नहीं है। लेकिन मोदी का जिक्र आते ही कांग्रेस के नेताओं के बयानों में बेचैनी साफ झलकने लगती है। राहुल गांधी भारतीय उद्योग परिसंघ के कार्यक्रम में सधे अंदाज में रहने के बावजूद मोदी पर निशाना साधने से नहीं चूके। इस तुलना में राहुल गांधी को अभी बहुत कुछ साबित करना है। अभी वह पीछे खड़ी कांग्रेस की टीम के संरक्षण में संगठन को मजबूत बना रहे हैं लेकिन उनके अपने खाते में कोई बड़ी सफलता नहीं दर्ज हो पाई है। प्रशासनिक क्षमता के लिहाज से भी राहुल को अभी कुछ भी उल्लेखनीय नहीं कर पाए हैं। उनके पास कार्यालय में कामकाज का कोई ठोस अनुभव नहीं है। यद्यपि कांग्रेस के रणनीतिकार अभी चुपचाप तेल और तेल की धार देखने की रणनीति पर चल रहे हैं। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता का आकलन है कि मोदी अग्रिम पंक्ति में आने से मतों का ध्रुवीकरण होगा। भाजपा को बड़ा फायदा भले न हो लेकिन कांग्रेस फायदे में रहेगी। क्षेत्रीय दल सिकुड़ेंगे और अल्पसंख्यक कांग्रेस के साथ जुड़ेंगे। इससे संसदीय चुनाव में पार्टी को बड़ा लाभ मिलेगा। इसे लेकर जितना आकलन कांग्रेस कर रही है उससे कहीं कम भाजपा भी नहीं कर रही है। दूसरी तरफ मोदी भी इसे लेकर अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने से जुड़े सवाल पर वह साफ कहते हैं कि. श्श्जो राजनेता हैंए वे प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते हैं। मैं गैर राजनीतिक व्यक्ति हूं।्य्य लेकिन इसी के साथ मोदी गुजरात का कर्ज उतारने के बाद अब देश का कर्ज उतारने की भी मंशा जताते हैं। नई दिल्ली के भाजपा अधिवेशन के दौरान उन्होंने इससे भी एक कदम आगे जाने की कोशिश की। वह तमाम राष्ट्रीय मुद्दों की तरफ मुखातिब हुए। विदेश नीति पर भी बोले। नए सहयोगी के रूप में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के पास भी हो आए और राष्ट्रीय राजनीति से मेल मिलाते हुए बयान देना शुरू कर दिया। वह भाजपा के खेवनहारों में नजर आने लगे।

वैसेए राजनीति में कुछ भी पहले से तय नहीं होता। समय बेहतर जानता है कि प्रधानमंत्री बनने का ताज हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल के पास पहले आया था और उन्होंने इसे वीपी सिंह की तरफ सरका दिया था। इसी तरह वीपी सिंह ने एयरपोर्ट जाते समय रास्ते में फोन से एचडी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने की स्वीकृति दे दी थी और प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद पाले मुलायम सिंह यादव समेत तीसरे मोर्चे के तमाम नेता टापते रह गए थे। जिस राजनाथ सिंह को नितिन गडकरी को पार्टी में दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए शीर्ष नेताओं को मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थीए आखरी समय में वही पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर उभर कर आए। पार्टी की कमान संभाली। इतना ही नहीं जिस राजनाथ सिंह से अध्यक्ष रहते हुए नरेन्द्र मोदी को पार्टी के संसदीय बोर्ड से अलग किया थाए अब वही उन्हें ससम्मान इसमें ले आए हैं। पार्टी के भीतर दूसरी पंक्ति के कई और भी नेता हैं जिनकी छवि अच्छी है। इसलिए अगले लोकसभा चुनाव में किसी संभावना को नकारा नहीं जा सकता। 2004 में जिस तरह से मनमोहन सिंह का नाम आगे आयाए वह प्रधानमंत्री बने और नौ साल से इस पद पर बने हैंए उसी तरह पीण्चिदंबरम्ए एण्केण्एंटनी या फिर सुषमा स्वराज या किसी अन्य की उम्मीदें जिंदा हो सकती हैं। भाजपा के कई वरिष्ठ नेता छिपे तौर पर यह मानते हैं कि मोदी इस समय सब पर भारी हैं। उनका प्रभाव काफी ज्यादा है लेकिन आने वाले समय में बहुत कुछ बदल सकता है। भाजपा के एक राष्ट्रीय महासचिव साफ मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी पार्टी के ताकतवर चेहरे हैं लेकिन सर्व स्वीकार्य नेता नहीं हैं। इसलिए मोदी को कई मोर्चों पर खुद को साबित करना है।

भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी को खारिज करने वाले नेताओं की कमी नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा लगातार अपनी आवाज उठा रहे हैं। सिन्हा कहते हैं कि श्श्आडवाणी जी राजग के सबसे सम्मानित और वरिष्ठ नेता हैं। यदि वह पार्टी तथा सरकार का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए उपलब्ध हों तो सभी तरह की बहस पर विराम लग जाएगा।

मोदी के खिलाफ तथ्य
कुछ ऐसे भी तथ्य हैं जो मोदी के पक्ष में नहीं जाते। नरेन्द्र मोदी भले ही करीब तेरह साल से गुजरात के मुख्यमंत्री हैं और उनके नेतृत्व में पार्टी ने राज्य में तीन बार बहुमत की सरकार बनाने में सफलता पाई हैए लेकिन वह पार्टी के स्टार प्रचारक नहीं बन पाए। गुजरात के बाहर ऐसे बहुत कम अवसर आए जब किसी राज्य ने चुनाव प्रचार के लिए नरेन्द्र मोदी की मांग की हो। या मोदी की छवि एक चुनाव जिताऊ जन नेता के रूप में बन पाई हो। इतना ही नहीं जब.जब जहां भी राज्य विधानसभा चुनाव हुए प्रचार के लिए मोदी की उपयोगिता पर सवाल ही खड़े हुए। राजस्थान में पार्टी को धार देने में जुटी वसुंधरा राजे सिंधिया हों या मण्प्रण् के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहानए अथवा छत्तीसगढ़ के रमन सिंहए उनमें से किसी को भी मोदी हजम नहीं होते। इसके बावजूद नरेन्द्र मोदी देश के भावी प्रधानमंत्री का चेहरा हैं।

मोदी की ताकत
नरेन्द्र मोदी सख्त जान हैं। उनके बोल निराले हैं। मुद्दों को उठाने का अंदाज निराला है। उन्हें आक्रामक बने रहना आता है। जनता के बीच में विकास के पक्षधरए साफगोई पसंदए ऑल राऊंडर नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी की छवि बनाए रखने के किसी अवसर से नहीं चूकते। अपनी मॉडलिंग भी खुद कर लेते हैं और समय तथा जरूरत के हिसाब से वह नए अंदाज में जनता के सामने आते रहते हैं। मोदी इकलौते ऐसे नेता है जिन्हें व्यक्तिगत हमले करने से परहेज नहीं होता। वह सोनिया और राहुल गांधी पर राजनीतिक हमला बोलते समय किसी न किसी बहाने इटली का जिक्र छेडऩे से नहीं चूकते। कांग्रेस को बेटे और दामाद की पार्टी कहने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती। इतना ही नहींए जिन मुद्दों को उठाने के बाद मोदी को दांव उल्टा पड़ता नजर आता हैए उससे बहुत चतुराई के साथ पीछे हट जाते हैं। केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर को 51 करोड़ की गर्ल फ्रेंड कहने का दांव उल्टा पड़ते ही मोदी चुपचाप पवेलियन लौट आए। वह एक कुशल रणनीतिकार हैं। 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी की पूरी साख दांव पर थी। बाजी जीतने.हारने के कगार पर थे लेकिन उन्हें किसी क्षण का लौट आए। वह एक कुशल रणनीतिकार हैं। 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी की पूरी साख दांव पर थी। बाजी जीतने.हारने के कगार पर थे लेकिन उन्हें किसी क्षण का इंतजार था। कांग्रेसी भी इस क्षण को लेकर पछताते हैं। जैसे ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुनावी जनसभा में मोदी को मौत का सौदागर कहाए इसे झपट लेने में मोदी ने जरा भी देर नहीं की। वह आक्रामक लहजे में आ गए। पूरे चुनावों के राजनीतिकए सामाजिक पक्ष को गोधरा में हिंसा के बाद के वातावरण में लेकर चले गए। नतीजा आया तो मोदी बाजी जीत चुके थे। इस पछतावे से सबक लेते हुए 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने इस तरह का कोई मौका नहीं दियाए लेकिन मोदी इसे समय रहते भांप चुके थे। इसलिए विकास के मॉडल और गुजरात की अस्मिता का नारा देकर वह फिर बाजी जीत गए। चुनाव से कुछ पहले मोदी का मौलाना के हाथ टोपी का न पहनना और राज्य विधानसभा चुनाव के दौरान किसी मुसलमान प्रत्याशी को न उतारनाए इसी नजरिए से देखा जाता है। मोदी के करीबी इसे उनकी रणनीति से जोड़ते हैं। मोदी मुसलमानों के साथ उदारता का व्यवहार दिखाते हुए गुजराती हिन्दुओं को एक संदेश देना चाहतेे थेए जिसे वह देने में सफल रहे। गोधरा और सांप्रदायिक दंगे की याद ताजा किए बिनाए वह अपना हित साध गए। मोदी के करीबी उन्हें एक तीर से कई निशाने साधने में माहिर बताते हैं। वह काफी पहले से दिल्ली की ओर कूच करने का संकेत दे रहे हैं। मोदी जानते हैं कि इसके लिए उन्हें कट्टर छवि को संतुलित तरीके से छोडऩा होगा। तभी वह कुछ खास कर सकेंगे। इसलिए उन्होंने सधे तरीके से राजनीतिक दांव चला। अब कांग्रेस इसके लिए मोदी को किसी अल्पसंख्यक को विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट न देने का ताना भर कसकर रह जाते हैं।

