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कड़े कानून नहीं, मानसिकता बदलने व जागरूकता लाने की जरूरत

संशोधन के बाद कड़ा बन गया है कानून,
परंतु नहीं है आम लोगों को जानकारी
दुष्कर्म व यौन शोषण के अधिकतर मामलों में शामिल है जानकर,
ऐसे में जरूरत है मानसिकता बदलने की
पुलिस की जितनी सक्रियता और महिलाओं में जितनी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक जागरूकता दिल्ली में हैए उतनी शायद ही कहीं और हो सकती है। इसके बावजूद भी महिलाओं के प्रति अपराधों और विशेषकर बलात्कार की घटनाओं में राजधानी का अव्वल आनाए शासन ही नहींए अपितु समाज के लिए भी चिंतनीय होना चाहिए। महिलाओं के प्रति अपराध को सामान्य अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। ये अपराध केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं हैंए बल्कि ये सामाजिक अपराधों की श्रेणी में आते हैं। ये केवल आपराधिक मनोवृत्ति का परिणाम नहीं हैंए बल्कि इन अपराधों के पीछे सामाजिक व मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं। इस लिए ऐसे अपराधियों को दंडित करने मात्र से इन समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। महिलाओं के प्रति अपराध विशेषकर बलात्कार की घटनाओं का मूल कारण है महिलाओं के प्रति समाज की विकृत धारणाएं और महिलाओं को दैहिक स्तर पर देखने की मानसिकता। इसी प्रकार महिलाओं के प्रति हिंसाए चाहे वह बाहरी हो या फिर घरेलूए के पीछे महिलाओं के प्रति हीन भाव का होना प्रमुख कारण है। आज की शिक्षा में सामाजिक दायित्व बोध बढाने और महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव जगाने की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि हम सच में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों विशेषकर बलात्कार को रोकना चाहते हैं तो साहित्य व मीडिया और शिक्षा पद्धति तीनों का परिष्कार व मार्जन करना होगा। इसके बिना केवल कानून बनाने और नारी सशक्तिकरण के नारे लगाने से कुछ नहीं होगा। सुधीर बलियान और उदय इंडिया की टीम
सोलह दिसम्बर को वसंत विहार में चलती बस में एक छात्रा से हुए सामूहिक बलात्कार के मामले ने पूरे देश को झकझोर को रख दिया था। चौतरफे विरोध को देखते हुए सरकार को भी कड़े कदम उठाने पड़े और आनन-फानन में कई कमेटियां और आयोग गठित कर दिए गए। इतना ही नहीं कानून में कई कड़े प्रावधान करके सीआरपीसी में संशोधन भी कर दिया गया। परंतु सवाल उठता है कि क्या यह कानून का बदला हुआ रूप भी देश की अबोध बच्चियों व महिलाओं को बलात्कार व यौन शोषण जैसे घिनौने अपराधों से बचा पाएगा। किसी से भी पूछो, इसका जवाब नकारात्मक ही मिलेगा। कानून बदलने के बाद के हालात भी गवाह हैं कि उसका कोई असर अब तक हुआ है। गांधी नगर में पिछले दिनों पांच साल की बच्ची से हुए दुष्कर्म मामले ने एक बार फिर प्रशासन,कानून व सरकार की पोल खोल दी है। इन जैसी घटनाओं के जारी रहने से साफ जाहिर है कि कानून का रूप बदलने से भी रोंगटे खड़े कर देने वाले ऐसे अपराध रूक पाएंगे।
ऐसे में सवाल उठता है कि इस प्रकार के घिनौने और अमानवीय अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए क्या किया जाए। जवाब साफ है कि ऐसे अपराधों को रोकने के लिए सबसे पहले तो लोगों की मानसिकता बदलनी जरूरी है क्योंकि दुष्कर्म व यौन शोषण के अधिकतर मामलों में पीडि़ता के रिश्तेदार या उसके परिजनों के जानकार शामिल हैं। वहीं दूसरा समाधान है लोगों में कानून के प्रति सम्मान पैदा करना और उनको कानून के बारे में जागरूकता पैदा करना। भय बिन होय न प्रीत। इसका अर्थ साफ है कि कानून के प्रति लोगों में आदर तभी होगा जब उन्हें कानून का भय होगा। लोग आज मोमबत्ती जलाकर या धरना-प्रदर्शन करके विरोध जता रहे हैं। परंतु कानून में हुए बदलाव के बारे में लोगों को जागरूक करने की कोई कोशिश की जा रही है? ऐसी कोई कोशिश न तो दिखाई दे रही है और न ही कोई चर्चा सुनने में आ रही है। फिर लोगों को कैसे पता लगेगा कि जो अपराध वे कर रहे हैं? उसकी कितनी सजा उन्हें मिलेगी। उसका क्या अंजाम उन्हें भुगतना होगा। फिर कैसे कानून का कोई डर उनमें पैदा होगा। सच तो यह है कि कानून के जानकार माने जाने वाले अधिकतर वकीलों को भी यह नहीं पता है कि कानून में क्या बदलाव हुआ है। ऐसे में कड़ा कानून बनाकर इसका डर कैसे लोगों में बैठेगा।

