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बोस्टन के धमाकों से सबक

इस वारदात ने अमेरिकी प्रशासन का निश्चित तौर पर यह आत्मविश्वास तोड़ा है कि उसके सुरक्षा उपायों ने अमेरिका को आतंकवादी हमलों से पूरी तरह सुरक्षित कर लिया है।

बोस्टन मैराथन के दौरान हुए धमाकों ने पूरे अमेरिका को दहला दिया। इस आतंकवादी विस्फोट के पीछे चेचन के दो युवकों, तैमरलेन और जोखर का हाथ होने और एक के जीवित पकड़े जाने के बाद अमेरिका ने राहत की सांस ली है। लेकिन कुछ घंटों के लिये भारतीय भी सहम गए जब कानपुर के युवक सुनील त्रिपाठी का नाम अमेरिकी सोशल मीडिया में चक्कर काटने लगा। भारतीय छात्र सुनील त्रिपाठी अमेरिका में करीब एक महीने से लापता है और अमेरिकी एजेंसियां उसका पता लगाने में आनाकानी कर रही हैं और जब उसके गायब होने को लेकर शक उसके आतंकवादी होने पर चला गया तो इससे भी अमेरिकीतो एजेंसियों की खुफिया समझ की पोल खुली। वह न किसी सिख या किसी मुस्लिम समुदाय का था जिस पर किसी आतंकवादी संगठन से जुड़े होने का शक किया जाना चाहिये
था। पूरे दो दिनों तक जिस तरह बोस्टन शहर खौफ में जीता रहा है और अमेरिका की सभी सुरक्षा एजेंसियों की नींद हराम कर दी, उससे यह साबित होता है कि अमेरिकी कौम इस तरह के आतंकवादी हमलों के सदमे को नहीं झेल सकती। इस वारदात ने अमेरिकी प्रशासन का निश्चित तौर पर यह आत्मविश्वास तोड़ा है कि उसके सुरक्षा उपायों ने अमेरिका को आतंकवादी हमलों से पूरी तरह सुरक्षित कर लिया है। 2001 के 9/11 के आतंकवादी हमलों ने न्यूयार्क और वाशिंगटन में जिस तरह हवाई हमलों के जरिये मुस्लिम जेहादियों ने कत्लेआम किया, वह आधुनिक इतिहास में सबसे भीषण आतंकवादी हमला कहा जा सकता है। लेकिन इसके बाद अमेरिका ने जिस तरह के कड़े घरेलू सुरक्षा उपाय किये उसकी पूरी दुनिया में सराहना की जा रही थी। वास्तव में ये सुरक्षा उपाय किसी बाहरी आतंकवादी गुट द्वारा प्रायोजित आतंकवादी हमलों से बचाव के लिये थे लेकिन यदि कोई आतंकवादी घर में ही पनप रहा हो तो उससे कैसे रोका जा सकता है। आतंकवादी तत्वों के हाथ में बंदूक जाने से रोका जा सकता है
लेकिन उसके दिमाग में पनप रही आतंकवादी मानसिकता को कोई सुरक्षा एजेंसी कैसे रोक सकती है। वह सुरक्षा एजेंसी चाहे कितनी आधुनिकतम तकनीक वाले सुरक्षा तंत्र से लैस होए वह किसी के दिमाग में झांक कर नहीं देख सकता।
तब भी नहीं जब उसे किसी खास व्यक्ति के बारे में चेताया जा चुका हो। चेचन के दोनों युवकों के बारे में रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने अमेरिकी एफबीआई को तीन साल पहले ही समुचित चेतावनी दी थी। लेकिन अमेरिकी एफबीआई ने इसके बारे में मामूली पूछताछ कर नजरअंदाज कर दिया। वास्तव में एफबीआई के पास चेचन के युवकों के दिमाग में झांक कर देखने का कोई उपकरण या साफ्टवेयर नहीं था। अमेरिकी एजेंसियों ने शायद इसे इसलिये भी इसे गंभीरता से नहीं लिया कि दोनों युवक चेचन के थे जो रूसी महासंघ का एक मुस्लिम विद्रोह वाला गणराज्य है। चेचन विद्रोह को अमेरिका की भी सहानुभूति मिलती रही है
