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शमशाद बेगम की खनकती आवाज मौन हो गई

उनके कुछ मशहूर गीतों में ‘मदर इंडिया का विदाई गीत ‘छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा भी है जो आज भी बेटी की विदाई के मौके पर बैंडवाले जरूर बजाते हैं। हालांकि उस जमाने में नूरजहां, मुबारक बेगम,सुंरैया, अमीर बाई कर्नाटकी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त आदि बहुत सी गायिकाएं गा रही थीं लेकिन शमशाद बेगम की आवाज इन सब से अलग ही पहचानी जाती थी। उनकी अवाज में ‘मुगल-ए-आजम का गाना ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे निगार सुल्ताना पर फिल्माया गया था। ‘पतंगा का ‘मेरे पिया गए रंगून्य परदे पर वैजयंतीमाला गाती दिखाई दे रही थी।

पचास और साठ के दशक की वह खनकदार आवाज पिछले मंगलवार को शांत हो गई जिसने उस जमाने में हर संगीतप्रेमी के दिल पर अपनी छाप छोड़ दी थी और आज भी जिसके गानों को गुनगुनाने का अनायास मन हो आता है। 94 साल की उम्र में मुम्बई में उनका निधन हो गया। वह काफी समय से अस्वस्थ चल रही थीं।

शमशाद बेगम वह नाम है जिसकी आवाज के बिना उस दौर की कोई फिल्म पूरी नहीं होती है। गाना कैसा भी हो, शरारती अंदाज लिए हो (बूझ मेरा क्या नांव रे, नदी किनारे गांव रे), प्रेम में चुनौती स्वीकार करने वाला हो (तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे), रोमांटिक हो (मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का), मुजरा हो (कजरा मुहब्बतवाला, अंखियों में ऐसा डाला), या फिर बेटी का विदाई गीत हो (छोड़ बाबूल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा) शमशाद बेगम की आवाज में वह खिल उठता था।

14 अप्रैल 1919 को अमृतसर में जन्मी शमशाद बेगम गायक कुंदनलाल सहगल की आवाज की दीवानी थी। देवदास उन्होंने 14 बार देखी थी। गाने का शौक बचपन से था। 14 साल की उम्र से ही उन्होंने गाना शुरू कर दिया था। 1941 में उन्होंने पहली बार फिल्म ‘खजांची के लिए गाया था। यह बहुत बड़ी बात थी। जल्द ही वह गायिका के रूप में मशहूर हो गई। उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो पर गाना सम्मान की बात मानी जाती थी। उस समय उन्हे एक गाने के 15 रुपए मिलते थे। उस जमाने की जानी-मानी संगीत कंपनी जेनाफोन के साथ जब उन्होंने कांट्रेक्ट पूरा किया तो कंपनी ने उन्हें 5000 रुपए दिए। उन्होंने दिल्ली में अपना एक संगीग ग्रुप ‘द क्राउन इंपीरियल थिएट्रिकल कंपनी फॉर परफार्मिंग आटर््स्य बनाया था और उसी के जरिए वह ऑल इंडिया रेडियो के लिए गाती थीं। उनकी खनकदार आवाज की तरफ सारंगी वादक उस्ताद हुसैन बक्शवाले साहेब का ध्यान गया तो उन्होंने उसे अपना शागिर्द बना लिया।

ऑल इंडिया रेडियो लाहोर ने उनके लिए फिल्मी दुनिया की राह खोली थी। वे उनके गाने खूब बजाते थे। बहुत से संगीत निर्देशकों को लगा कि उनकी आवाज का इस्तेमाल वे अपनी फिल्मों के लिए कर सकते हैं। इन्हीं में गुलाम हैदर साहब भी थे। तब वह लाहौर में रहते थे। अपनी फिल्मों खजांची (1941) और खानदान (1942) में उन्होंने शमशाद बेगम की ताजगी भरी आवाज का बड़ी खूबसूरती के साथ इस्तेमाल किया। बाद में 1944 में जब वह मुम्बई चले गए तो उनकी टीम के साथ शमशाद भी चली गईं। उनका परिवार तो लाहौर में ही रह गया था। मुम्बई में वह अपने चाचा के साथ रहने लगीं।

मुम्बई के संगीतकारों ने उनकी आवाज के साथ कई प्रयोग किए। सीण् रामचंद्र ने फिल्म अलबेला के लिए ”आना मेरी जान मेरी जानए, सनडे के सनडे को पाश्चात्य शैली में गवाया।

नौशाद को बड़ा नाम बनाने वालों में शमशाद भी थी। 40 के दशक में उन्होंने नौशाद के लिए कई एकल और युगल गीत गाए थे। तब तक शमशाद एक बड़ा नाम बन चुकी थी लेकिन नौशाद अभी पहचान बनाने की कोशिश में थे। उनके हिट गानों के सहारे लोग नौशाद को भी जान गए थे। एक बार सफलता हासिल करने के बाद नौशाद ने बहुत से नए गायक-गायिकाओं को मौका दिया। लेकिन शमशाद की आवाज को भी वह अपनी फिल्मों में लेते रहे। उनके कुछ मशहूर गीतों में ‘मदर इंडिया का विदाई गीत ‘छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा भी है जो आज भी बेटी की विदाई के मौके पा बैंडवाले जरूर बजाते हैं। हालांकि उस जमाने में नूरजहां, मुबारक बेगम, सुंरैया, अमीर बाई कर्नाटकी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, गीता दश्र आदि बहुत सी गायिकाएं गा रही थीं लेकिन शमशाद बेगम की आवाज इन सब से अलग ही पहचानी जाती थी। उनकी अवाज में ‘मुगल-ए-आजम्य का गाना ‘तेरी महफिल मे किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे निगार सुल्ताना पर फिल्माया गया था। ‘पतंगा का ‘मेरे पिया गए रंगून्य परदे पर वैजयंतीमाला गाती दिखाई दे रही थी।

गायिका के तौर पर मशहूर हो जाने के बाद भी वह कभी फिल्म में अभिनय के लिए तैयार नहीं हुई। उन्होंने अपने पिता से वादा किया था कि कभी कैमरे के सामने नहीं आएंगी। फिल्म का कैमरा तो रहा दूर, वह स्थिर कैमरे से भी परहेज करती थी। 70 के दशक तक आम लोगों को शमशाद की शक्ल तक पता नहीं थी। हालांकि उनकी आवाज के हर पेचोखम से वे परिचित थे। तब तक उन्होंने कोई इंटरव्यू भी नही दिया था। सत्तर के दशक के आखिर तक कोई उनकी शक्ल नहीं पहचानता था। अपना पहला इंटरव्यू उन्होंने अस्सी के दशक में दिया था। तब वह इंटरव्यू देने लगीं। 2012 में उनका आखिरी इंटरव्यू लिया गया था। उनके पति का नाम गणपत लाल बट्टू था। 1955 में बट्टू का निधन हो गया। अपने अंतिम समय में शमशाद बेगम अपनी बेटी उषा रात्रा के साथ रह रही थीं।

2009 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था
उनकी मौत पर दु:ख प्रकट करते हुए अभिताभ बच्चन ने कहा, ‘शमशाद बेगम की स्वर्णिम आवाज, कईयादगार गानों की गायिका अब मौन हो गई है। लता मंगेशकर ने कहा, ‘शमशाद बेगम की मौत की खबर सुनकर बहुत दु:ख हुआ। मैंने कई फिल्मों में उनके साथ गाया है। उनका व्यक्तित्व बहुत ही प्यारा और सादा था।

सुरेश उनियाल

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