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संकट में गजराज

बढ़ती जनसंख्या और तेज आर्थिक विकास के कारण देश में हाथियों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। हालांकि वर्ष 2011 में हाथी को देश के राष्ट्रीय धरोहर पशु के रुप में मान्यता दी गई थी जिससे हाथियों को भी बाघों की भंाति संरक्षण मिलने लगाए परन्तु बढ़ते औद्यौगिकर, खनन, रेलवे के विकास और आवासीय बस्तियों के विस्तार से देश के लगभग 21000 जंगली हाथियों पर संकट बढ़ गया है।जिस बाघ संरक्षण प्रोजेक्ट की बड़ी बड़ी डींगें मारे जा रही थीं, उसके चार दशक बाद भी बाघों की संख्या 40000 से घट कर 1400 पर आ गई है। ऐसा ही कुछ हाथियों के साथ भी होने जा रहा है। हाथी की एक ओर तो देश के कई भागों में पूजा की जाती है वहीं दूसरी ओर उनके सिकुड़ते आवास स्थलों के कारण संरक्षित पशुओं और आदमी में संघर्ष बढ़ रहा है और उसमें पशुओं की मौते हो रही हैं।
हाथियो की सबसे अधिक मौतें ट्रेन दुर्घटनाओं में होती है। आसाम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और उत्तराखंड में 127 हाथी मारे गए थे। बड़े शरीर के कारण हाथी की मौत को छुपाया नहीं जा सकता, परंतु छोटे आकार के पशुओं की मौतें तो पता भी नहीं चलती वरना देश के विभिन्न भागों मे बड़ी संख्या में बाघ, चीते, हिरन, भालू और अन्य वन्य जीव ट्रेन दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं।
लगभग 500 हाथी बिजली लगने से दुर्घटनावश और जानबूझ कर भी) मारे गए। आज ग्रामीण विद्युुतिकरण परियोजना के कारण अनेक सुदूर इलाकों में बिजली पहुंचने लगी है। बिजली के खम्भे सामान्यत: सीमेन्ट के होते हैं जिनपर हाथी देह रगड़ते हैं, और इसलिए उनके चारों ओर बाड़ लगाए जाने की जरुरत है। कई बार बिजली की तारें इतनी नीचे लटकती रहती हैं कि हाथी उसमें उलझ जाते हैं, और मारे जाते हैं। कई मामलों में फसल को नुकसान पहुंचाने पर ग्रामीणों द्वारा हाथियों को मारने के लिए बिजली की तारे लटका दी जाती हैं।हाथी दांत के तस्करों द्वारा भी हाथी मारे जाते हैं। अफ्रीकन हाथियों के विपरीत भारतीय हाथियों में केवल नर के दांत होते हैं और इस कारण सौ मादाओं पर केवल एक नर हाथी ही बचा है।
उड़ीसा वन्य जीवों का सबसे बड़ा शरण स्थल है। देश के हाथियों की कुल संख्या का 70 प्रतिशत यहां रहते हंै। यहां पिछले पांच वर्ष में 300 से अधिक हाथी मारे गए हैं। बॉक्साइट, लोहा और कोयले की खदानें राज्य के लिए समृद्धि का स्रोत है लेकिन इसके कारण हाथियों का क्षेत्र सिकुड़ता गया है। विस्फोटक और प्रकाश व ध्वनि प्रदूषण के कारण हाथियों को परेशानी होती हैं और गांव की ओर निकल आते हैं और मारे जाते हैं। दुर्भाग्यवश पिछले दो वर्षों में इनके संरक्षण के लिए एक भी प्रयास नहीं किया गया। हाथी और मनुष्य की लड़ाई इतनी गम्भीर हो गयी है कि पिछले दस सालों में राज्य में 589 लोग मारे गए। जैसे ही हाथी मानव बस्तियों की ओर आते हैं, संघर्ष शुरु हो जाता है। हालांकि हाथी स्वभाव से हिंसक नहीं होते परन्तु निरन्तर बढ़ते संघर्ष के कारण वे आक्रामक होते जा रहे हैं।इस पर भी सरकार में जिम्मेदारी का भाव नहीं दिख रहा। हाल ही में एक ट्रेन दुर्घटनाए जिसमें पांच हाथी मारे गए, के आरोपी ड्राईवर को पकड़ॉ कर छोड़ दिया गया। अधिकांश मौतों के लिए जिम्मेदार कुछ उच्च अधिकारियों को कभी भी दंडित नहीं किया गया। देश के चिन्हित 88 हाथी-क्षेत्रों में से 40 से राष्ट्रीय राजमार्ग, 21 से रेलवे ट्रैक और 18 से दोनों गुजरते हैं। सिंचाई के लिए नहरों के निमार्ण से भी हाथियों के क्षेत्र बंट रहे हैं। इसके समाधान के लिए सरकार सभी हाथियों में इलेक्ट्रॉनिक चिप लगवा सकती है जिससे उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके और उनको खतरे से बचाया जा सके।

देश में 44000-50000 एशियाई हाथियों का 60 प्रतिशत बचा हुआ है। एक समय में लाखों हाथियों के प्रदेश के नाम से प्रसिद्ध लाओस में केवल एक हजार हाथी ही बचे हैं। भारतीय इसकी गणेष भगवान के रुप में पूजा करते हैं। लेकिन कई बार अत्यधिक लगााव भी नुकसान पहुचाता है। लगभग 3500 हाथी मन्दिरों में राजनीतिक शोभा यात्राओं, शादियों, आदि के लिए मनुष्यों के बन्दी हैं। कोर्णाक के सूर्य मन्दिर की दीवारों पर हाथी की कुल 4000 मूर्तियां गढ़ी गई हैं। यदि उन्हें बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब वे केवल मन्दिरों की दीवारों पर ही पाए जाएंगे।

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