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शंखनाद अब हिन्दी में भी… भारतीयता की संवाहक उदय इंडिया

उदय इंडिया ने शुरुआत भले ही अंग्रेजी से की हो लेकिन मूल मानस तो हिन्दी ही है। इसे प्रमाणित करने के लिए उदय इंडिया को किसी प्रकार का तर्क देने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। यह संकल्प उदय इंडिया के पहले शब्द उदय से स्पष्ट है। उदय इंडिया परिवार के लिए उसकी मातृभाषा हिन्दी एवं उसका देश भारत यानि इंडिया सबसे पहले आता है। इसीलिए अंग्रेजी पत्रिका के नाम में भी हिन्दी का शब्द उदय और उसे भी इंडिया के अंग्रेजी शब्द से पहले लगाया गया। पत्रिकारिता अंग्रेजीदां लोगों के बीच उदय ने पूरी दबंगई के साथ अपनी मजबूत जगह बनाई। अब उदय इंडिया आपके हाथ में हिंदी में है। इसका विमोचन नई दिल्ली के हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर सभागार में रामनवमी के पवित्र अवसर पर 19अप्रैल की शाम को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. योगानन्द शास्त्री, राष्ट्रवादी कांग्रेस के सांसद डी.पी.यादव, भीलवाड़ा समूह के अध्यक्ष लक्ष्मीनिवास झुनझुनवाला, मध्यप्रदेश सरकार के जनअभियान परिषद् के उपाध्यक्ष डॉ. अजय मेहता, मुनि लोकेश,उदय इंडिया अंग्रेजी के मुख्य सम्पादक प्रकाश नन्दा, सम्पादक दीपक रथ जैसे गणमान्य व्यक्तियों के कर कमलों से हुआ।
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि यह तर्क बेतुका है कि अंग्रेजी के बगैर तरक्की नहीं की जा सकती। असल में ऐसा तर्क देने वाले अभी मानसिक रूप से आजाद नहीं हो पाए हैं। विश्व में ऐसे देशों की कमी नहीं है जिन्होंने अंग्रेजी का वर्चस्व स्वीकार नहीं किया और विश्व में अपना लोहा मनवाया। इसलिए इस मानसिकता से उबरना चाहिए कि अंग्रेजी के बगैर तरक्की नहीं हो सकती। उदय इंडिया के पहले हिन्दी संस्करण का विमोचन करते हुए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस खाते हुए उनके उस तर्क को सिरे नकार दिया कि अंग्रेजी के बगैर तरक्की नहीं की जा सकती। रूस, जर्मनी, इस्रायल जैसे देशों का उल्लेख करते हुए श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि जब ये देश तरक्की कर सकते हैं तो भारत हिन्दी को सम्मानजनक स्थान दे कर तरक्की क्यों नहीं कर सकता। उनका कहना था कि आत्मविश्वास की कमी ही इस प्रकार के तर्क पैदा करती है। अंग्रेजी के बगैर तरक्की करने का जिस दिन संकल्प ले लिया जाएगा उस दिन से हिन्दी के प्रचार प्रसार के मार्ग में कोई नहीं आ सकता।
असली अयोध्या भारत में नहीं, थाईलैंड में
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. योगानन्द शास्त्री के अनुसार थाईलैंड वासियों का दावा है कि असली अयोध्या भारत में नहीं है बल्कि थाईलैंड में खुदाई में निकला एक नगर असली अयोध्या है।
इस मौके पर भाजपा अध्यक्ष ने पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का स्मरण करते हुए कहा कि आजाद भारत में यदि किसी नेता ने ईमानदारी से भारत में हिन्दी को सम्मानजनक स्थान दिलाने की कोशिश की थी तो वह केवल पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री थे। भारत की आजादी के साथ ही 1947 में हिन्दी को देश में उपयुक्त स्थान न दिला पाना सबसे बड़ी चूक बताते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी को जो स्थान 1947 में मिल जाना चाहिए था, उसे वह स्थान न देना सबसे बड़ी गलती रही है। आजादी हांसिल करने के बाद भी मानसिक दृष्टि से हम आजाद नहीं हो सके हैं।
