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किसी को तो आगे आना होगा ये सड़ांध रोकने के लिए

यह लंबी बहस हो सकती है कि समाज में बलात्कार जैसे अपराधों की दरिन्दगी की सड़ांध बढ़ाने में किसकी कितनी भूमिका रही हैए लेकिन इस सड़ांध को आगे बढऩे से रोकने के लिए प्रयास तो सबको ही मिल करने होंगे। उसके लिए भी किसी को तो आगे आना होगा। आवश्यक है कि बदलते वक्त को पहचान कर जीवन के अपने मापदंडों को भी पहचाना जाए।
दिल्ली में पिछले साल 16 दिसम्बर को मेडिकल की एक छात्रा के साथ पूरी दरिंदगी के साथ हुई गैंग रेप की घटना से पूरा देश ही जैसे शर्मसार हो गया था। अपनी शर्मिन्दगी में डूबे भारत में अचानक जैसे उबाल आ गया था और आम जनता ने सडक़ों पर उतर कर सरकार को बलात्कार के मामलों में बने कानूनों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया था। कानून में बदलाव किया गया। कुछ सख्त प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों से निपटने के लिए नया कानून संसद ने पारित कर दिया। उस कानून को हाल ही में राष्ट्रपति से स्वीकृति भी मिल गई और नया कानून देश में लागू हो गया।
जिस वक्त नए कानून को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया चल रही थी, उस दौरान भी कोई दिन ऐसा नहीं बीता जब मीडिया में बलात्कार की कोई खबर सुर्खी न बनी हो। बलात्कारियों की हैवानियत की शिकार मेडिकल की छात्रा भी जब अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रही थी और आम जनता सडक़ों पर अपने गुस्से का इजहार कर रही थी, तो उस वक्त भी किसी न किसी दरिंदे का शिकार कोई न कोई मासूम बन रही थी। नजरिया लिखे जाने के दिन भी समाचार पत्रों में छह साल की एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार होने के समाचार छपे थे। साफ है कि ऐसे दरिंदों को न आम जनता के गुस्से से कोई मतलब था और न ही कानून का कोई डर था।

ऐसा क्यों था? क्या बलात्कार की घटनाएं हाल ही में बढ़ी हैं? क्या यह हैवानियत पहले नहीं होती थी? यदि महिलाओं के साथ हिंसा और बलात्कार की घटनाएं पहले भी होती रही हैं तो समाज में बढ़ रही इस सडऩ की इतनी तेज बदबू पहले क्यों नहीं उठी कि समाज के ठेकेदारों का दिमाग भन्ना जाता? क्या यह हैवानियत ऐसे ही बढ़ती जाएगी? ये कुछ

ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर समाज के हर जिम्मेदार वर्ग को खोज कर देश और समाज को अंधेरे गर्त में गिरने से बचाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

सोलह दिसम्बर की घटना हो या फिर गांधीनगर की मासूम गुडिय़ा का मामला हो, बलात्कार या ऐसी ही तमाम घटनाएं चीख चीख कर समाज के ठेकेदारों, पुलिस, कानून प्रणाली, राजनीतिक व्यवस्था आदि को दोषी बता रही है। असल में आज की स्थिति आने तक इन सबने अपनी अपनी भूमिका बखूबी निभाई है।

कहीं कोई घटना घट जाएए राजनीतिक दलों में एकदम यह होड़ मच जाती कि उसे राजनैतिक मुद्दा बना कर उसे कैसे लपका जाए। सोलह दिसम्बर की घटना ने तो आम जनता ने राजनैतिक दलों को अधिक सियासत नहीं करने दी लेकिन गुडिय़ा के मामले में दिल्ली विधानसभा चुनावों पर नजरें टिका कर सियासत के मैदान में नए नए कूदे अरविंद केजरीवाल की ‘‘आप’’ और दिल्ली में पहली बार बीजेपी की कमान संभालने वाले विजय गोयल ने मुद्दा बनाने में पूरा जोर लगाया हुआ है। यदि ‘‘आप’’ बीजेपी, समाज सेवा का दम भरने वाले एनजीओ आम जनता के बीच कानून और सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए कुछ करते तो निश्चित रूप से वह सही दिशा में अच्छे कदम होते। यदि वे पीडि़ता और पीडि़ता के परिवारजनों की कुछ सहायता कर पाते तो उनका दर्द कुछ कम होता। गुडिय़ा का पिता नहीं समझ पा रहा है कि जो भी हालात पैदा हो गए हैं, उनमें वह किस प्रकार अपने परिवार के वर्तमान घर में रह पाएगा, जबकि इन हालात को पैदा करने में उसका अपना कोई हाथ नहीं है। वह कैसे मेहनत मजदूरी कर अपना और अपने परिवार के सदस्यों का भरणपोषण कर पाएगा? गुडिय़ा स्कूल में कैसे शिक्षा पा सकेगी?

