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ग्ंगा अंतरमंत्रालयी समूह रिपोर्ट अब अक्षुण्ण तो नहीं ही बचेगी गंगा

गंगा अंतरमंत्रालयी समूह को मुख्यत: पांच काम सौंपे गये थे। गंगा का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करना गंगा की मूल व सहायक धाराओं के पर्यावरणीय प्रवाह का निर्धारण करना परियोजनाओं और आपूर्ति दरों पर पर्यावरणीय प्रवाह के प्रभाव की जांच पर्यावरण पर प्रस्तावित परियोजनाओं के प्रभाव की समीक्षा और दुष्प्रभावों से बचाव के उपचार सुझाना। उल्लेखनीय है कि सरकारी एजेंसियां द्वारा आंकड़े आदि मुहैया कराने में हीला-हवाली के कारण आईआईटी संकाय तय समय बीत जाने के बावजूद गंगा नदी घाटी प्रबंधन योजना तैयार नहीं कर सका है। पांचवा कार्य इसके लिए संबंधित सरकारी एजेंसियों का सहयोग सुनिश्चित कर रास्ता बताना था। बाद में दो काम और जोड़े गये। अलकनंदा बांध परियोजना के नदी और धारी देवी मंदिर पर प्रभाव की समीक्षा तथा गंगा प्रदूषण मुक्ति।योजना आयोग के सदस्य बी के चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित अंतरमंत्रालयी समूह की गंगा रिपोर्ट में कई बिंदु ऐसे हैंए जिनसे असहमत होना शायद ही किसी के लिए संभव हो। रिपोर्ट ने जरूरी जानकारी समय से उपलब्ध कराने के लिए केन्द्रीय स्तर पर गंगा मिशन के निदेशक और आईआईटी संकाय तथा पर्यावरण मंत्रालय के अवर सचिव स्तर पर के बीच तालमेल और पाक्षिक समीक्षा की व्यवस्था सुझाई है। राज्यों के संबंधित केबिनेट सचिवों इसकी व्यवस्था बनायें। रिपोर्ट कहती है कि प्रदूषण नियंत्रण हेतु जहां एक ओर उद्योगों को बाध्य किया जाये, वहीं संबंधित तकनीकी नवाचारों को अपनाने के लिए उन्हे आर्थिक मदद दी जाये। पर्यावरणीय मंत्रालयी कार्यालयी ज्ञापन के अनुसार नदियों मे अपना अवजल डालने वाली सभी इकाइयां अपने मुनाफे का एक हिस्सा पर्यावरणीय दायित्व पूर्ति पर खर्च करें। प्रदूषण नियंत्रण के विविध जैविक नवाचारोंध्प्रणालियों की निगरानीए प्रभावों की जांच तथा उन्हे प्रोत्साहन के लिए गंगा मिशन विशेष कार्यक्रम शुरू करे। खासकर शहरी क्षेत्रों द्वारा कचरे को साफ करने के बाद जितना पानी जो राज्य गंगा में छोड़ता है, वह पक्का करें कि उस बिंदु पर उसका दस गुना ताजा पानी गंगा में हर वक्त रहे।
मिशन राज्यों को दी जा रही राशि इस शर्त से साथ ही जारी करे कि राज्य ताजे पानी की उक्त मात्रा गंगा को मुहैया करायेंगे। नदी के पर्यावरणीय प्रवाह के बाद किस नदी के पास देने के लिए कितना पानी अतिरिक्त रहता है, इसका निर्धारण करके ही सरकारें खेती, उद्योग, पेयजल आदि के लिए आपूर्ति मात्रा तय: करें। तय पर्यावरणीय प्रवाह की मात्रा और निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए खासकर गंगा के उत्तराखण्ड वाले हिस्से में कार्यरत और निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनायें अपने में संशोधन करें। प्रस्तावित परियोजनायें अपने डिजायन आदि में बदलाव करें। सभी उपभोक्ताओं को बाध्य किया जाये कि वे उतना ही पानी लें, जितना नदी दे सकती है। उतना नहीं, जितना कि वे खींच सकते हैं।