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सूनी आंखों में अब तो सूख चले हैं आंसू

बैकुंठा साबर पिछले 3 महीने से नौपदा जेल में बंद था। उस पर नशे में धुत्त होकर अपने एक दोस्त पर हमला करने का आरोप था। वह तीन दिन पहले ही जमानत पर जेल से बाहर आया था। वैकुंठा ने 11 अप्रैल को गुस्से में आकर आपा खो दिया और अपनी पत्नी सुहागो साबर की हत्या कर दी। उसने उसे छूरे से गोद दिया और एक सिल से उसका सिर कुचल दिया। यह दर्दनाक कांड करने के बाद वह गांव के बाहर एक मैदान में उसका शव छोड़ कर पास के जंगलों में भाग गया।

पुलिस ने औपचारिकता निभाई और शव के शल्य परीक्षण (पोस्ट मार्टेम) के बाद उसकी लाश गांव वालों को सौंप दी। पड़ोसी उसकी लाश गांव के ठीक बाहर स्थित अंत्येष्टि मैदान में ले गए। उनमें से कुछ ने देखा कि बैकुंठा पास के एक जंगल से अपनी बीबी की लाश की अंत्येष्टि देख रहा था। उन्होंने गांव के ग्रामरखी को यह बात बताई जिन्होंने यह सूचना खैरियार के पुलिस चौकी को दे दी।

दूसरे दिन गांव कुछ चरवाहों ने बैकुंठा के शरीर को जंगल के एक पेड़ से लटकते हुए पाया। अपनी नृशंस करतूत के पाश्चाताप का बोझ वह सह न सका और अत्महत्या कर ली। जंगल से उसे ढूंढ़ निकालने के लिए जो पुलिस कर्मी आए थे, उन्होंने राहत की सांस ली। उनका काम कम हो गया था। उसकी पत्नी की चिता की आग अभी दहक ही रही थी। बैकुंठा

साबर की अंत्येष्टि भी उसी जगह पर कर दी गई जहां उसकी पत्नी की हुई थी। पुलिस के लिए ये दो मामले बंद हो चुके थे। खैरा पुलिस स्टेशन के ये दो मामले नंबर 8/ 2013 और 17/ 2013 रिकार्ड कम समय में बंद हो गए।

साबर एक भूमिहीन और गरीबी का मारा आदिवासी था। जब कभी काम मिल जाता था वह एक दिकी हाड़ी मजदूर तरह काम करता था। उसके पास एक छोटे कमरे वाली इंदिरा आवास झोंपड़ी थी जहां वह अपने बूढ़े मां-बाप, अपनी बीबी और 4 बोटियों के साथ रहता था। उसकी 11 साल की बेटी सावित्री सावर और 8 साल की जगयाशिनी साबर पास ही में चिंदपल्ला स्थित प्रोजेक्ट प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थी। दिलेश्वरी साबर महज 5 साल की थी और अगले सत्र में वह स्कूल जाने लगती। मासूम ममता साबर मात्र 18 महीने की है।

गांव वालों ने बताया कि बैकुंठा भला आदमी थी लेकिन वह बहुत पीने लगा था और पीकर हिंसक हो जाता था। वह कर्ज में बुरी तरह से डूबा हुआ था और अक्सर अपने परिवार का पेट भरने के लिए कर्ज लेता रहता था। वह हमेशा बस इतना चाहता था कि उसके सिर पर एक छत हो और उसका परिवार भर पेट खाए। शाम को महुआ की मदिरा के लिए भी उसे थोड़े पैसे चाहिए था। ले दे कर यही उसकी छोटी सी ऐय्याशी थी। उसने अपनी दो बेटियों के नाम बगल के स्कूल में लिखा दिए थे, जहां उन्हें दोपहर का खाना ( मिड डे मील) मिल जाता था। कम से कम एक वक्त का भोजन तो मिलना सुनिश्चित हो गया था। तीसरी बेटी भी कुछ महीने में स्कूल जाने वाली थी।

3 महीने पहले मैं फनास और बनीता पुंज का पता लगाने कालाहांडी गया था। ये उन दो महिलाओं के नाम हैं जिनकी वजह से 27 साल पहले एकाएक कालाहांडी शर्मिंदगी और शोहरत पर्याय बना गया। वे दोनों मुझे एक गांव में मिलीं जो बैकुंठा साबर के गांव से सिर्फ 30 किलो मीटर दूर था।

उनकी कहानी की वजह से कालाहांडी पिछड़ेपन और भूख से हुई मौतों के लिए कुख्यात हो गया। विकास संबंधी अर्थशास्त्र के विद्वानों को वह एक विषय मिल गया जिसे कालाहांडी सिंड्रोम (लक्षणों की समष्टि) का नाम दिया गया है।

