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बंगाल में चिट फंड नहीं, चीटिंग फंड

चिट फंड या कह लीजिए चीटिंग फंड, बंगााल के आर्थिक इतिहास में यह एक ऐसा फंदा है जिसने करोड़ों लोगों को सड़क पर आ खड़ा किया। लोगों ने आत्महत्या की, हजारों घर बरबाद हो गए। अभी-अभी बंगााल में फिर से एक और ऐसा धमाका जिसके फंदे के घेरे में फिर लटक गए हजारों निरीह जनमानस। 1980 में संचयनी नाम का एक ऐसा ही चिटफंड कम्पनी भूदेव उर्फ भोलू सिंह ने कलकत्ता में खोली थी, जिसकी आंच में हजारो लोगों के घर जल गए थे। उस घोटाले में लोग सड़कों पर आ गए थे। वाममोर्चे के बहुत से नेता भी संदेह के घेरे में थे। 1980 में केन्द्र में कांग्रेस और पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा शासन कर रहा था। कहा जाता है आज जो बंगााल में शारदा कम्पनी के चिटफंड के घोटाला नायक सुदीप्तो सेन उसी भूदेव या भोलू सेन का बेटा है, यद्यपि वह यह स्वीकारता नहीं है।
तथ्य के अनुसार शारदा के कर्णधार सुदीप्तो सेन के पिता का नाम नृपेन्द्र नारायण सेन और माता का नाम रानू सेन है। कहा यह भी जाता है सुदीप्तो सेन ने अपना परिचय छुपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी भी किया था। कुछ लोगों का यहां तक कहना है कि कागज में उनके माता पिता का जो नाम है, वह भी इसी प्लास्टिक सर्जरी की तरह है। 1990 के मध्य में इसी सुदीप्तो सेन के खिलाफ आपराधिक मामले में जांच का आदेश हुआ था पर उस घटना को अदृश्य हाथों ने आगे बढऩे ही नहीं दिया। 1990 की इस घटना के बाद सुदीप्तो सेन एक नए नाम से 2004 में उत्तर प्रदेश में उजागर हुए थे। तब भी केन्द्र में कांग्रेस और पश्चिम बंगााल में वाम मोर्चा शासन में थे। वाम मोर्चे के 33 साल के लम्बे इतिहास में न जाने ऐसी कितने ही घोटाले उजागर हुए और केन्द्र में कांगेस शासन के परोक्ष समर्थन से उनको कालीन के नीचे दबा दिया गया।।
बहुरूपिया ठग
इस षारदा चीटिंग फंड मे घोटाला नायक सुदीप्तो सेन के बारे में कहा जाता है उनकी तीन पत्नियां है बातचीत में बड़े ही सज्जन हैं। उनका कहना है वह किसी की रोजी रोटी में हाथ नहीं डालते। अब साल्ट लेक के मिडलैंड पार्क के आफिस में वे आधी रात को अपने खास लोगों से मिलते हैं। दिन में वे बहुत कम दिखाई देते हैं। किसी भी अनुष्ठान में उन्हें देखा नहीं जाता। उनके छह माले वाले दफ्तर में सुदीप्तो सेन का कोई फोटो नहीं हैं। ज्यादा लोगों से मिलने से वह कतराते हैं। एक अद्भुत रहस्यमय जीवन व्यतीत करते हैं शारदा के यह कर्णधार। अपने ऑफिस में केवल महिलाएं ही उनकी सी.एम.डी. डेस्क की देखभाल करती हैं। दो-चार गिने-चुने पुरुष सहयोगी कभी कभार ऑफिस में देखे जाते हैं। अगर किसी से उनको मिलना है तो वह रात के बारह
बजे का समय ही देते हैं। कहा जाता है उनका असली चेहरा किसी को नहीं मालूम, कितने ही नामों से वह जाने जाते हैं। दक्षिण कोलकाता के सन्तोषपुर में उनके पड़ोसी उन्हें शंकर के नाम से जाने जाते हैं। कहीं कहीं उनका नाम सुदेब भी है। उनकी जीवनसंगिनी देवयानी मुखर्जी भी साधारण रिशेप्सनिस्ट से कम्पनी के दूसरे नम्बर के पायदान पर पहुंचीं। देवयानी मुखर्जी के नाम से कोलकाता और दूसरे शहरों में बहुत सारे मकान भी हैं।