सहमति के इन तमाम बिंदुओं के बावजूद रिपोर्ट की तारीफ नहीं की जा सकती। रिपोर्ट विरोधाभासी है। मानदंड दोहरे है। रिपोर्ट प्रदूषण नियंत्रण के बाध्य करने के बारे में तो कहती है, लेकिन व्यवहार में उपाय वही सुझाती है, जो राज्य बनाम केन्द्र में फंसते रहे हैं अथवा व्यवस्थागत खामियों और भ्रष्टाचार के कारण पहले ही घुटने टेक चुके हैं। ‘जीरो डिस्चार्ज्य का संकल्प रिपोर्ट में है ही नहीं। गंगा प्रवाह से 500 मीटर दूरी तक निर्माण प्रतिबंधित करने का इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश आइना बनकर समूह के सामने है। प्रोण् जी. डी. अग्रवाल ने भी औद्योगिक इकाइयों को गंगा से 500 मीटर दूर रखने की मांग की थी। बावजूद इसके रिपोर्ट ने नदी और उद्योग के बीच की दूरी के बारे साफ-साफ कहने से परहेज किया। क्यों? सोचना चाहिए।
रिपोर्ट जहां एक ओर गंगा के प्रति भारतीय आस्था और इसके श्राष्ट्रीय नदी्य के दर्जे की महिमा रेखांकित करती है, वहीं नदी को 60 प्रतिशत तक दुष्प्रभावित करने की इजाजत भी देती है। यह कैसा आस्था संरक्षण है? बांध के कारण गढ़वाल का सबसे अधिक मान्यता प्राप्त मां धारीदेवी का मंदिर विस्थापित हो तो हो, परियोजना नहीं रुकेगी। दो नदी परियोजनाओं के बीच की दूरी पर भी रिपोर्ट चुप्पी साध लेती है। उत्तराखण्ड के अधिकारी चाहते थे कि 25 मेगावाट तक की परियोजनाओं को समूह की सिफारिशों से न बांधा जाये। रिेपोर्ट इसे मंजूर नहीं करती, लेकिन छोटी परियोजनाओं को अनुशासित रखने के बारे में कोई स्पष्ट निर्देश भी नहीं देती। हां! संशोधन व डिजायन में बदलाव की एवज में परियोजनाओं को बिजली दर बढ़ाने का मौका अवश्य देती है। यही इस रिपोर्ट का विरोधाभास है।वाष्पन के कारण अकेले गंगा बेसिन में पानी के नुकसान का आंकड़ा कम नहीं है। बुंदेलखण्ड जैसे इलाकों में तो यह 40 प्रतिशत तक दर्ज किया गया है। बांधों की झीलों में रुके पानी का वाष्पन कम किया जा सकता है। रिपोर्ट इसका जिक्र तक नहीं करती। रिपोर्ट ने छह नदियों पर भविष्य में किसी नई परियोजना को मंजूरी न देने का दिखावा किया है। धौलीगंगा, नया बालगंगा, अस्सी गंगा, बिरही गंगा और भयंदर गंगा। इनमें से कई पर पहले से ही परियोजनायें हैं। विरोधाभासी तथ्य यह भी है कि रिपोर्ट की दूरगामी सिफारिशें गंगा के पक्ष में दिखती हैं, तो तात्कालिक सिफारिशें गंगा के खिलाफ। दूरगामी सिफारिशें गंगा पर्यावरणीय प्रबंधन योजना-2020 बनाने वाले आईआईटी संकाय के लिए हैं। योजना जब बनेगी, तब बनेगीय तात्कालिक सिफारिशें तो अभी ही लागू होकर अपना प्रभाव दिखाकर गंगा के जीवन और गुणवत्ता का बहुत बड़ा हिस्सा छीन लेंगी। दूरगामी सिफारिश पर्यावरणीय प्रवाह के निर्धारण का आधार श्बिल्डिंग ब्लॉक मैथेडोलॉजी्य को बनाती है,और तात्कालिक का आधार ‘मीन सीजनल फ्लो एप्रोच्य को। यह दोहरा मानदंड क्यों? दरअसल, यह हेरफेर ही बांधों को तुलना में ज्यादा पानी रोकने और कम पानी छोडऩे की छूट देता है। 30 से 20 प्रतिशत तक पानी छोडऩे को ही यदि पर्यावरणीय प्रवाह माना गया, तो गंगा की अक्षुण्ण्ता तो नहीं ही बचने वाली। गारंटीड!