सभी भारतीय भाषाओं के पक्ष में बोलते हुए श्री राजनाथ सिंह का कहना था कि यह सुन कर बहुत तकलीफ होती है कि अंग्रेजी के बगैर प्रगति नहीं की जा सकती है और जो देश अंग्रेजी नहीं जानता वह विकासित देशों की पांत में खड़ा नहीं हो सकता। इसके लिए उन्होंने रूस, फ्रांस, जर्मनी, इस्रायल का उल्लेख किया कि इस्रायल जब हिब्रु में अरब देशों के दांत खट्टे कर सकता है तो भारत हिन्दी में विश्व का लोहा क्यों नहीं मनवा सकता। अंग्रेजों ने भी अंग्रेजी को इंगलैंड से बाहर ले जाकर उसे अन्तरराष्ट्रीय भाषा बना दिया। ऐसा ही संकल्प भारत को भी लेना चाहिए।
देश के अन्य राज्यों के अपने अनुभवों को उदय इंडिया के साथ बांटते हुए श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि वह मद्रास में बोलते हैं तो लोग उनसे हिन्दी में बोलने की अपेक्षा करते हैं। ऐसे ही नागालैंड के लोग भी उनसे हिन्दी में ही सुनना चाहते हैं। उनका कहना था कि गैर हिन्दी भाषी लोग हिन्दी समझते हैं।

उन्होंने टीवी पर हिन्दी फिल्में देख कर हिन्दी समझना सीख लिया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में लोग सैनिकों की गतिविधियों से हिन्दी सीख गए हैं। श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीयता और भारतीयत्व की बात हिन्दी के अतिरिक्त दूसरी भाषा में नहीं समझी जा सकती। भाषा व्यक्ति की सोच और चिन्तन को भी प्रभावित करती है। भाषा का अपना महत्व है। सभ्यता और संस्कृति के निर्माण में भाषा का अपना महत्व है।

जर्मन चिंतक को उद्धृत करते हुए भाजपा अध्यक्ष का कहना था कि भारत को एक जिन्दगी में नहीं समझा जा सकता। भारत को समझने के लिए भारत के आकाश तले कई जिन्दगियां गुजारनी पड़ती हैं। तभी भारत को समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत और भारतीयता को त्याग और समर्पण से ही समझा जा सकता है। किसी विदेशी छात्र से यदि महान राजाओं के नाम पूछे जाएं तो वह नेपोलियन, चाल्र्स, लुई आदि के नाम लेते हुए उसके कारणों में उनके सैन्य बल को बताएगा। लेकिन यदि किसी भारतीय छात्र से यदि यही सवाल किया जाए तो वह दो नाम अवश्य लेगा-राजा रामचन्द्र और राजा हरिश्चन्द्र। उनके पास राज करने के लिए अधिक भौगोलिक भूमि नहीं थी और न ही अधिक सैन्य बल था। लेकिन उनमें त्याग और समर्पण था।
नेताओं को मार्गदर्शन
मार्गदर्शन देने का काम विद्वानों का होता है। यह आवश्यक नहीं कि हर नेता विद्वान ही हो। नेताओं को भी मार्गनिर्देशन विद्वानों से ही लेना होता है। अपने राज्य के विद्वानों का सम्मान न करने वाले राजा का अपने राज्य के विद्वानों का सम्मान नहीं करता अस्तित्व अधिक समय तक नहीं रहता है। वह राजा अपने राज्य और समाज का अधिक कल्याण भी नहीं कर पाता है।
राजनाथ सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनता पार्टी
उदय इंडिया परिवार को हिन्दी में पत्रिका निकालने के लिए साधुवाद देते हुए श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि वह आश्वस्त हैं कि जिस प्रकार थोड़े ही समय में अंग्रेजी में उदय इंडिया ने पत्रकारिता जगत में अपनी साख बनाई है उसी प्रकार हिन्दी में भी उदय इंडिया अपनी साख को और मजबूत करेगी।
इससे पूर्व दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. योगानन्द शास्त्री ने भी उदय इंडिया परिवार को हिन्दी में पत्रिका निकालने पर बधाई देते हुए इस बात पर खुशी जाहिर की कि उदय इंडिया भारतीयता के अपने शंखनाद को बढ़ा रहा है। उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि हमने भारतीयता पर गर्व करना छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि हम सब दुविधा में जी रहे हैं। हमें विचार करना चाहिए कि क्या आने वाली पीढिय़ां भारतीयता को समझ सकेंगी। उनका कहना था कि लोग या तो भारतीयता को जानते नहीं या फिर उन्होंने भारतीयता पर गर्व करना छोड़ दिया है। नौबत तो यहां तक आ गई है कि आने वाली पीढिय़ां भारतीय संस्कृति, भारतीय परम्परा और भारतीय सभ्यता को नहीं