मोदी मंत्र
जब से गुजरात में मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाली हैए मोदी हमेशा विरोधियों से घिरे रहे हैं। पार्टी के भीतर भी और बाहर भी। 27 फरवरी 2002 को अयोध्या से वापस लौट रहे हिन्दू तीर्थ यात्रियों पर गोधरा स्टेशन पर हमला और इसके बाद गुजरात में फैली सांप्रदायिक हिंसा के बाद दंगे की चपेट में आए गुजरात ने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर कई सवाल खड़े कर दिए। दंगों से उबरने के बाद राज्य के दौरे पर गए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक ने मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह दे दी। अमेरिका जैसे देशों ने मोदी को अपने यहां आने के लिए वीजा देने से मना कर दिया। मीडिया की भी नाराजगी झेलनी पड़ी। लेकिन मोदी कभी किसी विपरीत झंझावात में कमजोर नहीं हुए। खुद को नई ताकत के साथ पेश करते रहे। धीरे.धीरे वह बदलते समय के साथ बहुत कुछ मैनेज करने में कामयाब हो गए।

राजनीति में परास्नातक मोदी बेहद साधाराण परिवार की पृष्ठभूमि से हैं। उन्होंने छात्र राजनीति में भी हिस्सा लिया और बड़े भाई के साथ चाय की दुकान भी चलाई है। वह विवाहित हैं लेकिन पति.पत्नी के रिश्ते में नहीं बंधे हैं। इसे लेकर उनकी पत्नी भी कभी विवाद खड़ा करती नजर नहीं आई। परिवार से रिश्तों को लेकर भी मोदी एक दूरी बनाकर चलते हैं। व्यक्तिगत रिश्तों में मोदी कभी किसी व्यक्ति के साथ नहीं बंधे। कभी शंकर सिंह वघेला तो कभी कद्दावर नेता केशूभाई पटेल के विरोध का ताप झेलते रहे लेकिन अब दोनों ही बड़े चेहरे भाजपा में नहीं हैं। केशूभाई पटेल ने अलग राजनीतिक पार्टी बना ली और शंकर सिंह वघेला गुजरात में कांग्रेस का चेहरा बन चुके हैं। मोदी के खिलाफ विधानसभा में खड़े होने वाले बघेला आज विरोधी दल के नेता हैं जबकि कभी इसी वघेला और मोदी में गहरी छनती थी। मोदी वघेला का कद बढ़ाने में लगे थे। वघेला के लिए मोदी ने दिन.रात एक कर दिया था। तब मोदी संजय जोशी के साथ मिलकर गुजरात में राजनीति की नई पटकथा लिख रहे थे। संजय जोशी गुजरात में भाजपा को मजबूत बनाने में लगे थे। लेकिन गुजरात में भाजपा के सत्ता में लौटने पर नरेन्द्र मोदी राज्य में लौटना चाहते थे। कहते हैं यह संजय जोशी को रास नहीं आ रहा था। राजनीति और व्यक्ति को बारीकी से समझने में माहिर संजय जोशी नरेन्द्र मोदी को भी बखूबी समझ रहे थे। इसलिए वह नहीं चाहते थे मोदी गुजरात आएं। हालांकि संजय जोशी इसे सही नहीं मानते। वह कई बार कह चुके हैं उन्होंने मोदी को गुजरात आने से नहीं रोका थाए बल्कि जो केन्द्र और संघ चाह रहा थाए उन्होंने उसी को आगे बढ़ाया। यहीं से जोशी और मोदी में पड़ी दरार लगातार चौड़ी हो रही है। संजय जोशी को निबटाने में मोदी कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते। संजय जोशी भी इस स्थिति को लगातार असहज बनाए रखते हैं। कहते हैं राजनीति में किस्मत चमकते देर नहीं लगती। कुछ लोगों के जीवन में भाग्य कई बार लौटकर आता हैए अवसर देता है। नरेन्द्र मोदी के साथ भी ऐसा ही हुआ। राज्य में केशूभाई मुख्यमंत्री थे। नरेन्द्र मोदी राज्य में वापसी के लिए जोर लगा रहे थे। 2001 में विधानसभा चुनाव हुए और इसमें भाजपा का प्रदर्शन खराब रहा। यही केशूभाई के लिए सत्ता छोडऩे और नरेन्द्र मोदी के लिए गुजरात में सत्ता पर काबिज होने का आधार बन गया। इसके बाद मोदी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार आगे बढ़ते गए।