सेन की इस चीटिंग फंदे का लेन-देन केवल पश्चिम बंगााल तक ही सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, असम, झारखण्ड, उत्तराखण्ड से लेकर महाराष्ट्र तक फैला हुआ है। अपनी इस अनैतिक आर्थिक लेनदेन को शासन के रोष से बचाने के लिए उसने एक अनोखा और आसान उपाय निकाला मीडिया में इस काले धन को धकेलने का। इसमें एक निशाने में दो तीर का काम हो जाता है। एक तो शासन से बचने के लिए मीडिया का सहारा लेना, दूसरा राजनेताओं के लपलपे हाथों में पैसा थमा देना ताकि उसके खिलाफ कार्यवाही करते वक्त राजनेता और शासन दो बार सोचें।
पश्चिम बंगाल में 33 साल के लम्बे अन्तराल के बाद जब ममता बैनर्जी के नेतृत्व में तृणणूल ने शासन सम्भाली तब भी शारदा कम्पनी का बाजार गरम था। वाम मोर्चे के नेताओं के आखों के सामने यह शख्स अपना कारोबार चला रहा था और सामा्राज्य का विस्तार कर रहा था। जो माक्र्सवादी अब गला फाड़ कर चिल्ला रहे हैं और करीब दो साल की एक सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं उन्हें यह पूछा जाए इतने सालों इस तरह के अनैतिक धन के लेनदेन को रोकने के लिए क्या कर रहे थे? 1980 में संचयनी और 2013 में शारदा का यह घोटाला। सुदीप्तो सेन ने शारदा की शुरुआत की थी 1990 में और बंगाल से वाम मोर्चा की विदाई हुई 2011 में। ममता बैनर्जी के शासन में आने से पहले और तृणमूल कांग्रेस से राज्य सभा सांसद बनने से पहले ही कुणाल घोष
सुदीप्तो सेन के मीडिया व्यवसाय में दाहिना हाथ माने जाने वाले शारदा कम्पनी के ग्रुप सी.ई.ओ. के पद पर आसीन थे। सुदीप्तो सेन और कुणाल घोष के बीच क्या लेनदेन हुआ, उसका खुलासा भी सुदीप्तो सेन ही करेंगे जिनको अपने दो सहयोगियो के साथ जम्मू कश्मीर से गिरफ्तार किया गया है। कहने को तो शारदा के नाम से ऑटो.मोबाईल, आटा, चावल, दाल और रियलीटी का व्यवसाय है पर असल में यह चिटफंड या चीटिंग फंदा ही उनका असली चेहरा था और है। इस चिटफंड घोटाले को लेकर लड़ाई वाम मोर्चा और कांग्रेस के बीच में है। वाम दलों का कहना है चिट फंड जैसा अनैतिक लेनदेन को बन्द करने का सख्त कानून बनाने का अधिकार केवल केन्द्र को है और उन्होंने 2003 में शासन में रहते हुए जो कानून बनाया था, उसके अनुमोदन के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा था। 2009 में केन्द्र ने उस कानून को कुछ संशोधन के लिए राज्य के पास भेजा। संशोधन के साथ कानून को पास कराने के बाद राष्ट्रपति के पास भेजा गया जिसकी स्वीकृति आज तक नहीं मिली।

अब सामने बंगााल में पंचायत का चुनाव है और इस मुद्दे पर जनता अपनी राय जाहिर करेगी। वाम मोर्चे के नेताओं का कहना है तृणमूल कांग्रेस और चिटफंड कम्पनी शारदा एक दूसरे के परिपूरक हैं उधर ममता का कहना है सालों साल बंगााल में ये चीटिंग फंड पनप रहा था और क्म्युनिस्ट आराम कुर्सी पर विराजमान थे।

 

अतनु भट्टाचार्य

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