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नन्ही मासूम गुडिय़ा की हालत पर तो शैतान भी रो पड़ता…

गांधी नगर की गुमनाम सी गली में रहने वाली पांच साल की गुडिय़ा आजकल मीडिया की सुर्खियों में है। वजह है उसके साथ हुई दरिंदगी। इस बिल्डिंग में ऊपर और नीचे दर्जनों किराएदार रहते हैं। बीते 15 अप्रैल की शाम वह रोजाना की तरह घर के बाहर खेल रही थी। थोड़ी देर बाद बच्ची घर के बाहर से गायब मिली। मां-बाप ने आसपास काफी तलाश किया पर उसका कुछ पता नहीं चला। बच्ची के पिता सीधे गांधी नगर थाने पहुंचे। बच्ची के पिता का आरोप कि पुलिस ने गुमशुदगी लिखकर टरका दिया। बच्ची को दो दिन तक अभिभावक तलाशते रहे मगर सुराग नहीं मिल पाया। दो दिन बाद 17 अप्रैल की सुबह उसी बिल्डिंग के फस्र्ट फ्लोर पर बने एक कमरे में पड़ोसी ने जोर से रोने की आवाज सुनी। बाहर से कमरे का ताला लगा था। बच्ची के मां-बाप भी फौरन वहां पहुंच गए। ताला तोड़कर जब दरवाजा खोला तो सब की आंखें फटी रह गईं। बच्ची के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। गला धारदार
चीज से कटा हुआ था। उसके पैर और जांघों के बीच चोट और जले के निशान थे। गुडिय़ा की हालत देख कर शैतान भी रो पड़ता।

पुलिस का असंवेदनशील रवैया
खून से सनी बच्ची की हालत देखकर फौरन पुलिस को इत्तला दी गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस घटनास्थल पर फौरन नहीं पहुंची। संबंधित अधिकारी ने सूचना देने वाले को थाने आ कर रिपोर्ट लिखाने के लिए कहा। पुलिस के लिए यह कोई बड़ी घटना नहीं थी। पुलिस इसे सामान्य सी घटना मान कर चल रही थी। लोग थाने पहुंचे तो 100 नंबर पर इतिला दी गई और जब पुलिस नियन्त्रण कक्ष की गाड़ी आई तब पुलिस घटनास्थल पर पंहुची। लेकिन हद तो तब हो गई जब पुलिस ने मामला दबाने के लिए गुडिय़ा के पिता की जेब में दो हजार रूपए डाल कर चुप रहने के लिए कहा। पुलिस ने वहां पहुंच कर कमरे की तलाशी ली तो खून से सने कपड़े, रजाई, बिस्तर और फर्श सब जगह खून ही खून था। क्राइम टीम बुलाई गई जिसने जांच के लिए नमूने लिए। बच्ची को नजदीकी अस्पताल में ले जाया गया जहां उसकी हालत बेहद चिंताजनक रही। संसद से सड़क तक उठे उबाल ने बच्ची को स्थानीय अस्पताल से एम्स में ले जाने के लिए मजबूर कर दिया। मामला जब जनता के बीच आया तो शहर में जबर्दस्त आक्रोश फैल गया। पुलिस ने गैंगरेप और जान से मारने की कोशिश का मामला दर्ज कर मनोज और प्रदीप नाम के दो शख्स बिहार से गिरफ्तार किए हैं।

गुडिय़ा के पिता का दर्द
‘सर.. अब हम गांधी नगर इलाका ही छोड़ देंगे, बदनामी के बाद यहां रहना मुश्किल है। गांधी नगर की वह गली, घर और उस दरिंदे का कमरा देखकर मन विचलित होने लगता है। बिटिया के ठीक होते ही हम वहां से पलायन करके दूसरी जगह चले जाएंगे।्य लफ्जों में झलकता यह दर्द उस मजदूर और मजबूर पिता का है, जिसकी पांच साल की मासूम बच्ची हैवानियत का शिकार हुई। बच्ची के पिता ने गांधी नगर से पलायन करने का मन बनाया हुआ है। पिता ने कहा कि उसे दिन-रात यही चिंता सता रही है कि उम्र बढऩे के साथ उसकी बेटी कैसे जी पाएगी? स्कूल में एडमीशन, पढ़ाई लिखाई के दौरान कहीं कोई ताना न मारे? उसके दिलोदिमाग पर अपने पर बीती हैवानियत हावी रही तो कैसे वह तमाम उम्र काट पाएगी। अपनी आगे की चिन्ता में डूबा गुडिय़ा का बाप बताता है?
मैं मजदूरी करके परिवार की गुजर बसर कर रहा हूं। गांव जा नहीं सकता। गांधी नगर छोड़कर बहन के पास शिफ्ट हो जाऊंगा। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले बच्ची का पिता इस घटना के बाद से पैसों की तंगी से जूझ रहा है। उसे सरकार या प्रशासन की ओर से अब तक कोई मदद नहीं मिली है। सत्ता और सियासत से जुड़ी कई नामचीन हस्तियां उससे मिलने आईं, हमदर्दी जताई, मदद का भरोसा दिया, मगर अब तक तो वह सब कोरा आश्वासन ही रहा है।
कहां हैं
राजधानी से लापता होते मासूम
राजधानी से मासूमों के लापता होने का सिलसिला कोई नया नहीं है। मगर गांधी नगर में बीते 15 अप्रैल को 5 वर्षीय बच्ची के अचानक घर से गायब होने और दो दिन बाद अधमरी हालत में बिल्डिंग की उसी इमारत में मिलने से पुलिस की लापरवाही सवालों के घेरे में है। गुमशुदगी के मामलों में पुलिस का ढीला ढाला और टरकाऊ रवैया हैरान करने वाला है। आम तौर पर पुलिस बच्चों की गुमशुदगी लिखकर अपने फर्ज से पल्ला झाड़ लेती है।
लापता होते मासूमों पर दिशा निर्देशों की उड़ती धज्जियां यह सूरत ए हाल तब है जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट दिशा निर्देश दिया हुआ है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लापता होने की सूचना मिलते ही तुरंत सीधे अपहरण का मुकदमा दर्ज कर किया जाए। पुलिस हैड क्वार्टर भी समय समय पर दिशा निर्देश जारी करता है। फिर भी लोकल पुलिस न तो हाई कोर्ट के आदेश और ना हीं अपने सीनियर अफसरों की गाइडलाइन पर काम करने में दिलचस्पी लेती है।
फरियाद लेकर थाने के चक्कर
आरोप है कि जब बच्चे के गुम होने पर अभिभावक जब अपनी फरियाद लेकर थाने पहुंचते हैं तो पुलिस आसानी से उनकी शिकायत सुनने को तैयार नहीं होती। लापता मासूम कहां हैं? किस हाल में होगाघ् कैसे तलाश किया जाए? पुलिस का दिल बिलकुल नहीं पसीजता। उलट इसके पुलिस फरियादी अभिभावकों को पोस्टकार्ड साइज के तीन फोटो लाने की कहकर थाने के एक दो दिन चक्कर लगवाए जाते हैं। तब कहीं जाकर बजाए अपहरण के गुमशुदगी की एफआईआर दर्ज होती है।

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