यह 1985 का जून का महीना था जब अमलपल्ली फानगांव की स पुंजी ने 40 रुपए में अपनी 14 साल की ननद बनीता को बेच दिया था। उसने बेहद हतासा में यह कदम उठाया था। कारण, उसे भूख से बिलखते दो बच्चे थे और उनके अतिरिक्त खाने वाला कोई और भी होए उसके लिए यह अति थी। 14 साल की बनीता पास के गांव के एक अधेड़ उम्र के एक काने विद्या पोध को बेच दी गई थी। जब स्थानीय भाषाई अखबारों में यह खबर छपी तो राष्ट्रीय मीडिया में यह सुर्खियां बन कर छा गई। बाद में स्तब्ध करने वाली इस घटना की बातें जब फैलने लगी तो प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अमलापल्ली की यात्रा करनी पड़ी। वे अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ छप्पर वाले मिट्टी के घर में रहने वाली फनास पुंजी के घर गए और उन्होंने वहां वादों की वैसी ही बारिश कर दी जैसे रंगीन कागज के फूल झड़ रहे हों। राजीव गांधी की यात्रा से कुछ संक्षिप्त शब्द गढ़े चले गए। केबीके (कालाहांडी-बलंगीर-कोरापुत) गरीबी और भूख का पर्याय बन गया। पीएमओ (प्राइम मिनिस्टर कार्यालय) वह जगह बनी जहां से इसके बाद इन जिलों पर निगरानी रखी जाने लगी।

इन पिछले 27 सालों में कालाहांडी कई उथल पुथल के दौर से गुजर चुका है। भारी मात्रा पैसे आए और खर्च भी हो गए। लेकिन अभी भी गरीब राज्य उड़ीसा में यह जिला सबसे गरीब है। कालाहांडी राजनेताओं, नौकरशाहों और तथाकथित विकाश पेशेवरों के लिए सिर्फ एक सीढ़ी बन कर रह गया है। चरम गरीबी की प्रतीक बन गए फनास पुंजी और बनीता की दुर्दशा पर अभी भी लिखा जा रहा है, बार बार लिखा जा रहा है। मेरी रिपोर्ट की वजह से बनीता को एक घर मिल गया था और एनएसी की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कुछ रुपए भी दे दिए थे।

मैं एक बार फिर कालाहांडी पहुंचा था। इस बार एक स्थानीय भाषाई दैनिक में बैकुंठा साबर की 6 पेज पर छपी एक छोटी स्टोरी के बाद में वहां गया था। मैं अपने साथ स्थानीय विधायक हितेष बगारती, उमेश खंडेलवाल और खैरार में यूथ ऑफ ऐक्शन एंड रिसर्च नामक एनजीओ चलाने वाले युवा सामाजिक कार्यकर्ता सुमितेश होता को भी लेता गया था। घटना को हुए महज एक सप्ताह हुए थे। लेकिन राज खैरियार के बहुत कम लोगों को यह घटना याद थी। गांव के लिए चलने के पहले ही मुझे यह अंदाजा हो गया था कि यह घटना भी भारत की भूख और गरीबी की शर्मनाक घटना के रूप में ही सामने आएगी। हम दोपहर बाद सुनारी सिकुआन गांव पहुंचे। नई नई बनी पक्की सड़क गांव से उच्च पथ को जोड़ रही थी। सड़क ऐसी कि इसके सामने राज्य की राजधानी भुवनेश्वर की सड़कें भी शर्मिंदा हो उठें।

गांव वालों ने जल्द ही हमें वह घर दिखा दिया। यह एक जर्जर हो गई इंदिरा आवास झोपड़ी थी जो अब गिरी तो तब गिरी जैसी स्थिति में थी। हम जिस जीप में आए थे, उसे देख कर और विधायक को पहचान कर कई गांव वाले पास आए और शिकायत की कि उन्हें अभी तक बीपीएल राशन कार्ड नहीं मिले थे। गांव की घरों की दीवारों पर बड़े बड़े हरफों में कई कार्यक्रमों के नाम तो लिख दिए गए हैं लेकिन उन्हें इसके तहत अबतक कोई रोजगार नहीं मिले हैं। हमने उनसे बैकुंठा के परिवारए उनके बच्चों और माता पिता के बारे में पूछा। भीड़ के ज्यादातर लोग वहां से फुट लिए और मैंने जो सवाल पूछे उनके जबाव देने से इनकार किया। एक युवा महिला ने एक लावारिस लड़की की तरफ इशारा किया जो हम लोगों को उत्सुक नजरों से देख रही थी। वह एक फटा हुआ कपड़ा पहने थी और उसके चेहरे पर डरा की छाया थी। गांव की दूसरी महिला ने उसे भरोसा दिलाया कि हमलोग पुलिस नहीं हैंए तभी बैकुंठा की दूसरी बेटी जगयासिनी पास आई। हमलोगों ने उसे उसकी बहनों को बुलाने के लिए कहा तो वह सड़क के पीछे बने घरों में घुस गई।