कभी गोवर्धन झड़पिया जैसे तमाम नेता मोदी के सहयोगी थे। प्रवीण भाई तोगडि़या भी मोदी के करीबी थे। आज इन नामों में से कोई भी मोदी के साथ नहीं है। सबको मोदी फूटी आंख से नहीं सुहाते। मोदी कभी भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी के भी काफी करीब थे। बाद में लालकृष्ण आडवाणी के करीबी बने। आडवाणी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए ढाल बनकर खड़े रहते थे। राम मंदिर आंदोलन के समय भी मोदी उनके सारथी थे। सोमनाथ से अयोध्या तक की राम मंदिर यात्रा में मोदी साये की तरह आडवाणी के साथ रहे। मोदी कन्याकुमारी से कश्मीर तक की दूसरी यात्रा में भी आडवाणी के साथ रहे। नरेन्द्र मोदी के रहते हुए आडवाणी को कभी गांधी नगर सीट से चुनाव जीतने की भी चिंता नहीं रही। अब भाजपा में उसी मोदी को आडवाणी के विरोधी खेमे में गिना जाने लगा है। दोनों नेता विरले ही एक मंच पर नजर आ रहे हैं। अहमदाबाद में पार्टी स्थापना दिवस मना रही थी। उसमें मोदी और राजनाथ दोनों मौजूद थे लेकिन गुजरात से सांसद आडवाणी ने कार्यक्रम में रहना जरूरी नहीं समझा। बताते हैं दोनों ही नेताओं में वैचारिक मतभेद काफी बढ़ गए हैं। आडवाणी को मोदी और मोदी को आडवाणी अपने रास्ते में रोड़ा नजर आने लगे हैं। हालांकि दोनों में से कोई किसी के खिलाफ कुछ नहीं बोलता। दरअसल मोदी को अपनी जरूरत के हिसाब से दोस्त और दुश्मन बनाना आता है। उन्हें निजी रिश्तों में शतरंज के घोड़े की ढाई चाल से कोई परहेज नहीं है। तभी तो कभी संघ के प्रचारकए पार्टी के अदना से कार्यकर्ता से उठकर मोदी गुजरात के कद्दावर नेता हैं। केन्द्रीय राजनीति में अपनी मोहरे बिछा रहे हैं। राष्ट्रीय फलक पर छटा बिखेर कर छा जाना चाहते हैं।

मोदी के सहयोगी
राजग में शामिल तीन बड़े दलों में दो के नेता मोदी के साथ हैं। एआईएडीएमके की प्रमुख और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और नरेन्द्र मोदी के रिश्ते जगजाहिर हैं। उड़ीसा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के नवीन पटनायक कई बार मोदी के साथ सुर में सुर मिला चुके हैं। समय.समय पर मोदी इन सहयोगियों के सहारे राष्ट्रीय राजनीति में अपना असर दिखाते रहे हैं। राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधी केन्द्र की स्थापना से लेकर राजग में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार तय किए जाने तक के मामले में मोदी किसी न किसी रूप में प्रभावी रहे हैं। पार्टी की अंदरूनी राजनीति में भी उनके सहयोगियों की कमी नहीं है। अपने मंच पर वह जरूरत के हिसाब से नेताओं की मौजूदगी सुनिश्चित कर ले जाते हैं। राम जेठ मलानी के माध्यम से वह अपनी बात रखने का रास्ता तैयार कर लेते हैं। अरूण जेटली मोदी के साथ खड़े नजर आते हैं। जब पार्टी के पूर्व नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के साथ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तलवारें खिंची थींए तब माना जा रहा था कि येदियुरप्पा के तार गुजरात से जुड़े हैं। आज भी राजनाथ सिंह की भाजपा को इसका भरोसा है कि नरेन्द्र मोदी की बात येदियुरप्पा नहीं टालेंगेे। मोदी राजग के सहयोगी अकाली दल और शिवसेना में भी अपनी पैठ रखते हैं। इन दिनों कांग्रेस के कुछ नेताओं से भी उनकी अच्छी निभ रही है।

