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गुडिय़ा का दर्द

शिक्षा से हमने संस्कार हटा दिए हैं, कैसे भी प्राप्त किये जाने वाले धन, ऐश्वर्य और मजे के लिए हमने सामाजिक मान्यता दी हुई है और हम कल्पना करते हैं कि सब ठीक रहेगा।
गुडिय़ा के सवाल पर दिल्ली में लोग फिर से सड़कों पर हैं। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज कहती हैं कि दोषियों को फांसी होनी चाहिये। सोनिया गाँधी कहती हैं “शब्दों की नहीं एक्शन” की जरूरत है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। मीडिया को फिर एक स्टोरी मिल गयी है और राजनीतिक दलों को एक मुद्दा। कोई प्रदर्शन कर रहा है तो कोई दिल्ली पुलिस कमिश्नर का इस्तीफा माँग रहा है। पर सवाल इन सब धरना प्रदर्शनों और राजनीतिक बयानबाजी से बहुत बड़ा है।
सवाल है कि महाशक्ति बनने का सपना संजोने वाला देश अपने ही घर में अपनी बेटियों की अस्मत बचाने में असमर्थ क्यों हैं? क्यों इस राष्ट्र की आत्मा इस तरह से कलंकित हो
रही है? क्या ये महज कानून व्यवस्था का सवाल है? क्या एक पुलिस अफसर के, सरकार के या कानून के बदलने से सब बदल जाएगा?

शायद नहीं। तो फिर सबसे पहले हम माने कि ये एक राष्ट्रीय शर्म का समय है। आरोपी प्रदीप और मनोज, जिन्होंने अपना जुर्म स्वीकार किया है, तो कुत्सित अपराधी हैं ही और भारतीय दंड विधान के अंतर्गत दी जाने वाली कोई भी सजा उनके लिए कम ही होगी। पर ये दो नाम भर नहीं हैं। ये उन वृत्तियों वाले उन सारे नामों के प्रतीक हैं जो देश के शहर शहर, कस्बे कस्बे और गांव गांव में निद्र्वंद्व घूम रहे हैं? क्या पूरा समाज जिसमें मीडिया भी शामिल है, उन वृत्तियों को बढ़ाने का दोषी नहीं जिनके चलते ऐसे घिनौने अपराध बढ़ रहे हैं।

इन अपराधों पर छाती पीट-पीट कर रोने वाले क्या अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि अंधाधूंध शहरीकरण, हर चीज के बाजारीकरण, अमर्यादित विज्ञापनबाजी, मीडिया और सिनेमा में पेश की जाने वाली महिलाओं की छवि और इन्टरनेट पर मुफ्त में मिलने वाले “पोर्नोग्राफिक कंटेंट” की क्या ऐसी मानसिकता बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं है? अश्लीलता और रचनात्मक स्वतंत्रता के बीच की लकीर बहुत महीन और बारीक है। क्या ये सच नहीं कि अक्सर हमारे पत्र पत्रिकाओंए टीवी धरावाहिकों में इस लकीर का उल्लंघन होता है? क्या हमारे बच्चों को सुबह शाम परोसे जाने वाला

संगीत और नृत्य कई बार मर्यादाओं की हदें पार नहीं करता?

शिक्षा से हमने संस्कार हटा दिए हैं, कैसे भी प्राप्त किये जाने वाले धन, ऐश्वर्य और मजे को हमने सामजिक मान्यता दी हुई है और हम कल्पना करते हैं कि सब ठीक रहेगा। अगर मीडिया में छपी खबरों को सच माना जाए तो प्रदीप और मनोज ने शराब पी थी और मजे के लिए उन्होंने गुडिय़ा को शिकार बनाया। याद किया जाए तो दिसंबर 16 को हुए कांड में भी कुछ ऐसे ही किया गया था।

इन अपराधियों को ऐसा दंड तो मिलना ही चाहिए जिससे कि किसी की हिम्मत न हो ऐसा सोचने की भी। मगर यह काफी नहीं होगा। आज नारे लगाने नहीं बल्कि समाज के आत्म चिंतन और मीडिया के आत्म विश्लेषण का वक्त है। ये शर्म दिल्ली की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की है। हर एक भारतीय की है। आइये आज सर झुकाकर सोंचे, क्या हम कुछ ऐसा ठोस कदम उठा सकते हैं कि फिर हमारी सामूहिक चेतना कलंकित न हो, शर्मसार न हो?

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