जान पाएंगी। उनका कहना था कि भारतीयता को जानने वालों का अकाल हो गया है। हम अपनी ही शिक्षा को भूलते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता बहुत ही कठिन दौर से गुजर रही है। जो 332 पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं, उनकी हालत बहुत अच्छी नहीं है। स्वाधीनता के जमाने में लघु पत्र-पत्रिकाओं का बहुत महत्व था। उस जमाने में दो लघु पत्रिकाओं का बहुत महत्व था जिन्होंने भारतीय जनमानस को बहुत अधिक प्रभावित किया। इनमें से एक पत्र था गणेश शंकर विद्यार्थी को ”प्रताप्य्य और दूसरा था ”हरिजन्य्य जिसे बापू गांधी निकाला करते थे। अन्य कई और भी पत्र थे जिन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम को प्रभावित किया था। लेकिन आज परिस्थितियां दूसरी हैं। इन दुरूह परिस्थितियों में पत्र.पत्रिकाओं को निकालना और चलाना अपने आप में बहुत कठिन है।
डॉ. योगानन्द शास्त्री ने बृहत्तर भारत की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि एक जमाना था जब सारी दुनिया के लोग यहां आकर आचरण की शिक्षा लिया करते थे। चीनी यात्री यहां से लौट कर गए तो उन्होंने भारतीय सभ्यता का प्रचार प्रसार किया। क्योतो में बने जापानी शैली के मंदिर में मां सरस्वती की प्रतीमा विराजमान हैं। बृहत्तर भारत में जावाए सुमात्राए म्यंमारए कम्बोडिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया शामिल थे। कम्बोडिया के एक मंदिर के आसपास बने मंदिरों का परिसर 40किलोमीटर में फैला है। कम्बोडिया सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने वहां 40 इंजीनियरों को भेज कर उन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया। आज भी वहां विश्व के सभी देशों से लोग उन मंदिरों को देखने के लिए जाते हैं। इसी प्रकार थाईलैंड में एक नगर निकला है जिसे वहां के लोग असली आयोध्या होने का दावा करते हैं। उन्होंने बताया कि थाईलैंड में बने राजमहल की चाहरदिवारी में अंदर की ओर तैल चित्रों में पूरी रामायण अंकित है।
उन्होंने बताया कि भारत में वर्ष में एक बार रामलीला होती है लेकिन इंडोनेशिया में एक स्थान पर हर चालीसवें दिन पूरी रामायण का मंचन होता है।
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष ने इस बात पर प्रसन्नता जाहिर की कि उदय इंडिया भारतीयता का शंखनाद देशवासियों तक पंहुचाने के लिए कृत संकल्प है। उन्होंने कहा कि आज भी लोग इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से अधिक प्रिंट मीडिया पर विश्वास करते हैं। उदय इंडिया केवल सामान्य पत्रिका बन कर न रह जाएए वह भारतीय संस्कृति और परम्परा की संदेशवाहक भी बन कर आम आदमी के पास पंहुचे।
गुरूकुल की परम्पराओं और भारतीय आचार्यों की महानता का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि गुरूकुल में छात्रों के उपनयन संस्कार के दोरान आचार्य वेदमंत्रों से संकल्प लेता था-”हे बालक! मैं तीन काल रात्रि तझे उसी प्रकार अपने गर्भ में रखूंगा जिस प्रकार एक मां अपने गर्भस्थ शिशु का पालन पोषण करती है। तुझे शिक्षा दूंगा और जब तू स्नातक बन कर निकलेगा तो देवता भी तुझे देखने के लिए आएंगे।

जब छात्र शिक्षा ग्रहण कर गुरूकुल से जाता था तब गुरू कहता था-”स्वाध्याय करना और यहां से हमारी अच्छाइयां अपने साथ ले जाना और बुराइयां यहीं छोड़ कर जाना। यह थी भारत के आचार्यों की महानता। विश्व में कहीं कोई शिक्षक अपने छात्र के समक्ष खड़े हो कर कहने की हिम्मत नहीं कर सकता कि उसमें भी कोई कमी हो सकती है। भारतीय

आचार्य ही अपने छात्रों को कह सकते हैं कि वे उनकी कमियों को न लें। इसीलिए भारत विश्वगुरू कहलाया करता था।