केन्द्र सरकार पर मोदी का हमला
देश में न सरकार है न सुशासनए पावर सेंटर में नहीं है पावर।

केन्द्र सरकार नीतियों के लकवे का शिकार हो गई है और अपने उधार के समय पर चल रही है। सरकार के पास समय कम है और वह कैलेंडर के बजाय घड़ी देखकर चल रही है।

मोदी सबसे लोकप्रिय नेता.राजनाथ
इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी अभी देश के सबसे लोकप्रिय नेता है। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर पार्टी का केन्द्रीय संसदीय बोर्ड फैसला करता है। वहां उनकी निजी राय का महत्व नहीं होता।

कांग्रेस पर कटाक्ष
कांग्रेस हवाई बातें करती है और कहती है कि हमने आपको मोबाइल दिया। कैसे दियाण्ण्ण्घ् यह तो आपने अपने पैसे से खरीदा है।;जब मोदी ने जनता की नब्ज टटोलकर यह बात कही तो खूब ताली बजीद्ध

पीपीपीपी मॉडल जरूरी
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप से आगे जाकर पीपुल पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की बात करनी चाहिए। इस पीपुल पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत हमें सरकार की निजी क्षेत्र के साथ.साथ शुरू की गई योजनाओं में जनता की भागेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। तब देखिए कि सबको लेकर हम क्या करिश्मा कर सकते हैं।

राहुल पर निशाना
अहमदाबाद में जसुबेन का पिज्जा अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के पिज्जा को कड़ी टक्कर दे रहा है। अब मीडिया के लोग जसुबेन के बारे में जानने के लिए दौड़ेंगे कि कहीं वह भी कलावती की तरह ही तो नहीं है।

मोदी की चर्चित टिप्पणी
मेरे कांग्रेसी मित्रों ने गुजरात में इतने गड्ढे बना दिए थे कि मैं उन्हें भरने में लगा था। सोचिए कितने गड्ढे थे कि उन्हें भरते.भरते अब जाकर हम लेवल प्लेइंग फील्ड पर आ पाए हैं। अब दिव्य और भव्य गुजरात का निर्माण किया जाएगा।

सत्ता में आना मेरी प्राथमिकता नहीं
मैं संतुलित सरकार के पक्ष में हूं। सत्ता में आना मेरी प्राथमिकता नहीं है। सरकार से जनता का भरोसा उठ जाना सबसे बड़ा खतरा है।

प्रकाश सिंह बादल

अगर राजग प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करती है तो हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी। ;शिरोमणि अकाली दल का समर्थनद्ध

तीसरा मोर्चा काफी अच्छा विकल्प है। भाजपा के साथ आगे गठजोड़ का कोई सवाल ही नहीं है।
नवीन पटनायक, बीजू जनता दल

पार्टी के रवैये से आडवाणी नाखुश
वर्तमान भाजपा मेरे सपनों की भाजपा नहीं है। कथनी.करनी में दिख रहे फर्क के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ बन रहे देशव्यापी माहौल का लाभ पार्टी को नहीं मिल रहा है। इस माहौल का लाभ लेने के लिए पार्टी में सकारात्मक बदलाव लाने की जरूरत है। हमें अपना आचरण सुधारना होगा। नहीं तोए लोग कहते रहेंगे कि भाजपा अलग तरह की पार्टी नहींए बल्कि पार्टी विद डिफरेंस है।

राम मंदिर आंदोलन राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक आंदोलन था। इस मुद्दे ने पार्टी को नई ऊंचाइयां दीं। मुझे यह स्वीकार करने में गर्व होता है कि पार्टी ने इस मुद्दे को उठाया। इस आंदोलन पर अपराध बोध पालने या हीन भावना से ग्रस्त होने के बजाय पार्टी के लोगों को गर्व करना चाहिए।

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