गुडिय़ा के पिता के दर्द ने नेताओं और तथाकथित समाज सेवियों को कहीं हल्के से यह अहसास दिलाने की कोशिश की है कि सियासत की जगह वे यदि हालात बदल सकें तो समाज में वे भी अपना जीवन जी सकते हैं। बलात्कार ही नहीं बल्कि समाज में हर प्रकार के बढ़ते अपराधों के बढऩे में पुलिस का रवैया भी एक बड़ा कारण नजर आता है। पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने दो टूक कह दिया कि वह अपने मातहतों की गलतियों के लिए त्यागपत्र नहीं देंगे। लेकिन नीरज कुमार ने यह नहीं बताया कि नन्हीं मासूम बच्चियों के साथ रोज हो रहे बलात्कारों को रोकने के लिए वह क्या कदम उठा रहे हैं। नीरज कुमार क्या कहीं और से किसी के आने की प्रतीक्षा में हैं जो इन सारे हालातों को सुधार कर उन्हें तोहफे के तौर पर दे।

पुलिस आयुक्त जिसे अपने मातहतों की गलती बता रहे हैंए वह गलती नहीं बल्कि बलात्कारियों का साथ देने जैसा संगीन अपराध है। पुलिस अधिकारी का अपराधियों को पकडऩे की बजाय बलात्कारियों की हैवानियत का शिकार बनी गुडिय़ा के पिता को दो हजार रूपए दे कर चुप रहने की धमकी देना किस प्रकार का कर्तव्य निभाना था। उस अधिकारी ने खुद को गुडिय़ा के पिता स्थान पर रख कर उसके दर्द को महसूस किया होता तो शायद उसकी हिम्मत इस प्रकार की हरकत करने की नहीं होती।

एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या बलात्कार की घटनाओं में अचानक वृद्धि हुई है या फिर पहले भी समाज इस पीड़ा से इतना ही कराह रहा था। इस संबंध में पुलिस अधिकारियों और कानूनविज्ञों के विचार जाने तो सबका यही कहना था कि कोर्ट के कोड़ों से जब मामले दर्ज होने लगे हैं और महिलाओं का गुस्सा बाहर उबलने लगा है तो पता चल रहा है कि यह कोढ़ तो पूरा नासूर बन गया है।

बलात्कार और महिलाओं के प्रति अपराध की घटनाएं पहले भी हुआ करती थीं। लेकिन हालात ये थे कि महिलाओं को ‘‘इज्जत’’ का वास्ता देकर चुप करा दिया जाता था और यदि कोई महिला मुंह खोलती भी थी तो पुलिस उसका साथ नहीं देती थी। मामले ही दर्ज नहीं होते थे।

गुडिय़ा का मामला भी जिस प्रकार से दर्ज किया गयाए उसे जान कर पुलिस अस्तित्व पर ही बड़ा सा प्रश्नचिन्ह लग जाता है। गुडिय़ा के लापता होने की रिपोर्ट तक पुलिस ने दर्ज करने में कितनी आनाकानी की। रिपोर्ट कराने के बाद भी गुडिय़ा को ढुंढने का कोई प्रयास पुलिस ने नहीं किया। बुरी तरह जख्मी हालत में गुडिय़ा के मिलने की जानकारी दिए जाने के बाद भी पुलिस हिलने के लिए तैयार नहीं हुई। यह है केवल एक बानगी पुलिस प्रणाली और पुलिसिया रवैये की। ऐसे में बलात्कार कर अपराधी खुले मौज करते हैं।

यदि बलात्कार की घटनाओं का ठीक तरीके से विशलेषण किया जाए तो समाज जिन्हें बच्चा समझ कर उनकी हरकतों को नजरअंदाज कर देता है, कहीं न कहीं वे तथाकथित बच्चे ही हैवानियत का खेल खेलते नजर आते हैं। 16दिसम्बर की घटना में जिसने सबसे अधिक दरिंदगी दिखाईए कानून की भाषा में वह नाबालिग माना जा रहा है। इस बात पर पूरी बहस हुई है कि नाबालिग की परिभाषा में उम्र को 18 से घटा कर 16 क्यों किया जाए। 16 वर्ष की आयु में ही बालिग बनाने का विरोध करने वाले नहीं समझ पा रहे हैं कि आज की जीवन शैली और खानपान ने बच्चों को समय से पहले ही बालिग की अवस्था में पहुंचा दिया है। बाजार में खुले आम मिलने वाली पोर्नोग्राफी की सामग्री और इंटरनेट पर सहजरूप से उपलब्ध जानकारियों ने बच्चों के दिमाग को कलुषित कर दिया है। वे अब अपने शरीर में होने वाले बदलावों को लेकर पैदा होने वाली जिज्ञासा को शान्त करने के लिए मां-बाप से प्रश्न नहीं पूछते बल्कि इंटरनेट खोलते हैं और ‘‘सब कुछ’’ जान लेते हैं।

यह लंबी बहस हो सकती है कि समाज में इस सड़ांध बढ़ाने में किसकी कितनी भूमिका रही है, लेकिन इस सड़ांध को आगे बढऩे से रोकने के लिए प्रयास तो सबको ही मिल करने होंगे। उसके लिए भी किसी को तो आगे आना होगा। आवश्यक है कि बदलते वक्त को पहचान कर जीवन के अपने मापदंडों को भी पहचाना जाए। सरकार और कानून भी सोचे कि आज तकनीक और बाजार ने बच्चों को यदि समय से पहले व्यस्क बना दिया है तो उनकी उम्र बालिग होने की उम्र कानून में भी 18 से घटा कर 16 करने में कोई बुराई नहीं है। बेशक बच्चों को अधकचरी जानकारियां मिल रही हैं लेकिन उन जानकारियों का विशलेषण करने की क्षमता तो उन्हें मां-बाप से ही मिलेगी। मां-बाप अपने बच्चों को दोस्त बनाएं और उन्हें ‘हर विषय’ पर बात करने के लिए प्रेरित करें। उन्हें अच्छे बुरे की तमीज सिखाएं,जिससे वे अपनी हर बात उनसे बांट सकें।

श्रीकान्त शर्मा

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