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दिवालिया उ.प्र. सरकार

उत्तर प्रदेश सरकार या तो दिवालिया हो रही है या उसका खजाना कहीं और लुटाया जा रहा है। एक खबर के मुताबिक उण्प्रण् में सरकारी विद्यालयों के बच्चों से सालाना इम्तिहान के लिए घर से पुस्तिकाएं लाने को कहा गया है, क्योंकि उसके पास बजट नहीं है जबकि हाल ही में करोड़ों रुपयों के लैपटॉप बांटे गए हैं। इससे ज्यादा मजे की बात है कि वर्ष 2012-13 समाप्त हो रहा है, शिक्षण सैशन समाप्ति की ओर है और बी.एड. कॉलेजों में अध्ययनरत विद्यार्थियों की फीस अभी तक नहीं दी गयी है। सरकार ये धनराशि या तो रख कर बैठी है या उसे अन्यथा खर्च किया जा रहा है। फीस का भुगतान सरकार द्वारा कॉलेजों को नहीं देने से स्टॉफ को वेतन नहीं मिल पा रहा है। फीस नहीं मिलने के कारण लाखों अनुसूचित जाति के विद्यार्थी परीक्षा में नहीं बैठ पाएंगे। पर सरकार जब छोटे बच्चों के भविष्य ही नहीं, बल्कि कॉलेज के विद्यार्थियों के भविष्य से भी खिलवाड़ करते हुए भी कुंभकर्ण की नींद सो रही है।
सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली
मायावती का आरोप है कि समाजवादी पार्टी का उण्प्रण् में शासन भ्रष्ट है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के शासन में निगमों के अध्यक्ष उपाध्यक्ष रुपए लेकर नियुक्त किए जा रहे हैं। पिछले चुनाव में सण्पाण् मायावती राज के भ्रष्ट और बेईमान शासन का पर्दा उठा कर सत्ता में आयी थी। अब मायावती उनके भ्रष्ट शासन को बेपर्दा कर रही है। मायावती के राज में कई भ्रष्ट मंत्रियों को तो भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण इस्तीफा तक देना पडा था। कॉलेज की संबंधता देने के लिए रेट फिक्स करने के गम्भीर आरोप उनके उच्च शिक्षा मंत्री राकेश धर त्रिपाठी पर लगे थे। एक वरिष्ठ कांगेसी नेता चुटकी ले रहे थे अच्छा हुआ दोनों पार्टियों ने एक दूसरे के शासनकी गतिविधियां बेनकाब कर दीं। सौ-सौ चूहे खाकर बिल्लियां हज को जा रही हैं।
कंाग्रेसियों को
मोदी से मिलने की मनाही

पाकिस्तान के नेता यदि भारत आएं तो उनसे मिलने हमारे विदेश मंत्री जा सकते हैं, वह भी उस समय जब हमारे फौजी का सिर सर से अलग कर पाकिस्तान हमें सौगात दे रहा हो, लेकिन कोई कांग्रेसी तीसरी बार जनता द्वारा चुने गए एक राज्य के मुख्यमंत्री से नहीं मिल सकता। केरल के मुख्य मंत्री ओमन चंडी ने अपने एक मंत्री से इस बात पर जवाबतलब किया है कि वह गुजरात के मुख्यमंत्री से वहां के विकास की जानकारी लेने क्यों गये। यहां तक कि कांगेस के व्यालर रवि और रमेश चेन्नीथाला जैसे वरिष्ठ नेताओं ने भी इस मुलाकात की जमकर भत्स्र्ना की। प्रजातंत्र का यह रुप भी देखने को मिलेगा कि एक पार्टी को किसी मुख्यमंत्री से मिलने की मनाही की जाए, यह तथ्य अर्थहीन लगता है जबकि इस मुलाकात का राजनैतिक मतलब हो ही नहीं सकता।
जागो ‘आपÓ और आर. डब्ल्यू. ए.
दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपने उम्मीदवार खडे करने वाली है। पार्टी अध्यक्ष केजरीवाल उम्मीदवार की तलाश करने के लिए प्रोफार्मा पर बॉयोडाटा मंगा रहे हैं और उसमें आर. डब्ल्यू. ए. से भी पूछ रहे हैं, क्या उन्हें मालूम है कि अधिकांश आर. डब्ल्यू. ए. के पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं और आर. डब्ल्यू. ए. 15-20 लोगों के भरोसे ही चलती है। इन्हें न तो कांग्रेस तवज्जो देती है और न ही भाजपा। कई आर. डब्ल्यू. ए. की लड़ाई तो कोर्ट में है और ज्यादातर ऐसे एसोसिएशन की कमान ऐसे लोगों के पास है जिनकी शिकायत खुद उनके सदस्य ही करते रहते हैं। ऐसे में आपका भविष्य आप ही जान सकते हैं।
मप्र. कांगेस में
अपनी ढपली अपना राग
मध्य प्रदेश में जैसे ही विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट हुई, वहां के कांग्रेसी नेताओं ने अपनी ढपली अपना राग शुरु कर दिया । आधा दर्जन क्षत्रप जिनका अपने अपने क्षेत्रों में दबदबा है भले दूसरे क्षेत्रों में उनका वजन नहीं हैं लेकिन मुख्यमंत्री के दावेदार बने हुए हैं।
केन्द्रीय राजमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को हाई कमान जबरन म.प्र. की राजनीति मे पूर्ण रुप से ठूंसना चाहता है। जबकी उनके पिता स्व. माधव राव सिंधिया म.प्र. में पूरी तरह जुटने से कतराते रहे हैं। महारथी दिग्विजय सिंह भा.ज.पा. सरकार की तिकड़ी बन जाने के डर से म.प्र. में नेतृत्व सम्हालने से दूर हट रहे हैं। राजनीति के महाधुरन्धर माने जाने वाले अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह राहुल, नेता विरोधी दल ने विधानसभा में लड़ाई की कमान अकेले ही सम्हाले रखी है क्योंकि म. प्र. कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कान्ति लाल भूरिया उनके आगे बौने साबित हो रहे हैं। जनजाति के होने
के कारण उन्हें मुख्यमंत्री का दावेदार दिग्विजय सिंह ने बना दिया। उधर पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी अपनी उधेड़बुन में लगे हैं। पाटी्र्र के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव सत्यव्रत चतुर्वेदी भी दौड़ में हैं। पाटी का एकमात्र वैश्य चेहरा रामेश्वर नीखरा जो राजीव गांधी के विश्वासपात्र रहे हैं को दिग्विजय सिंह का वरदहस्त हासिल है। नेताओं का एकजुट नहीं होना और अपना-अपना राग अलापना भा.जा.पा. को तीसरी बार स्थापित कर सकता है। खासतौर से जब शिवराज सिंह चौहान को उमा भारती नहीं सता रहीं।

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