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अतीत की स्मृति, वर्तमान की उतेजना और भविष्य की अनिश्चितता ले जाती है ज्योतिषी के पास: डॉ. के.एन. राव

वर्तमान की उतेजना और भविष्य की अनिश्चितता ले जाती है ज्योतिषी के पास: डॉ. के.एन. राव
एनडीए सरकार के दौरान डॉ. मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे। तब यूजीसी में ज्योतिष को डिग्री के रूप में शामिल किया गया था। लेकिन यूजीसी के इस कदम को अदालत में चुनौती दे दी गई। उस वक्त विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषी डॉ. कोट्टमराजू नारायण राव (डॉ. के.एन. राव) एकमात्र ऐसे ज्योतिषी थे जिन्होंने भारत के सभी ज्योतिषियों को एकजुट होने का आह्वान किया था। ज्योतिषियों ने उन्हें इस बारे में उनका साथ देने का आश्वासन तो दिया लेकिन कोई ज्योतिषी आगे नहीं आया। तब डॉ. राव ने उच्चतम न्यायालय में अकेले खड़े होकर इस विषय को अदालत के सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने 22 मिनट तक डॉ. राव की बात सुनी और ज्योतिष के पक्ष में फैसला दिया कि जो विश्वविद्यालय इस विषय को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहता है, वह उसे अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर सकता है।

भारत सरकार के नियन्त्रक एवं महालेखाकार पद से सेवा निवृत हुए डॉ. राव ने लगभग 12 वर्ष की आयु से ज्योतिष का अध्ययन आरम्भ किया था। ज्योतिष की विद्या उन्हें अपनी मां के. सरसवाणी देवी से ईश्वरीय आशीर्वाद के रूप मिली थी। उनकी माताजी ज्योतिष के ‘प्रश्न शास्त्रÓ और ‘विवाह-संतानÓ जैसे विषयों में विशेष रूप से प्रवीण थीं।

ज्योतिष के अध्ययन की तपस्या डॉ. राव आज भी कर रहे हैं। प्रतिष्ठित पत्रकार तथा नेशनल हेराल्ड के संस्थापक-सम्पादक स्व. के. रामाराव के पुत्र डॉ. के.एन. राव अपने अध्ययन और शोध के साथ ही पिछले ढाई दशकों से ज्योतिष का प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं और ज्योतिष को लेकर समाज में फैले भ्रमों को दूर कर उजियारा फैलाने में लगे हैं। लगभग 85 वर्ष की आयु के डॉ. राव पिछले ढाई दशकों से भारतीय विद्या भवन में ज्योतिष का अध्ययन बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से चला रहे हैं। यह वर्ष भारतीय विद्या भवन में ज्योतिष अध्ययन का 25वां वर्ष है जहां लगभग 30 अध्यापक अध्यापिकाएं हैं और तकरीबन 1100 विद्यार्थी यहां ज्योतिष सीखते है। परीक्षाएं देते है। डिग्री लेते हैं। इस संस्थान से ज्योतिष की शिक्षा लेने वालों में केवल सामान्य वर्ग के लोग ही नहीं बल्कि विभिन्न विभागों के अनेक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, बिजनेस मैन, शोध छात्र आदि शामिल हैं।

डॉ. राव का मानना है कि ज्योतिष जैसी पवित्र विद्या को अंधविश्वासों से जोड़ कर दुख दूर करने के उपायों के नाम पर लोगों को ठगा और लूटा जा रहा है। जिस से ज्योतिष के प्रति लोगों का विश्वास समाप्त होता जा रहा है। जबकि सच्चाए ईमानदार और विद्वान ज्योतिषी लोगों के जीवन की परेशानियों को दूर करने के लिए मार्गदर्शक का काम करता है।

ज्योतिष के वास्तविक उद्देश्य के बारे में डॉ. राव का मानना है कि ज्योतिष निश्चित रूप से विज्ञान है लेकिन जिस प्रकार से विज्ञान की सीमाएं होती हैं, ज्योतिष की भी अपनी सीमाएं हैं। विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में लगातार अनुसंधान चल रहे हैं। विज्ञान के अनुसंधानों पर भारी धन खर्च हो रहा है जबकि ज्योतिष के क्षेत्र में ऐसा नहीं है।

उनका कहना है कि एक ही कुंडली या घटना पर विद्वान ज्योतिषियों की भी अलग भविष्यवाणियां हों तो कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। एक रोगी यदि कई डाक्टरों के पास जाता है तो उनकी भी राय अलग हो सकती है। कोई विद्वान ज्योतिषी एकाग्रचित हो कर किसी कुंडली का विश्लेषण करे तब भी90 प्रतिशत से अधिक सही भविष्यवाणी नहीं कर सकता है। ईश्वर जो दिखाना चाहता है, ज्योतिषी उतना ही देख सकता है।

पृथ्वी से लाखों मील दूर स्थित नवग्रहों, नक्षत्रों, और राशियों का मानव जीवन पर पडऩे वाले प्रभाव के संबंध में उनके विचार हैं कि अंग्रेजी के ‘प्लेनेटÓ शब्द को लेकर उसे हिन्दी में ‘ग्रहÓ कह दिया गया है, जबकि ज्योतिष में मीलों दूर उन ग्रहों का प्रभाव नहीं देखा जाता। ग्रहों से अर्थ मानव के श्कर्मों्य से है।