उन्होंने दो हजार वर्ष पहले मुंगेर के निकट चम्पा से कम्बोडिया गए दो हजार भारतीय साहसी नाविकों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि आज कोलम्बस और वास्कोडिगामा को सब कोई जानते हैं लेकिन उन भारतीय नाविकों का कोई उल्लेख नहीं होता जिन्होंने कम्बोडिया जा कर भारतीयता की धाक जमाई और भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने चम्पा से होने वाले व्यापार को समाप्त कर दिया। भारत को सोने की चिडिय़ा इसीलिए कहा जाता है कि विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 20 प्रतिशत था। लेकिन आज पूरा जोर लगा देने के बाद भी भारत का हिस्सा 3प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
विदेश में भारत का लोहा मनवा रही प्रतिभाओं को वापस भारत लाने का आग्रह करते हुए उन्होंने बताया कि नासा का अन्तरिक्ष विज्ञान केन्द्र में दूसरे स्थान पर कार्यरत जे.एस. राठी का वहां बहुत सम्मान है। राठी हरियाणा के वासी हैं। उन्हीं की तरह दुनिया के अन्य देशों में भारतीय प्रतिभाएं देश का नाम रोशन कर रही हैं। भारत सरकार को उन्हें वापस लाकर उनका सम्मान करना चाहिए। इससे भारतीय प्रतिभाओं का पलायन रूकेगा और देश को लाभ होगा।
कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी ने उदय इंडिया को हिन्दी में प्रकाशित किए जाने के संकल्प की सराहना करते हए कहा कि भारतीय संस्कृति कभी संकुचित नहीं रही है। उसका रूप हमेशा विशाल रहा है। वह समावेशी रही है और दूसरों को स्वीकार करना उसकी मूल प्रकृति का अंग रहा है। श्री चतुर्वेदी ने युगपुरूष स्वामी विवेकानन्द की
150वें वर्ष समारोहों का जिक्र करते हुए उनके आरम्भिक भाषण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि भारतीयता सभी धर्मों को स्वीकार करती है। उसका दृष्टिकोण हमेशा मानवीय रहा है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि उदय इंडिया राजनीतिकए आर्थिक और भारतीय चेतना के साथ सांस्कृतिक चेतना की भी संवाहक बनेगी। रामनवमी के पर हो रहे उदय इंडिया हिन्दी के विमोचन के अवसर पर उन्हें उम्मीद है कि श्रीराम की लोकप्रियताए मर्यादा और आदर्श उसे बल प्रदान करेंगे।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के डी.पी. यादव ने उदय इंडिया को बधाई देते हुए कहा कि भारतीयता को स्पष्ट करते हुए कहा कि दूसरे को सहयोग देना धर्म है और दूसरे का शोषण करना अधर्म है। यही भारतीय ऋषियों की परम्परा का मूल मंत्र है। भीलवाड़ा समूह के अध्यक्ष लक्ष्मीनिवास झुनझुनवाला ने बेहद प्रसन्नता जाहिर की कि उड़ीसा का एक पत्रकार दीपक रथ हिन्दी में पत्रिका के प्रकाशन का संकल्प ले कर उसे क्रियान्वित कर रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि हिन्दी की उदय इंडिया अंग्रेजी में प्रकाशित हो रही उदय इंडिया का अनुवाद भर नहीं होगी बल्कि उसमें प्रकाशन सामग्री पूरी तरह से स्वतन्त्ररूप में हिन्दी में ही लिखी जाएगी। उदय इंडिया के अंग्रेजी संस्करण के मुख्य सम्पादक प्रकाश नन्दा ने आम आदमी के सशक्तिकरण की आवश्यकता पर बल दिया।
इस मौके पर उदय इंडिया के संस्थापक संपादक दीपक रथ और अन्यों ने उदय इंडिया को अपने लेखन से निरन्तर सहयोग देने वालों का सम्मान किया। कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाने वालों में उदय इंडिया के प्रबंध-संपादक प्रफुल्ल सखलेचा, सलाहकार स्वदेश पाल गुप्ताए भारत भूषण,ब्यूरो प्रमुख निर्मल जैन, सलाहकार सम्पादक डॉ. विजय खेरा, रेणु मित्तल, कुलसुम मुस्तफा, लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप, नेशनल दुनिया के सम्पादक कुमार आनन्द, दिल्ली के विधायक डॉ. शिवचरण लाल गुप्ता, भाजपा की राष्ट्रीय मंत्री वाणी त्रिपाठी, कर्नाटक शाखा के संचालक विजय राज आदि शामिल थे।

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