और अमेरिकी प्रशासन रूसियों को अक्सर यह सलाह देता रहा है कि चेचन के विद्रोहियों के साथ किस तरह सलूक करें। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद सोवियत संघ करीब 16 राज्यों में टूटा लेकिन चेचन्या इसमें शामिल नहीं था। चेचन लोगों ने खुद ही अपनी आजादी का ऐलान कर दिया और रूसी सेना से हिंसक लड़ाई लड़ऩे लगे। रूसी सेना ने इस विद्रोह पर बेरहमी से काबू पाया और आज चेचन्या लगभग शांत है पर वहां विद्रोह की आग को बुझाया नहीं जा सका है।
इसी विद्रोह की आग में तेमरलेन और जोखर झुलस रहा था जो पूरे यूरोप में इस्लामी व्यवस्था को लागू करने का सपना देख रहे थे। लेकिन अमेरिकियों ने कभी यह नहीं सोचा कि जिस चेचन लोगों के साथ वे हमदर्दी दिखाते रहे हैं, वे अब अमेरिकी लोगों को भी निशाना बना लेंगे। वास्तव में दोनों युवकों में से एक के जीवित पकड़े जाने के बाद ही यह राज खुल पाएगा कि उनके मंसूबे क्या थे। आखिर उन लोगों ने क्या सोच कर अमेरिकी लोगों को निशाना बनाया? शायद ये मंसूबे रहे होंगे कि वह बोस्टन मैराथन जैसे विश्व प्रसिद्ध दौड़ के मौके पर इस तरह के हमले करेगा तो उससे पूरी दुुनिया का ध्यान चेचन्या के विद्रोह की ओर जाएगा। चेचन्या के आतंकवादियों ने करीब तीन साल पहले मास्को के मेट्रो में हमला कर दुनिया का ध्यान खींचा था और इसके कुछ साल पहले बेसलान के एक स्कूल में कई बच्चों को बंधक बनाने और फिर कई
को मार देने के बाद दुनिया को यह बताने की कोशिश की थी चेचन का अलगाववादी आन्दोलन अभी मरा नहीं है।
चेचन्या की तरह अमेरिका ने दुनिया के दूसरे विद्रोह ग्रस्त हिस्सों के लोगों को अपने यहां शरण दे रखी है और उनके बहाने वह उन देशों पर दबाव भी डालता रहा है। यह बात ज्यादा पुरानी नहीं है कि किस तरह डेविड हेडली और तहव्वुर राणा को अमेरिका ने ही अपने यहां से मुंबई पर 26-11 के आतंकवादी हमलों को अंजाम करने में जाने अनजाने मदद दी। ्यह सीरिया मेें राष्ट्रपति असद के खिलाफ विद्रोह भड़काने की अमेरिकी नीति से साफ उजागर होता है। राष्ट्रपति असद खाड़ी के दूसरे देशों की तरह अमेरिका के पिछलग्गू नहीं माने जाते इसलिये अमेरिका ने धर्मनिरपेक्ष माने जाने वाले राष्ट्रपति असद के खिलाफ विद्रोह को हवा दी। असद तानाशाह हो सकते हैं लेकिन उनकी इन नीतियों की वजह से ही सीरिया में कट्टरपंथी और जेहादी ताकतों पर अंकुश लगाए रखा जा सका। पर आज असद को सत्ताच्युत करने के लिये अमेरिका ने अलकायदा जैसे लोगों को मदद दे कर अपनी दोमुंही नीति उजागर की है।
इसके पीछे अमेरिका का यह घमंड उजागर होता है कि उसने अपनी हवाई, जमीनी और समुद्री सीमाओं को 9/11 के हमलों के बाद इस कदर अभेद्य बना दिया है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर आतंकवाद का खेल बेधड़क खेल सकता है। अमेरिका ने यह सोच लिया कि वह सफलतापूर्वक अमेरिकाविरोधी मुल्कों के खिलाफ उन्हीं आतंकवादी ताकतों का इस्तेमाल कर सकता है जिनके खिलाफ वह अफगानिस्तान में अब तक लड़ रहा था लेकिन वहां भी उनकी पोल पूरी तरह खुल चुकी है। अब वहां भी अमेरिका उन ताकतों के साथ समझौता कर रहा है जिनके खिलाफ एक दशक तक वह लड़ता रहा था। पर जिस तरह