इस तरह की समस्याओं से निपटने में पुलिस की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। पुलिस को ऐसे मामलों के लिए संवदेनशील बनाया जाना जरूरी है। गांधी नगर वाले मामले में पुलिस समय से कार्रवाई करती तो शायद उस अबोध बालिका को वह सब नहीं सहना पड़ता, जो उसे सहना पड़ा है।

वर्ष 2012 में प्रत्येक दिन हुए थे दिल्ली में दो दुष्कर्म
आंकड़े बहुत ही खौफ और चिन्ता पैदा करने वाले हैं। केवल देश की राजधानी की बात करें तो दिल्ली में दुष्कर्म व छेड़छाड़ के मामलों में साल-दर-साल वृद्धि हो रही है। वर्ष 2012 में इन मामलों में खासा इजाफा हुआ था। वर्ष 2012 में राजधानी में हर दिन लगभग दो दुष्कर्म के मामले सामने आए। अकेले 2012 वर्ष में दुष्कर्म के कुल सात सौ मामले दर्ज हुए। जनवरी से लेकर नवम्बर तक दुष्कर्म के 615 मामले दर्ज किए गए थे। जबकि 1 से 16 दिसम्बर तक 22 केस दर्ज हुए थे। 16 दिसम्बर को हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद उपजे आक्रोश के बाद भी राजधानी में 17 से 31 दिसम्बर तक दुष्कर्म के 63 मामले सामने आए थे । कुल मिला कर अकेले दिसम्बर के महीने में राजधानी में दुष्कर्म के 85 केस दर्ज हुए। जबकि जनवरी से नवम्बर तक का औसत निकाला जाए तो हर महीने उस दौरान एक महीने में 56 केस दर्ज हुए। वर्ष 2010 में हर महीने दुष्कर्म के 42 मामले दर्ज हुए जबकि वर्ष 2011 में हर महीने 47 मामले दर्ज किए गए।

छेड़छाड़ के मामलों में भी राजधानी पीछे नहीं रहीं। वर्ष 2011 में हर महीने छेड़छाड़ के लगभग 55 मामले दर्ज हुए। जबकि वर्ष 2012 में यह संख्या बढ़कर 56 हो गई।

वर्ष 2013 में 158 प्रतिशत इजाफा हुआ दुष्कर्म के मामलों
साढ़े चार महीने में दर्ज हुए 463 दुष्कर्म के मामले
वर्ष 2013 में पहले साढ़े चार महीनों में ही दिल्ली के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में दुष्कर्म के 463 मामले दर्ज हुए है। इस बात का खुलासा खुद दिल्ली पुलिस ने किया है जिसकी तुलना पिछले साल की इतनी ही समय अवधि से करे तो वर्ष 2013 में दुष्कर्म के मामलों में 158 प्रतिशत का इजाफा हो गया है। जबकि यौन शोषण के मामलों में भी लगभग 600 प्रतिशत इजाफा हो गया है। पिछले साल 15 अप्रैल तक दुष्कर्म के 179 व यौन शोषण के 139 मामले दर्ज हुए थे।

खुद दिल्ली पुलिस आयुक्त ने 22 अप्रैल को मीडियाकर्मियों के सामने इस बात को स्वीकारा। आयुक्त ने माना कि दुष्कर्म का अपराध मौकापरस्ती के चलते किया जाता है। जिसमें अधिवक्त अपने ही लोग शामिल होते हैँ। लगभग 97 प्रतिशत मामले घरों में होते है,जबकि तीन प्रतिशत मामलों में ही अजनबी शामिल पाए गए हैँ। उनका कहना है कि अगर खुद रिश्तेदार या पड़ोसी ही दुष्कर्म करेंगे तो पुलिस उनको नहीं रोक पाएगा। पुलिस ने अपने आकड़ों में बताया कि 178 मामलों में दोस्त या प्रेमी शामिल पाए गए हैं। जबकि 115 मामलों में पड़ोसी,15 मामलों में मालिक, दस में पिता, नौ मामलों में पूर्व पति, दो मामलों में ससुर, दो मामलों में सौतेला पिता, 5 मामलों में चचेरा भाई, तीन में किराएदार, दो में डाक्टर, तीन में इंस्पेक्टर व एक मामले में अन्य शामिल पाया गया है।