कुछ समय बाद सबसे बड़ी बहन सावित्री अपनी 3 छोटी बहनों के साथ झोंपड़ी से बाहर निकली। वे बुरी तरह से कुपोषित दिख रही थीए स्तब्ध एवं सदमें में लग रही थी। बूढ़ी दादी तो पागल सी हो गई है। उसके मुंह एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा है। मेरे साथ पूरे बातचीत में बच्चियों में सबसे बड़ी सावित्री सिसकती रही। संभवत: वही एक थी जो स्थिति को समझ रही थी। दूसरी बच्चियां इतनी छोटी थी कि वे मौत क्या होता हैए समझती भी नहीं होगी। उसकी दो बहनें उसके बगल से कभी नहीं हटीं। कृशकाय बूढ़ी दादी की गोद में उनकी सबसे छोटी बहन बेजार रोती जा रही थी। दादी मुनगा साबर कहती है. वह कुछ नहीं खाती है। मुझे डर है कि वह भी नहीं बचेगी। रोती हुई 18 महीने की बच्ची लगती थी जैसे अभी अभी पैदा हुई हो। मैंने उससे पूछा कि वे उस बच्ची को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गई या नहीं तो उसने उसका जबाव ना में दिया। गांव के दूसरे लोगों ने बताया कि बहुत महीने से वहां कोई डॉक्टर ही नहीं है।

पुराने कुपोषण की पहचान के लिए किसी चिकित्सीय विशेषज्ञता की जरुरत नहीं है। बच्चों के कमजोर शरीर एवं उनके पिचके चेहरों और छाती की निकली हुई हड्डियां के रूप में कुपोषण के निशान साफ साफ चुगली कर रहे थे। सबों की आंखें में हताशा के भाव थे। यहां तक कि मेरी अप्रशिक्षित आंखें भी कैलोरी और पोषक तत्वों की वजह से उभर आए शारीरिक चिह्नों से अछूती नहीं रही। मैंने गांव वालों से पूछा कि उन्होंने परिवार के लिए क्या सोच रखा है। विधायक ने उनसे इस बारे में सलाह मांगी। लेकिन कोई कुछ कहने को तैयार नहीं। वहां जो गांव वाले मोजूद थे उन सबों के चेहरे पर एक साथ शर्मिंदगी दिख रही थी। बार बार पूछने पर उन्होने कहा कि ज्यादा अच्छा होगा कि बच्चियों को गांव से ले जाया जाए क्योंकि वे वहां रहीं तो वे बदनाम हो जाएंगे। विधायक ने उन्हें बताया कि पास में 5 किलो मीटर दूर गंदाबहाली में आदिवासी कल्याण आश्रम है। लेकिन गांव की महिलाओं ने कहा – नहीं, उन्हें यहां से ले जाओ। उनके मरे हुए माता पिता के भूत उन्हें डराने आएंगे। बेसहारा दादा-दादी ने अपने भाग्य के सामने घुटने टेक दिए और हामी में सिर हिला दिया।
बुजुर्ग व्यक्ति ने मुझे कहा कि बैकुंठा ने बीपीएल कार्ड और अपने परिवार का चुनाव पहचान पत्र जला दिया था। वह किसी अधिकारी के पास मदद के लिए आवेदन भी नहीं दे सकता। घटना के एक सप्ताह बीतने और बच्चियों की दुर्दशा की खबरें स्थानीय अखबारों में छपने के बाद भी वहां अब तक कोई सरकारी अधिकारी नहीं आया था। यहां तक कि सरपंच ने भी वहां आने की जहमत नहीं उठाई थी। हमने पूर्व सरपंच गोपीनाथ बैथुरु से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि मौजूदा सरपंच एक आदिवासी महिला है जिसे इसकी खबर दे दी गई है लेकिन वह अब तक दिखी नहीं है। दरअसल, पुलिस को छोड़ कर बच्चियों के माता पिता की मौत के बाद उस परिवार तक पहुंचने वाले हम पहले लोग थे।
मारवाड़ी युवा मंच के राष्ट्रीय संयोजक उमेश खंडेलवाल ने इन बच्चियों के पुनर्वास में होने वाले सभी खर्च वहन करने की पेशकश की। हमने बच्चियों से पूछा कि क्या वे हमारे साथ चलेंगी तो वे डर के मारे वे एक दूसरे से लिपट गईं। हम लोग मिल कर परिवार को कुछ पैसा देना चाह रहे थे लेकिन उसे लेने को भी कोई तैयार नहीं हो रहा था। आखिरकार बूढ़े हमसे कुछ लेने को तैयार हो गए।
भारतीय संविधान की कुछ खास विशेषताओं में एक कल्याणकारी राज्य स्थापित करने की कोशिश करना है। हमारे संविधान के निर्माताओं ने राज्य नीति की प्रस्तावना और नीति निर्देशक सिद्धांतों के जरिए कल्याणकारी एवं समाजवादी राज्य के प्राथमिक लक्ष्य को साफ साफ बता दिया है। यह वादा करता है कि भारत के लोगों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनातिक न्याय सुनिश्चित करेगा। नीति -निर्देशक सिद्धांत गैर-न्याय संगत हैं ( क्योंकि उन्हें कानून की अदालत लागू नहीं करवा सकती), फिर भी देश के शासन में उसे बुनियादी तत्व माना जाता है।