अमेरिका ने पाकिस्तान की खुशामद करने की नीति अपनायी उसकी वजह से ही अफगानिस्तान में कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा मिला। अब अमेरिकी फौज को यह सोचकर हटाया जा रहा है कि अफगानिस्तान में जो तालिबान और अलकायदा फिर सत्तारूढ़ होंगे, वे अब अमेरिका का कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे क्योंकि अमेरिका ने अपनी हवाई ए जमीनी और समुद्री सीमाएं पूरी तरह सील कर दी हैं। लेकिन अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को यह अहसास नहीं हुआ कि जेहादी मानसिकता के लोग प्रेशर कुकर में बंद
भाप की तरह हैं जिन्हें फटने के लिये किसी बाहरी विस्फोट की जरूरत नहीं होती। चेचन के दोनों युवकों ने प्रेशर कुकर का ही इस्तेमाल किया था और इस छोटे और काफी सस्ता व आसान लगने वाले बर्तन का विस्फोटक के तौर पर इस्तेमाल करने की कला उसने इंटरनेट के जेहादी स्कूल पर ही सीखी होगी। तेमरलेन और जोखर जेहादी मानसिकता के युवक थेए इसका पता रूसी एजेंसियों को था और इस बारे में अमेरिकी एफबीआई को आगाह किया गया था पर अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पूरी तरह विश्वस्त अमेरिकी लोगों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
इस वारदात से अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को यह आकलन करना होगा कि कट्टरपंथी जेहादी अलगाववादी आन्दोलन दुनिया के किसी भी हिस्से में चल रहा हो, उसका खामियाजा अमेरिकी कौम को भी भुगतना होगा। अमेरिका ने डेविड हेडली और राणा की करतूतों को तो काफी हल्के में इसलिये लिया कि वे किसी दूसरे देश के खिलाफ साजिश रच रहे थे लेकिन तेमरलेन और जोखर के आतंकवादी हमलों के बाद उन्हें यह सोचना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को केवल अमेरिका के राष्ट्रीय सामरिक हितों के मद्देनजर ही देखकर नहीं चलना होगा। अमेरिका दूसरे देशों के आतंकवादी गुटों का इस्तेमाल अपने राष्ट्रीय हितों के लिये करता रहा है लेकिन अब इसकी घातक चोट उड्ढसकी अस्मिता पर ही पड़ेगीए यह अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को सोचना होगा। अमेरिका के सामने सबसे बड़ा प्रेशर कुकर अफगानिस्तान के बहाने फटने का इंतजार कर रहा है क्योंकि अमेरिका ने जिस चुनिंदा तरीके से अफगानिस्तान में आतंकवादी की लड़ाई लड़ी है उसकी वजह से अमेरिका में ही तालिबान और अल कायदा से हमदर्दी रखने वालों की हिम्मत बढ़ेगी।

इसलिये यदि बोस्टन जैसे विस्फोट अमेरिका में और होते हैं, तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिये। चेचन के युवकों ने अमेरिका में रह रहे दूसरे आतंकवादी गुटों के समर्थकों को अपना गुस्सा जाहिर करने के लिये नया तरीका बताया है। बम घर में भी किस तरह बनाए जा सकते हैं और घरेलू उपकरणों से भी पूरे अमेरिका में किस तरह दहशत फैलायी जा सकती हैए यह बोस्टन में चेचन के दोनों युवकों ने बता दिया है। अमेरिका को इन हमलों से बचना है तो उसे अब आतंकवाद के खिलाफ दोहरी जुबान में बोलना बंद करना होगा।

 

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