ये सारी सिफारिशें बताती हैं कि रिपोर्ट बांधों के साथ खड़ी हैय सच के साथ नहीं। सच यह है कि निर्मलता हासिल करने की पहली शर्त अविरलता है। सच यह है कि गंगाजल की अक्षुण्णता प्रदान करने वाले बैक्टिरियोफाजेज बांधों की झीलों में बंधकर नष्ट हो जाते हैं। सच यह हैै कि दूसरे राज्य गंगा में चाहे कितना ही पानी छोड़ेए गंगाजल को अक्षुण्णता प्रदान करने का दम देवभूमि में ही है। सच यह है कि जहां सबसे ज्यादा और सबसे बड़े बांध बनेए वहीं पानी को लेकर सबसे ज्यादा चीख.पुकार मची। गुजरातए आंध्र प्रदेशए कर्नाटक और आंशिक तमिलनाडुए ये सब बांधों पर निर्भर होते जा रहे राज्य हैं।

महाराष्ट्र देश में सिंचाई परियोजनाओं के नाम पर सबसे ज्यादा निवेश खाने वाला राज्य है। बावजूद इसके चित्र निराशाजनक है। 1972 के अकाल में महाराष्ट्र में पानी थाए पर अन्न नहीं। आज 50 साल बाद के इस अकाल में अन्न हैए पर बांध सूखे हैं 17 किमी लंबे गायकवाड़ी जैसे बांध भी! भूजल चेतावनी के स्तर से नीचे पहुंच चुका है। यहां पानी के लिए आत्महत्यायें हैं। दूसरी ओर राजस्थान है। इसके हिस्से में सबसे कम सिंचाई परियोजनायें आई बावजूद इसके राजस्थान में पानी को लेकर आत्महत्यायें नहीं हैं। क्यों? क्योंकि पानी के संकट का समाधान सिर्फ ज्यादा से ज्यादा साधन जुटाने से नहीं, उपयोग में अनुशासन से आता है। जब तक यह अनुशासन बिजली उपयोग में नहीं आयेगा, बिजली बनाने के नाम पर नदियां मारी जाती रहेंगी बिजली फिर भी कम ही रहेगी।

रिपोर्ट 6ए942 मेगावाट से अधिक उत्पादन को अनुमति देने के पक्ष में नहीं है। उत्तराखण्ड की जरूरत इसकी भी एक तिहाई से कम है। उत्तराखण्ड को अपनी जरूरत भर की बिजली बनाने के लिए अपने स्त्रोत खुद तय करने का हक है। रिपोर्ट यह क्यों नहीं कहती कि उत्तराखण्ड अपने राज्य की जरूरतभर बिजली अवश्य बनायेए लेकिन विकास और आय हासिल करने का काम नदी, पर्वत और प्रकृति के अनुकूल मॉडल के रूप में तय करे। उसके लिए केन्द्र सरकार से विशेष राज्य के दर्जे की मांग करे। अतिरिक्त धन प्राप्त करें। यह क्यों नहीं होना चाहिए? यदि बिहार विशेष दर्जे की मांग कर सकता हैए तो उत्तराखण्ड क्यों नहीं?

समझ में नहीं आता कि इस सच से वाकिफ होने के बावजूद आज तक भारत की कोई सरकार कोई बांध नीति क्यों नहीं बना सकी? क्यों नहीं बता सकी कि बांध बने या नहीं? बने तो कैसे? कहां? कितने की सीमा तय करने का आधार क्या हो? उनके डिजायन क्या हों? जितना जोर पनबिजली पर है, उतना जोर हमारे निवेशक और सरकार, दोनो का पवन, सौर और भू-तापीय ऊर्जा पर क्यों नहीं है? तीनो तरह की ऊर्जा पवित्र मानी जाती है। तीनों के नुकसान नहीं है। वैज्ञानिक सूर्यप्रकाश कपूर के मुताबिक तो नुकसान के स्थान पर तीनों से बिजली बनाना श्ग्लोबल वार्मिंग्य की चुनौती से निपटने में मददगार होगा। वह तो अंडमान द्वीप समूह जैसे भू-तापीय स्त्रोत स्थलों को औद्योगिक क्षेत्रों में तब्दील कर देने की सिफारिश तक करते हैं। क्या समूह के वैज्ञानिक इसे नहीं जानते। बावजूद इसके रिपोर्ट इन तथ्यों की अनदेखी करती है।
रिपोर्ट ने उत्तराखण्ड के भूरी लकीरों में बदलते झरनोंए छिनती खेती, धंसकते गांवों, झड़ते पहाड़ों और मलवे-कचरे से पटे पड़े नदी किनारे और बदलती आबोहवा के खतरों से सबक नही लिया है। अभी समुद्र के नीचे के तनाव से ईरान से लेकर पाकिस्तान-भारत तक हिले हैं, कल को इन बांधों को लेकर उपजे तनाव से पूरा गंगा बेसिन हिलेगा।कल को मृत्यु पूर्व डालने के लिए हमारे पास दो बूंद गंगाजल तो होगा, लेकिन कभी खराब न होने वाली इसकी गारंटी चुक जायेगी। नहीं। क्या यह अच्छा होगा?

अरूण तिवारी

 

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