जरूरत है मानसिकता बदलने की
पटियाला हाउस कोर्ट के अधिवक्ता अजय दिग्पोल का मानना है कि कानून को कड़ा बनाने से ऽुछ नहीं होने वाला है। सबसे पहले लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत है। जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदली जाएगी और कानून के प्रति आदर पैदा नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं बदलने वाला है।

जरूरत है जागरूकता लाई जाए
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डीबी गोस्वामी का कहना है कि किसी सरकार या प्रशासन को गाली देने से कुछ नहीं होने वाला है। न ही किसी धरने-प्रदर्शन से कुछ बदलेगा। जरूरत है लोगों में कानून के प्रति जागरूकता लाने की ताकि वह कानून को समझे और उनको पता चले कि किस अपराध की क्या सजा मिल सकती है। वहीं लोगों की मानसिकता बदलनी भी जरूरी है क्योंकि अधिकतर ऐसे मामलों में अपने ही शामिल पाए जातें है। वहीं पुलिस का रवैया भी बदलना जरूरी है ताकि समय पर कार्रवाई की जा सके।

राजधानी में दर्ज हुए दुष्कर्म के मामले
वर्ष 2010 – 507
वर्ष 2011 – 568
वर्ष 2012 – 700
राजधानी में दर्ज हुए छेड़छाड़ के मामले
2010 – 585
वर्ष 2011 – 657
15 नवबर 2012 तक-591
राजधानी की जिला अदालतों में सितम्बर 2012 तक लंबित दुष्कर्म के मामले
अदालतें मामले
साकेत कोर्ट- 2445
तीसहजारी – 1605
कड़कडड़ूमा व
पटियाला हाउस- 2660
द्वारका व रोहिणी – 3322
कुल- 10032
खुद दिल्ली पुलिस आयुक्त ने 22 अप्रैल को मीडियाकर्मियों के सामने इस बात को स्वीकारा। आयुक्त ने माना कि दुष्कर्म का अपराध मौकापरस्ती के चलते किया जाता है। जिसमें अधिवक्त अपने ही लोग शामिल होते हैँ। लगभग 97 प्रतिशत मामले घरों में होते है,जबकि तीन प्रतिशत मामलों में ही अजनबी शामिल पाए गए हैँ। उनका कहना है कि अगर खुद रिश्तेदार या पड़ोसी ही दुष्कर्म करेंगे तो पुलिस उनको नहीं रोक पाएगा। पुलिस ने अपने आकड़ों में बताया कि 178 मामलों में दोस्त या प्रेमी शामिल पाए गए हैं। जबकि 115 मामलों में पड़ोसी,15 मामलों में मालिक, दस में पिता, नौ मामलों में पूर्व पति, दो मामलों में ससुर, दो मामलों में सौतेला पिता, 5 मामलों में चचेरा भाई, तीन में किराएदार, दो में डाक्टर, तीन में इंस्पेक्टर व एक मामले में अन्य शामिल पाया गया है।
जरूरत है मानसिकता बदलने की
पटियाला हाउस कोर्ट के अधिवक्ता अजय दिग्पोल का मानना है कि कानून को कड़ा बनाने से ऽुछ नहीं होने वाला है। सबसे पहले लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत है। जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदली जाएगी और कानून के प्रति आदर पैदा नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं बदलने वाला है।

जरूरत है जागरूकता लाई जाए
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डीबी गोस्वामी का कहना है कि किसी सरकार या प्रशासन को गाली देने से कुछ नहीं होने वाला है। न ही किसी धरने-प्रदर्शन से कुछ बदलेगा। जरूरत है लोगों में कानून के प्रति जागरूकता लाने की ताकि वह कानून को समझे और उनको पता चले कि किस अपराध की क्या सजा मिल सकती है। वहीं लोगों की मानसिकता बदलनी भी जरूरी है क्योंकि अधिकतर ऐसे मामलों में अपने ही शामिल पाए जातें है। वहीं पुलिस का रवैया भी बदलना जरूरी है ताकि समय पर कार्रवाई की जा सके।

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