संविधान का अनुच्छेद 38 कहता है – राज्य जितने प्रभावी ढंग से हो सके, एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना सुनिश्चित करेगा और उसे बनाए रखेगा जिसमें राष्ट्रीय जीवन के सभी संस्थानों में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को प्रमुखता मिलेगी। इसके जरिए वह लोगों के कल्याण

को बढ़ावा देगा। यह अनुच्छेद कल्याणकारी राज्य के आदर्श की स्थापना का एक विस्तृत दायरा मुहैया करता है। अनुच्छेद 46 राज्य को निर्देशित करता है कि वह लोगों में गरीब तबकों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा और उसे बढ़ाने पर पर विशेष ध्यान देगा। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों पर उसे खास ध्यान रखना है। राज्य सामाजिक अन्याय और शोषण के सभी तरीकों से भी उनकी रक्षा करेगा। सुनारी सिकुआन के इन लावारिसों के लिए कल्याणकारी राज्य के दूध के सभी स्रोत सूख गए हैं। उन स्रोतों को धोखेबाज राजनेताओं, लालची नौकरशाहों, भ्रष्ट अधिकारियों एवं मुनाफाखोर एनजीओज ने दूह लिया है। दूध के इन स्रोतों पर झुर्रियां पड़ गई हैं और वे सूख कर पिचक से गए हैं।
सुमितेश ने मुझे बताया कि विकासीय एवं कल्याणकारी योजनाएं आदिवासियों के दुखी जीवन में जरा सा बदलाव भी नहीं ला पाई हैं। बल्कि कालाहांडी- बोलंगीर को गरीबी के रूप में शोकेस किया जाता है। पश्चिमी उड़ीसा को गरीब और वंचित बनाए रखने का फायदा जो है। सरकार ने भूख बेल्ट के बीचो बीच खैरियार रोड के पास एक हवाई पट्टी तक बना रखी है ताकि इस सतत गरीबी को एक के बाद दूसरे लगातार प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री यहां आकर राजनीतिक रूप से भुना सकें।

इससे पहले राज खैरियार बस स्टैंड पर मेरी मुलाकात एक कंदर्प तांडी से हुई थी। उसने मुझे बताया कि वह और उसकी पत्नी सिन्नापल्ली से 30 किलोमीटर रोज शहर में भीख मांगने आते हैं। उसे बुढ़ापे के पैंसन के तौर पर हर महीने 300 रुपए मिलते जरुर मिलते हैं लेकिन यह जीवन यापन के लिए बहुत कम पड़ता है। झिल्ली वाली आंखों वाला वह बूढ़ा किसी तरह लडख़ड़ा कर चल रहा था। मैं सोचने लगा घूम घूम वह भीख कैसे मांगता होगा।

इसमें मीडिया का भी कम दोष नहीं है। मैं एक स्थानीय अखबार में एक छोटी सी खबर पढ़ कर सुनारी सिकुआन गया था। यह भुवनेश्वर से अच्छा दूर है, 650 किलोमीटर। वहां पहुंचने के पहले मैं खैरियार रोड और बाद में राज खैरियार में पत्रकारों से मिला था। सभी इस घटना के बारे में जानते थे

