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साधना का विकास दु:ख का ह्रास

संसार में दु:ख है। यह एक प्रत्यक्ष सच्चाई है। दु:ख का कारण भी दिखाई देता है। दु:खमुक्ति भी संभव मानी गई है और दु:खमुक्ति का मार्ग भी है। दु:ख, दु:ख-हेतु, दु:खमुक्ति और दु:खमुक्ति-हेतु, ये चार सच्चाइयां हैं। नव तत्वों में इन चारों सच्चाइयों को खोजें तो इस प्रकार उत्तर मिलता है, पाप तत्व दु:ख है। आश्रव उसका हेेतु है। मोक्ष दु:खमुक्ति है। संवर दु:खमुक्ति का मूल मार्ग है। जैन दर्शन का सार इस रूप में प्रतिपादित है-”आश्रव संसार-भ्रमण का हेतु है और संवर संसार-मुक्ति का। यही आर्हत (जैन) दर्शन है। शेष जो कुछ है इसी का विस्तार है।

नव तत्वों में पांचवां तत्व है आश्रव। इसे आश्रवद्वार भी कहा जाता है। पुण्य-ताप का कारण आश्रव है। जैसे मकान में प्रवेश के लिए द्वार, कुण्ड के नाला और नौका के छिद्र होता है, वैसे ही कर्म के जाने (आत्मा के चिपकने) का रास्ता आश्रव होता है। आश्रव के पांच प्रकार है-मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद, कषाय और योग। ‘शान्तसुधारस भावना्य में प्रमाद की पृथक विवक्षा के अभाव में आश्रव चार ही बतलाए गए हैं-मिथ्यात्वाविरति कषाययोगसंज्ञाश्चत्वार: सुकृतिभिराश्रवा: प्रदिष्टा:। विस्तार की विवक्षा में आश्रव के बीस भेद भी हो जाते हैं। यह विस्तार योग आश्रव के भेदों से हुआ है। अति संक्षेप में जाएं तो, मुझे लगता है, आश्रव दो ही रह जाएंगे, कषाय और योग। कर्म-बंधन के दो ही कारण है। कषाय और योग। मिथ्यात्व, अव्रत और प्रमाद,ये तीनों कषाय की ही विभिन्न अवस्थाएं हैं। प्रथम और तृतीय गुणस्थान में मिथ्यात्व आदि पांच आश्रव, दूसरे वे चौथे गुणस्थान में अव्रत आदि चार आश्रव, पांचवें गुणस्थान में अपूर्ण अव्रत तथा प्रमाद आदि तीन आश्रव, छठे गुणस्थान में प्रमाद आदि तीन आश्रव, सातवें से दसवें गुणस्थान तक कषाय और शुभ योग आश्रव, ग्यारहवें से तेरहवें गुणस्थान तक मात्र शुभ योग आश्रव होता है। चौदहवां गुणस्थन अनाश्रव होता है, अबन्ध होता है। छठे गुणस्थान में अशुभ योग आश्रव भी हो सकता है। यद्यपि मुनित्व की भूमिका में अशुभ (सावद्य) योग वर्जनीय है, किन्तु मोहवश हो भी सकता है। ग्यारहवें गुणस्थान में मोह (कषाय) की विद्यमानता रहती है परन्तु वह सर्वथा उपशांत रहता है। वह वहां न विपाकोदय में और न ही प्रदेशोदय में रहता है, इसलिए कर्म का आश्रवण उससे हो नहीं सकता। संसार (जीव जगत) की विचित्रता का आधार व कारण कर्म है। कर्म का कारण आश्रव है। इसलिए संसार की विचित्रता का मूल आधार आश्रव है। मिथ्यात्व आदि चार आश्रव और अशुभ योग आश्रव तो दु:ख-हेतु हैं ही। शुभयोग आश्रव को सीधा दु:खहेतु नहीं कहा जा सकता, किंतु जब तक वह रहता है, पूर्ण दु:ख-मुक्ति नहीं हो सकती। शुभयोग से अशुभ कर्म निर्जरण तथा शुभकर्म आश्रवण-ये दो कार्य होते हैं। निर्जरण अपने आप में सुख है, सुख का मार्ग है।