श्कहते हैं कि व्यक्ति को वही मिलता है जो उसकी नियती में होता है। भविष्य के बारे में जानकर क्या लाभ हो सकता है जब सब कुछ पहले से तय है।्य इस संबंध में डॉ. राव के विचार हैं कि व्यक्ति का प्रारब्ध या नियती उसके संचित कर्मों के अनुसार बनती है। पिछले जन्मों में किए कर्म व्यक्ति को भोगने ही पड़ते हैं। महाभारत में कहा गया है कि जिस प्रकार गायों के झुंड में बछड़ा अपनी मां को पहचान लेता है उसी प्रकार से विगत जन्मों में किए गए कर्म अपने कर्ता को पहचान कर उस तक पहुंच जाते हैं। लेकिन अतीत की स्मृतिए वर्तमान की उत्तेजना और भविष्य की अनिश्चितता व्यक्ति को ज्योतिषी के पास ले जाती है।

‘क्या प्रारब्ध को बदला जा सकता है? सवाल पर डॉ. राव का स्पष्ट मत है कि प्रारब्ध को पूरी तरह तो नहीं लेकिन कुछ हद तक बदला जा सकता है। एक तरह से प्रारब्ध में मिलने वाले फलों की सीमाएं कम ज्यादा की जा सकती हैं। कर्मों के अच्छे फलों को बढ़ाया जा सकता है और खराब फलों को कम किया जा सकता है। लेकिन कर्मों के फलों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। जैसा भीष्म पितामह ने महाभारत में कहा कि श्श्पुरूषार्थ नहीं किया तो प्रारब्ध भी नहीं मिलेगा। जो भोगने के लिए हैए उसे भोगना ही पड़ेगा।्य्य ज्योतिष के उपाय तकलीफ में केवल ‘घटनाए मिटना और उठना्य ही करा सकते हैं। इसका अर्थ है उन उपायों से तकलीफ कुछ ‘घट्य सकती है। तकलीफ ‘मिटÓ सकती है। तकलीफ यदि ‘घटÓ नहीं सकती और न ही ‘मिटÓ सकती है तो उसे ‘सहने की शक्तिÓ जरूर मिल सकती है। ज्योतिषी ईश्वर होता तो पहले अपना भाग्य बदलता!

श्एक ओर आप कहते हैं कि ज्योतिषी उपाय बता कर तकलीफ कम कर सकते हैं और दूसरी तरफ आप कहते हैं कि ज्योतिषी उपाय बता कर लूटने का धंधा करते हैंघ््य सवाल पर उनका कहना है कि ज्योतिषी श्काल सर्प्यए श्शनि की ढईया्यए श्शनि की साढ़े साती्य से डरा कर और श्मांगलिक दोष्य दूर करने के उपायों का नाम ले कर पहले से ही परेशान लोगों से हजारों रूपए ऐंठ लेते हैं। डॉण् राव का दावा है कि ज्योतिष.शास्त्रों के अध्ययन में उन्हें कहीं श्काल सर्प्य का जिक्र नहीं मिला। ज्योतिष सांकेतिक होता है। यदि ज्योतिषी उपाय करके भाग्य बदल सकते होते तो वे ईश्वर ही न बन जाते। भारतीय विद्या भवन में 1982 से ज्योतिष का नियमित पाठ्यक्रम चलाते हुए अब तक हजारों लोगों को इस विद्या का उन्होंने ज्ञान कराया लेकिन उसके बावजूद उनका दावा है कि ज्योतिषी हर क्षेत्र में सही भविष्यवाणी नहीं कर सकते।

”तो क्या ज्योतिष के उपाय बेकार होते हैंघ््य्य पूछने पर वह कहते हैं कि उपायों का फल तब मिलता है जब उन्हें खुद किया जाए। किसी ज्योतिषी को पैसा देकर अपने या अपने रिश्तेदारों का भाग्य बदलने के लिए उपाय करने का ठेका दे दिया जाए तो उसका असर नहीं होता। अपने धर्म और विश्वास के अनुसार उपाय करने चाहिए। सभी धर्मों में अपने अनुसार तकलीफ दूर करने के उपाय होते हैं। ज्योतिषी के पास जाओ तो अपना रोना नहीं रोओ और न ही अपने सभी पत्ते खोलो।
यह पूछने पर कि ”एक ही स्थान पर एक ही समय पैदा हुए बच्चों का भविष्य अलग क्यों होता है? डॉ. राव का कहना था कि बच्चों की कुंडलियां अपने मां-बाप से आंतरिक रूप से जुड़ी होती हैं। यानी वे इंटरलिंक्ड होती हैं। बच्चे की कुंडली देखने से पहले माता-पिता की कुंडली भी देखनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर राहुल गांधी की तुलना में सैंकड़ों ऐसे लोग हो सकते हैं जिनकी कुंडली राहुल गांधी की कुंडली से
सशक्त हो सकती है। लेकिन राहुल गांधी की कुंडली के साथ उनके परिवार से जुड़ी परंपरा का भी ध्यान रखना होगा।

इंग्लैंड में जब जार्ज पंचम पैदा हुए, तब उसी समय और घड़ी में एक लुहार के घर भी एक बेटा पैदा हुआ। उनका विवाह भी एक ही समय पर हुआ। उनकी कुंडलियां एक जैसी थीं।ं लेकिन जार्ज पंचम का बेटा इंग्लैंड के सम्राट की गद्दी का वारिस बना था। इस प्रकार दोनों की कुंडलियों का विश्लेषण करते हुए यह ध्यान रखना होगा कि जार्ज पंचम का बेटा शाही परिवार का हिस्सा था। कुंडलियों के विश्लेषण में देश, काल, पात्र का बहुत महत्व होता है।

प्रस्तुति : ऊषा शर्मा

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