लेकिन उससे क्या, कालाहांडी में अब मौत कोई खबर नहीं है, कोई जघन्य मौत भी नहीं और उसके बाद हुई आत्महत्या भी नहीं, चार बेसहारा लावारिश बच्चों की तो विल्कुल नहीं।

नौपदा से वापस लौटते समय मुझे दिल्ली में 5 साल की बच्ची के बलात्कार की दिल दहला देनी वाली घटना का पता चला। कालाहांडी की इन चार लावारिश बच्चियों के भाग्य में जो लिखा है वह भयानक एवं अमंगलकारी लगता है। मैंने समाहर्ता (कलेक्टर) और दूसरे अधिकारियों को लिखा है लेकिन उनसे मुझे नहीं के बराबर आशा है। जो भी किया जाएगा वह बहुत कम होगा और बहुत देर से किया जाएगा।

गरीबी की विडंबना
कालाहांडी की गरीबी का चरित्र परस्पर विरोधाभाषी है। इसे हमेशा सूखे की गिरफ्त में रहने वाला क्षेत्र माना जाता है। पिछले चार दशकों से इस क्षेत्र में लगातार सूखे की स्थिति बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैसे क्षेत्र से जो पारिस्थितिकी के हिसाब से नष्ट हो गया हो, वहां से मानवीय दुख को कम करना लगभग असंभव है। इसका एक ही विकल्प है जो टिकने वाला है और वह है कि उन्हें लगातार भोजन और वित्तीय मदद मिलती रहे। कालाहांडी में जो सतत भूख और गरीबी है, वह हर कोई जानता है। लेकिन लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि यह भूख और भुखमरी प्रचुरता के बीच पल रही है।

यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से संपन्ना है, वन और खनिज के भंडार, दोनों मामले में। साथ ही यहां विशाल श्रम शक्ति है। यहां के जमीन की जोत का आकार पंजाब में जोत के औसत आकार से बड़ा है। यहां पंजाब से ज्यादा बारिश होती है और इस जिले में फसल लगने वाला क्षेत्र उड़ीसा में सबसे बड़ा है। यहीं राज्य में सबसे अधिक चावल मिलें भी हैं।

कोरापुतए बलंगीर और कालाहांडी के अविभक्त जिले, जो केबीके के नाम से चर्चित है, देश के कुछ सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक हैं। केबीके क्षेत्र में अब 8 जिले (कोरापुत, मलकानगंज, नबरंगपुर, रायगढ़, बलंगीर, सोनेपुर, कालाहांडी और नौपदा) आते हैं। इन 8 जिलों में 14 सबडिविजन, 37 तेहसिल, 80 ब्लॉक. 1437 ग्राम पंचायत और 12104 गांव हैं।

आजादी के 66 साल बाद भी कुल आबादी के लगभग 75 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे बदहाल हैं। केबीके जिले की आबादी 20.50 प्रतिशत है और यह उड़ीसा के कुल भोगोलिक क्षेत्र का 30.59 प्रतिशत है। इन जिलों के करीब 90 प्रतिशत लोग गांवों और दूर दराज के इलाकों में रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार केबीके जिलों के करीब 40 प्रतिशत लोग अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में हैं और 18 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति समुदायों के हैं। राज्य में यहां की साक्षरता दर तो सबसे कम है हीए राष्ट्रीय औसतों में भी सबसे कम है। महिला साक्षरता महज 25 प्रतिशत है। वर्ष 2010 की गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों की जनगणना के अनुसार करीब 70 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। नौपदा जिले में 85 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं जो सबसे अधिक है। वहीं बलंगीर में 61 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं जो सबसे कम है। करीब 80 प्रतिशत आदिवासी मजदूर खेती एवं खेतों में मजूरी कर जीवन यापन करते हैं। कालाहांडी को जिस भयानक गरीबी ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है वह मानक आर्थिक मॉडलों की समझ के दायरे से परे है। और शायद यही कारण है कि अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री इस सतत त्रासदी और गुलामी के मानवीय पहलू को अब तक नहीं देख पाए हैं। अगर विकास के लिए मिली सहायता आर्थिक वृद्धि का एक मात्र पैमाना है तो कालाहांडी बुरी तरह असफल रहा है। विकास सहायता के रूप में एक रुपए का 15 पैसा भी उन लोगों के पास नहीं पहुंच पाया है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरुरत है। वास्तिवक लाभार्थी वे सरकारी अधिकारी हैं जो अक्सर रिश्वत देकर इन 4 जिलों में कहीं भी नियुक्त होकर वहां जम जाते हैं।

 

अनिल धीर,कालाहांडी से

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