विशुद्ध (केवल) योग में बंधन की दीर्घकालिकता व अनुभागतीव्रता की क्षमता नहीं होती। उसके साथ परिणाम जुड़ता है,उसके आधार पर निष्पत्ति आती है। एक समान क्रिया की, दृष्टिकोण और परिणाम की भिन्नता के कारण, निष्पत्ति भिन्न-भिन्न प्रकार की हो जाती है। दो व्यक्ति ध्यानस्थ बैठे हैं। बाहर से दोनों समान अनुष्ठान में संलग्न हैं, परन्तु एक मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ रहा है और एक बंधन की दिशा में। एक के मन में कर्मनिर्जरा का भाव है, दूसरे के मन में दिखावे की भावना है। दो व्यक्तियों साधुओं के स्थान पर एक साथ जा रहे हैं। गतिक्रिया दोनों का समान है। एक संयमयुक्त चल रहा है, उसका उद्देश्य है साधुओं का प्रवचन-श्रवण। दूसरा असंयम से चल रहा है, उसका उद्देश्य है साधुओं के स्थान पर आने वाले दर्शनार्थियों के जूतों का चुराना। अब तक पहले ने प्रवचन नहीं सुना है,दूसरे ने जूतों को चुराया नहीं है। दोनों चल रहे हैं। फिर भी एक कर्मनिर्जरा कर रहा है और दूसरा पापकर्मबंधन कर रहा है। एक ही व्यक्ति एक ही क्रिया में स्थित है, किन्तु परिणामों की भिन्नता के कारण कभी वह पाप कर्म बांध लेता है और कभी कर्मों को क्षीण कर देता है।

राजर्षि प्रसन्नचन्द्र साधना में लीन थे। परन्तु भावों से युद्धस्थल में पहुंच गए, हिंसा के संस्कार सक्रिय हो गए, वे नरक में जाने के योग्य बन गये। परिणामों की दिशा बदली, हिंसा में अहिंसा व संयम के भावों में स्थित हुए, वहीं उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हो गया। शरीर से साधना में स्थित थे। परन्तु परिणाम की भिन्नता ने भिन्न-भिन्न निष्पत्ति ला दी। दृष्टिकोण का मिथ्यात्व और दूषित परिणाम व्यक्ति को भटकाते हैं।

आश्रव को कर्मकत्र्ता माना गया है। नव तत्वों में एक आश्रव तत्व ही कर्मों का कत्र्ता है। कर्मो का कत्र्ता छह द्रव्यों में जीव और नव तत्वों में जीव तथा आश्रव माना गया है। यहां जीव को कर्मकत्र्ता के रूप में स्वीकार किया गया है, वह जीव का आश्रवात्मक परिणाम ही है, उससे भिन्न और कुछ नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि आश्रव ही कर्मकत्र्ता है। कर्म का अकत्र्ता छह द्रव्यों में कौन और नौ तत्वों में कौन? इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। कर्म का अकत्र्ता छह द्रव्यों में छहों तथा नौ तत्वों में आठ तत्व आश्रव को छोड़कर।

आचार्य भिक्षु ने ‘तेरहद्वार्य में आश्रव और कर्म की भिन्नता को स्पष्ट किया है। कर्म आगंतुक है और आश्रव आगमन-मार्ग है। मकान का द्वार अलग है और आगन्तुक मनुष्य अलग है। ठीक इसी प्रकार कर्म अलग है और आश्रव अलग है। एक व्यक्ति जीव-हिंसा करता है उसके पाप कर्म का बंधन होता है यहां तीन तथ्य हैं। जिस कर्म के उदय से व्यक्ति जीव-हिंसा में प्रवृत्त हेाता है- उस कारणभूत कर्म को श्प्राणातिपातपापस्थान्य कहा जाता है। जीव को मारता है, वह मारना प्राणातिपात क्रिया है, प्राणातिपात आश्रव है, उससे जो पाप कर्म का बंध होता है, वह प्राणातिपात पाप-बंध है। साधना का विकास-क्रम है आश्रव से अनाश्रव की दिशा में प्रस्थान। ज्यों-ज्यों व्यक्ति बनता है, त्यों-त्यों वह दु:ख के मूल को खत्म कर डालता है।

प्रस्तुति: ललित गर्ग

 

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